Social Media Impact: मोबाइल हाथ में आते ही उंगलियां जैसे अपने आप स्क्रीन पर दौड़ने लगती हैं. एक रील खत्म होती है तो दूसरी सामने, फिर स्टोरी, फिर पोस्ट… और देखते-देखते कब एक-दो घंटे निकल जाते हैं, पता ही नहीं चलता. आज के युवाओं के लिए यह सिर्फ टाइमपास नहीं, बल्कि रोज की आदत बन चुकी है, लेकिन इसी आदत के पीछे एक ऐसा सच छिपा है, जो थोड़ा परेशान करने वाला है. हाल ही में आई एक ग्लोबल रिपोर्ट ने इशारा किया है कि ज्यादा सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले युवाओं की खुशी और संतुष्टि धीरे-धीरे कम हो रही है. खास बात यह है कि इसका असर सबसे ज्यादा किशोर लड़कियों में देखा गया है.
सोशल मीडिया और खुशी का रिश्ता
आज के दौर में सोशल मीडिया सिर्फ बातचीत का जरिया नहीं रहा, बल्कि यह हमारी सोच, भावनाओं और आत्मविश्वास तक को प्रभावित करने लगा है. रिपोर्ट में साफ तौर पर सामने आया है कि जो किशोर ज्यादा समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं, उनमें लाइफ सैटिस्फैक्शन कम देखने को मिलता है. यह जरूरी नहीं कि सोशल मीडिया ही इसका सीधा कारण हो, लेकिन दोनों के बीच एक मजबूत कनेक्शन जरूर दिख रहा है. जिन युवाओं का स्क्रीन टाइम सीमित है, वे खुद को ज्यादा खुश और संतुष्ट महसूस करते हैं. वहीं, लंबे समय तक ऑनलाइन रहने वाले युवाओं में यह स्तर गिरता नजर आता है.
किशोर लड़कियों पर ज्यादा असर क्यों?
रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा यह है कि 15 साल की लड़कियों में यह असर सबसे ज्यादा देखा गया है. इसका एक बड़ा कारण है सोशल मीडिया पर दिखने वाला “परफेक्ट लाइफ” का भ्रम.
आज इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म पर हर कोई अपनी जिंदगी का सबसे अच्छा हिस्सा दिखाता है. खूबसूरत तस्वीरें, शानदार लाइफस्टाइल, ट्रैवल, ब्रांडेड कपड़े. यह सब देखकर कई बार किशोर लड़कियां खुद की तुलना करने लगती हैं. यही तुलना धीरे-धीरे आत्मविश्वास को कम कर देती है.
आखिर युवा देख क्या रहे हैं?
यह सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आप कितना समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं, बल्कि यह भी मायने रखता है कि आप वहां क्या देख रहे हैं, अगर कोई यूजर लगातार ऐसे कंटेंट देख रहा है जो दिखावे, ग्लैमर और “परफेक्ट लाइफ” को बढ़ावा देता है, तो इसका असर मानसिक स्थिति पर पड़ सकता है. वहीं, अगर सोशल मीडिया का इस्तेमाल दोस्तों और परिवार से जुड़ने के लिए किया जाए, तो इसका असर पॉजिटिव भी हो सकता है. आजकल एल्गोरिदम ऐसे कंटेंट को आगे बढ़ाता है, जो ज्यादा एंगेजमेंट लाता है. इसका मतलब है कि यूजर्स को वही चीजें ज्यादा दिखती हैं, जो उन्हें लंबे समय तक स्क्रीन पर रोके रखें. चाहे वह कंटेंट उनके लिए अच्छा हो या नहीं.
किन देशों में दिखा ज्यादा असर?
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे अंग्रेजी भाषी देशों में यह गिरावट ज्यादा देखने को मिली है. पिछले करीब एक दशक में इन देशों के युवाओं की लाइफ सैटिस्फैक्शन कम हुई है. इसके पीछे सिर्फ सोशल मीडिया ही नहीं, बल्कि सामाजिक सपोर्ट भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है. जिन युवाओं को परिवार और समाज से कम सपोर्ट मिलता है, वे ज्यादा असंतुष्ट महसूस करते हैं. दिलचस्प बात यह है कि बाकी दुनिया के कई हिस्सों में युवाओं की खुशी का स्तर बढ़ा है. इससे यह साफ होता है कि सिर्फ डिजिटल दुनिया ही नहीं, बल्कि असली दुनिया में मिलने वाला सपोर्ट भी उतना ही जरूरी है.
क्या सरकारें उठाने लगी हैं कदम?
इस बढ़ते असर को देखते हुए कई देशों ने बच्चों और किशोरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर सख्ती पर विचार शुरू कर दिया है. ऑस्ट्रेलिया जैसे देश 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठा रहे हैं.
यह कदम इसलिए उठाए जा रहे हैं क्योंकि अब यह सिर्फ एंटरटेनमेंट का मामला नहीं रहा, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा बन चुका है.
असली समस्या: स्क्रीन टाइम या कंटेंट?
अगर ध्यान से देखें तो मामला सिर्फ स्क्रीन टाइम का नहीं है. असली सवाल यह है कि हम डिजिटल दुनिया में क्या देख रहे हैं और उससे कितना प्रभावित हो रहे हैं. मान लीजिए, एक छात्र रोज घंटों मोटिवेशनल या एजुकेशनल कंटेंट देखता है, तो उसका असर अलग होगा. वहीं, अगर कोई लगातार दूसरों की “परफेक्ट लाइफ” देखकर खुद को कमतर समझने लगे, तो यह उसकी खुशी को जरूर प्रभावित करेगा.
क्या किया जा सकता है?
इसका हल पूरी तरह सोशल मीडिया छोड़ देना नहीं है, बल्कि इसे समझदारी से इस्तेमाल करना है. कुछ छोटे बदलाव बड़ा फर्क ला सकते हैं-जैसे स्क्रीन टाइम सीमित करना, अपने कंटेंट फीड को कंट्रोल करना और असली दुनिया में ज्यादा समय बिताना. परिवार और दोस्तों के साथ बातचीत, आउटडोर एक्टिविटी और खुद के लिए समय निकालना-ये सब चीजें मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती हैं.
सोशल मीडिया आज की जरूरत बन चुका है, लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल धीरे-धीरे युवाओं की खुशी को प्रभावित कर रहा है. खासकर किशोर लड़कियों में इसका असर ज्यादा दिखना चिंता की बात है. ऐसे में जरूरी है कि हम डिजिटल दुनिया और असली जिंदगी के बीच सही संतुलन बनाना सीखें.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)





