100 पन्नों की रिपोर्ट से सामने आई ट्रंप की करतूत, सरेआम उड़ाई एथिक्स की धज्जियां! पद की गरिमा तार-तार


अब ये बात पानी की तरह साफ हो चुकी है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) अपनी सत्ता की ताकत से शेयर बाजार को अपने इशारों पर नचा रहे हैं. खुद दांव खेल रहे हैं और पैसा कमा रहे हैं. शायद ही आज से पहले ऐसा देखा या सुना गया होगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति इस तरीके से पैसा कमाने की होड़ में लगा हो. आम तौर पर देश के बड़े नेता इस तरह के काम से दूर रहते हैं, लेकिन ट्रंप ने इस मर्यादा को तार-तार कर दिया. अमेरिका से ही निकली एक सरकारी रिपोर्ट से पता चला है कि ट्रंप ने इस साल के शुरुआती तीन महीनों में हजारों बार शेयरों को खरीदा और बेचा. अंडरलाइन करने वाली बात ये है कि 90 दिनों में हजारों बार. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कई कंपनियां ऐसी हैं, जिनका मुनाफा सीधे तौर पर ट्रंप सरकार के फैसलों और नीतियों पर निर्भर करता है.

ऑफिर ऑफ गर्वनमेंट एथिक्स (Office of Government Ethics) के पास जमा की गई 100 से ज्यादा पन्नों की इस रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल जनवरी से मार्च के बीच ट्रंप के पोर्टफोलियो से 3,600 से ज्यादा बार शेयर्स खरीदे और बेचे गए. अगर बाजार खुलने वाले दिनों के हिसाब से देखें, तो हर दिन औसतन 50 सौदे किए गए. इस दौरान करीब 10 करोड़ डॉलर का लेन-देन हुआ. भारतीय रुपयों में यह रकम अरबों खरबों की बनेगी. एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह किसी आम आदमी की ट्रेडिंग नहीं, बल्कि एक बड़े हेज फंड जैसी रफ्तार है. हेज फंड ऐसी कंपनियां होती हैं, जो कमाई के लिए काम करती हैं.

किन कंपनियों के शेयर्स खरीदे गए? विवाद क्यों?

रिपोर्ट में सामने आया है कि ट्रंप के पोर्टफोलियो में सबसे बड़ा सौदा एनवीडिया (Nvidia) कंपनी का था, जिसमें करीब 60 लाख डॉलर तक के शेयर्स खरीदे गए. एनवीडिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और कंप्यूटर के लिए खास ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) चिप बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है. विवाद इसलिए है, क्योंकि पिछले साल ही राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद इस कंपनी की एडवांस्ड चिप को चीन में बेचने की मंजूरी दी थी. इसके अलावा, ईरान के साथ चल रहे तनाव के बीच अमेरिका को हथियार और सैन्य सामान सप्लाई करने वाली कंपनियों जैसे लॉकहीड मार्टिन (Lockheed Martin), जनरल डायनेमिक्स (General Dynamics) और नॉर्थप ग्रुम्मन (Northrop Grumman) के शेयर्स भी भारी मात्रा में खरीदे गए.

अब सुनिए इंटेल की कहानी

जब कोई राष्ट्रपति ऐसी कंपनियों में पैसा लगाता है, जिन्हें उनके फैसलों से फायदा या नुकसान हो सकता है, तो सवाल उठना लाजिमी है. उदाहरण के लिए, ट्रंप के पोर्टफोलियो में इंटेल (Intel) कंपनी के शेयर्स भी शामिल हैं, जिसमें अमेरिकी सरकार ने पिछले साल ही 10 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी थी. साथ ही ऐपल (Apple), बोइंग (Boeing) और टेस्ला (Tesla) जैसी बड़ी कंपनियों के शेयर्स भी खरीदे और बेचे गए हैं. अभी हाल ही में इन सभी कंपनियों के मालिक ट्रंप के साथ चीन के दौरे पर भी गए थे. इतना ही नहीं, ट्रंप के खाने-पीने के शौक की तरह उनके पोर्टफोलियो में शेक शैक (Shake Shack), पापा जॉन्स (Papa John’s) और चीज़केक फैक्ट्री (Cheesecake Factory) जैसी फास्ट-फूड कंपनियों के शेयर्स भी जोड़े गए हैं.

क्या ट्रंप ने कोई कानून तोड़ा है?

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के समय व्हाइट हाउस के चीफ एथिक्स एडवाइजर (नैतिकता सलाहकार) रहे रिचर्ड पेंटर (Richard Painter) ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है. उन्होंने कहा कि अगर ट्रंप की जगह कोई देश का रक्षा मंत्री होता, तो यह सीधा-सीधा एक अपराध माना जाता. कानूनन राष्ट्रपति के लिए एक छूट दी गई है, जिसके तहत तकनीकी रूप से वह ऐसा कर सकते हैं, लेकिन यह जनता के भरोसे के साथ एक बड़ा धोखा है. अमेरिका में आम सरकारी कर्मचारियों पर यह नियम लागू होता है कि वे ऐसी किसी कंपनी के शेयर्स नहीं रख सकते, जिस पर उनके काम का सीधा असर पड़ता हो.

इस पूरे विवाद पर ट्रंप के परिवार के बिजनेस यानी द ट्रंप ऑर्गनाइजेशन (The Trump Organization) की प्रवक्ता किमबर्ली बेंजा (Kimberly Benza) ने सफाई दी है. उन्होंने एक बयान जारी कर कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप का निवेश पोर्टफोलियो उनके हाथ में नहीं है, बल्कि इसे एक थर्ड पार्टी संभालती है. उनके पास ही शेयर खरीदने या बेचने का पूरा अधिकार है. उन्होंने दावा किया कि न तो राष्ट्रपति ट्रंप, न उनके परिवार और न ही उनकी कंपनी का शेयर्स को चुनने या फाइनल करने में कोई हाथ है. उन्हें सौदों की पहले से कोई जानकारी नहीं होती और न ही वे इसमें कोई सलाह देते हैं.

पहले क्या होता था?

भले ही ट्रंप परिवार कह रहा हो कि वे सीधे तौर पर डील नहीं करते, लेकिन जानकारों का मानना है कि केवल यह जानना ही कि उनके पोर्टफोलियो में कौन से शेयर्स हैं, उनके फैसलों को प्रभावित कर सकता है. चाहे वह देश की हेल्थ पॉलिसी हो, सरकारी कॉन्ट्रैक्ट देना हो या फिर युद्ध से जुड़े बड़े फैसले हों. इससे पहले के अमेरिकी राष्ट्रपतियों का इतिहास बिल्कुल अलग रहा है. पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश और बिल क्लिंटन ने राष्ट्रपति बनते ही अपने पैसों को ‘ब्लाइंड ट्रस्ट’ में डाल दिया था, यानी उन्हें खुद नहीं पता होता था कि उनका पैसा कहां लगा है. वहीं जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने अपने सारे शेयर्स बेच दिए थे और बराक ओबामा ने अपने पैसे को मिले-जुले म्यूचुअल फंड्स में लगा रखा था. जो बाइडन ने तो अपने कार्यकाल में कोई ट्रेडिंग ही नहीं की.

ट्रंप की संपत्ति हाल के दिनों में बहुत तेजी से बढ़ी है और उनके पास भारी मात्रा में कैश आया है. दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद से उनकी कंपनी को विदेशों में रिजॉर्ट्स पर उनका नाम इस्तेमाल करने के लिए करोड़ों की फीस मिली है. साथ ही क्रिप्टो करेंसी की सेल से भी करोड़ों डॉलर आए हैं. चूंकि क्रिप्टो खरीदने वालों के नाम छिपे रहते हैं, इसलिए यह पता लगाना नामुमकिन है कि कहीं कोई ट्रंप को फायदा पहुंचाकर नीतियां तो नहीं बदलवाना चाह रहा था. फिलहाल इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अमेरिकी राजनीति और वॉल स्ट्रीट दोनों में बहस छिड़ गई है कि क्या देश के सबसे शक्तिशाली पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह खुलकर खेलने की इजाजत होनी चाहिए.



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