वॉशिंगटन: ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका में अचानक कुछ ऐसा हो गया है जिसने डोनाल्ड ट्रंप के पसीने छुड़ा दिए हैं. दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क की छाती पर एक-दो नहीं, बल्कि एक के बाद एक पूरे 7 बड़े अटैक हुए हैं. ये वार किसी आम जगह पर नहीं, बल्कि सीधे अमेरिकी लोगों की लाइफलाइन पर हुआ है. शक है कि इस पूरे खेल के पीछे अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन ईरान ही है, लेकिन ट्रंप खुलेआम उसका नाम लेने रहे हैं. अगर ट्रंप ने दुनिया के सामने ये मान लिया कि हमला ईरान ने ही किया है तो साबित हो जाएगा कि तकनीक के मामले में दुश्मन आगे निकल चुका है.
अमेरिका को कहां लगे 7 घाव
दरअसल, ये अटैक अमेरिका की पानी की सप्लाई करने वाली सबसे अहम पाइपलाइनों और प्लांट्स पर हुए हैं. इस सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर पर 7 जगहों से साइबर अटैक किए गए. हालात इतने खराब हो गए कि कई राज्यों में वॉटर सिस्टम को बचाने के लिए ऑटोमैटिक सिस्टम बंद करके हाथों से काम संभालना पड़ा. अब इस पूरे खेल में सबसे बड़ा झटका अमेरिकी राजनीति और डोनाल्ड ट्रंप को लगा है, क्योंकि जब दुनिया की नजरें ईरान पर टिक रही हैं, तब ट्रंप सीधे तौर पर ईरान का नाम तक लेने से बच रहे हैं.
इस बड़े और सनसनीखेज साइबर हमले की पहली भनक मिनेसोटा राज्य से लगी. 26 और 27 जुलाई के बीच यहां के 30 से ज्यादा कम्युनिटी वॉटर सिस्टम्स को हैकर्स ने अपना निशाना बना लिया. मिनेसोटा आईटी सर्विसेज ने जब आनन-फानन में जांच शुरू की तो पता चला कि किसी ने जानबूझकर पानी की सप्लाई कंट्रोल करने वाले सिस्टम का एक्सेस हथिया लिया था.
ये आग सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं रही. महज एक हफ्ते के भीतर 7 से ज्यादा राज्यों के वॉटर और वेस्टवॉटर फैसिलिटीज इस हमले की चपेट में आ गए. एफबीआई (FBI), सीआईएसए (CISA) और पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) जैसी अमेरिका की टॉप एजेंसियां तुरंत मैदान में उतरीं.
ईरानी हैकर्स ने कैसे किया इतना बड़ा धमाका?
मिनेसोटा आईटी सर्विसेज की प्रवक्ता एमिली जिमर का कहना है कि ‘मामले की जांच बहुत तेजी से चल रही है. जिस तरीके से इस हमले को अंजाम दिया गया है, वो ठीक वैसा ही है जैसा हमारे फेडरल पार्टनर्स ने पहले क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों में देखा था’.
हैकर्स ने बहुत ही चालाकी से पानी के प्लांट्स में लगे ‘प्रोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर्स’ (PLCs) को अपना शिकार बनाया. ये वो डिजिटल डिवाइसेज होते हैं जो पानी का प्रेशर, केमिकल्स की सही मात्रा और बड़े-बड़े पंपों को चलाते हैं. अगर कोई इन PLCs को हैक कर ले तो पूरे शहर का पानी बंद हो सकता है या फिर पानी में केमिकल मिलाकर उसे जहरीला बनाया जा सकता है.
सरकारी मेमो के मुताबिक, हैकर्स का असली मकसद पानी का प्रेशर खत्म करके सप्लाई में जहर घोलना या उसे दूषित करना ही था. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि हैकर्स ने इसके लिए कोई बहुत हाई-टेक तरीका इस्तेमाल नहीं किया. उन्होंने बस उन सिस्टम्स को ढूंढा जो इंटरनेट से सीधे जुड़े थे और जिनके पासवर्ड बहुत कमजोर थे.
मिनेसोटा के चीफ इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी ऑफिसर जॉन इजराइल ने चेतावनी देते हुए कहा कि ‘हैकर्स पूरे देश के इंफ्रास्ट्रक्चर को खंगाल रहे हैं. वa कमजोर दरवाजों को खटखटा रहे हैं और जहां भी सुरक्षा ढीली मिल रही है, वहां अंदर घुस रहे हैं’. अगर कर्मचारियों ने समझदारी दिखाते हुए तुरंत मैनुअल कंट्रोल हाथ में न लिया होता तो अमेरिका के कई शहरों में पीने का पानी पूरी तरह ठप हो जाता.
क्या ईरान के खौफ से नाम लेने से कतरा रहे हैं ट्रंप?
अमेरिका की जांच एजेंसियां यह मान रही हैं कि इस हमले का पैटर्न ईरान के पुराने साइबर हमलों से काफी मिलता-जुलता है लेकिन सबसे बड़ा ड्रामा तब शुरू हुआ जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान सामने आया. ट्रंप ने इस भयंकर अटैक का दोष सीधे तौर पर ईरान पर डालने के बजाय अपनी ही व्यवस्था पर फोड़ दिया.
कैबिनेट मीटिंग के दौरान ट्रंप ने ईरान का बचाव करते जैसा बयान दिया और कहा कि ‘लोग कह रहे हैं कि मिनेसोटा के 30 वॉटर प्लांट्स पर जो हमला हुआ, उसके पीछे ईरान है. मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता. मैं इसके लिए मिनेसोटा के नाकाम प्रशासन और वहां के भ्रष्ट गवर्नर को जिम्मेदार मानता हूं. ईरान के पास मिनेसोटा के बारे में सोचने से बहुत बड़े मुद्दे हैं’.
ट्रंप के इस रवैये से हर कोई हैरान है. जहां एक्सपर्ट्स इसे सीधे तौर पर ईरान से जोड़ रहे हैं, वहीं ट्रंप ईरान का नाम लेने से कतरा रहे हैं और अपने ही अधिकारियों को कसूरवार ठहरा रहे हैं. इस पर मिनेसोटा के गवर्नर टिम वॉल्ज़ ने पलटवार करते हुए कहा कि ट्रंप को अच्छी तरह पता है कि हमलावर कौन है, लेकिन वे सच्चाई का सामना करने से भाग रहे हैं.




