डोंगरगढ़ –प्रातः स्मरणीय संत शिरोमणि समाधिस्थ आचार्य 108 श्री विद्यासागर महाराज जी एवं नवीन आचार्य 108 श्री समयसागर महाराज जी के आशीर्वाद से 105 आर्यिका श्री शैल मति माता जी एवं 105 आर्यिका श्री विदुर मति माता जी के सानिध्य में छत्तीसगढ़ के प्रथम नवोदित श्री दिगम्बर जैन चंद्रगिरी अतिशय महातीर्थ क्षेत्र डोंगरगढ़ में प्रतिवर्ष अनुसार इस वर्ष भी दिनांक 2 अक्टूबर 2026 दिन शुक्रवार को छत्तीसगढ़ स्तरीय सामूहिक क्षमावाणी एवं अहिंसा दिवस के रूप में मनाया गया |
105 आर्यिका श्री शैल मति माता जी ने कहा कि आज दो पर्व एक ही दिन मनाया जा रहा है अहिंसा दिवस और क्षमा वाणी पर्व | आज दो महापुरुषों कि जयंती भी है एक महात्मा गाँधी और दूसरे लाल बहादुर शास्त्री |
महात्मा गाँधी अहिंसा के पुजारी थे उन्होंने अहिंसा कि राह पे चल कर भारत को आज़ादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी के अन्तरंग में, कण – कण में और उनकी चर्या में अहिंसा और क्षमा समाई हुई थी |
जब कोई दूसरों कि भूल को भूला दे और दूसरों के गुणों पर दृष्टि रहे तभी क्षमा आ सकती है | उत्तम क्षमा का धारक कैसा होता है सहनशील, सरल, निष्कपट|
कोई व्यक्ति क्रोंध न करके भी अन्दर में क्रोध रख सकता है, मन में मान रख कर भी क्षमा कर सकता है, मन में कुटिलता रखकर भी क्षमा कर सकता है | क्षमा ऊपर से दिखाने कि चीज नहीं होती है | मान के अभाव में ही क्षमा आ सकती है क्रोध के आभाव में भी क्षमा आना संभव नहीं है |
दस धर्मों का सार कहे तो क्षमा ही है | जब दस धर्म को धारण करोगे तभी क्षमा आना संभव हो सकता है | दस धर्मों में क्षमा का महत्वपूर्ण स्थान है और उसके बिना कोई भी धर्म अधूरा है | “क्षमा वीरस्य भूषणं” क्षमा वीरों का आभूषण है | एक उदाहरण के माध्यम से समझाया कि पार्श्वनाथ भगवान पर कमठ ने कई बार घोर उपसर्ग किया लेकिन पार्श्वनाथ भगवान ने उसे समता से सहन किया और कमठ को सद्बुद्धि मिले यही भाव किया और जब पार्श्वनाथ भगवान् को केवल ज्ञान कि प्राप्ति हुई तो कमठ को भी सम्यग्दर्शन कि प्राप्ति हो गयी |
यह पार्श्वनाथ भगवान् के भाव का ही प्रभाव था | “पहले क्षमा किया जाता है फिर क्षमा लिया जाता है”| क्षमा अन्तरंग से होना चाहिये तभी वह सच्ची क्षमा है केवल ऊपर – ऊपर से क्षमा मांगना या क्षमा करना किसी प्रकार से उपयोगी नहीं है | सन 1998 में आचार्य श्री ने जब कुण्डलपुर में 58 दीक्षाएं दी थी तब उन्होंने एक सूत्र दिया था कि “ओम नमः बोलो ओम नमः, सबको क्षमा बोलो सबसे क्षमा”| इस सूत्र को चलते – फिरते, उठते – बैठते बोलते रहने से मन में धारण करने से ऐसे पवित्र भाव होंगे और ऐसा सम्प्रेषण होगा कि सारे जगत में आपका ना कोई बैरी होगा और ना ही कोई शत्रु होगा |
दोपहर 2 बजे १००८ श्री चन्द्रप्रभ भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, पूजा एवं महाआरती कि गयी | तत्पश्चात संत शिरोमणि समाधिस्थ 108 आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी कि संगीतमय पूजा कि गयी |दोपहर 3 बजे से प्रतिभास्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ कि बालिकाओं द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमे मनमोहक नृत्य एवं नाटक कि प्रस्तुति छात्राओं और बच्चों द्वारा दी गयी |
शाम 4 बजे से सामूहिक क्षमा याचना शुरू हुई जिसमे सभी ने एक दूसरे से क्षमा मांगी कि जाने – अंजाने में कोई कार्य से दुःख पहुचाया होगा तो उसके लिये क्षमा करना आदि एवं शाम 5 बजे से सामूहिक वात्सल्य भोज हुआ | श्री दिगम्बर जैन चंद्रगिरी तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष सेठ सिंघई श्री किशोर जैन ने छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव, दुर्ग, भिलाई, रायपुर, तिल्दा, बिलासपुर, भाटापारा, अकलतरा, आदि एवं अन्य प्रदेश से आये सभी दिगम्बर जैन समाज के पदाधिकारियों को धन्यवाद दिया कि उन्होंने सम्पूर्ण समाज के साथ अपनी उपस्थिति दी एवं उक्त कार्यक्रम को सफल बनाया |




