Modern isolation and mental well-being : कहते हैं पैसा सब कुछ खरीद सकता है, लेकिन क्या वह आपके दिल का अकेलापन भी भर सकता है? सोशल मीडिया पर हाल ही में एक 27 साल के रईस युवक की कहानी वायरल हो रही है, जो हर दिन सिर्फ ‘साथ’ निभाने और फोन पर बात करने के लिए लगभग 6,000 रुपये ($75) खर्च करने को तैयार है. सुनकर अजीब लगता है न? पर यह आज की कड़वी सच्चाई है. लोग आलीशान घरों में तो रह रहे हैं, पर वहां बात करने वाला कोई नहीं है.
यह मामला ‘Lonely in Luxury’ का एक परफेक्ट उदाहरण है. उस शख्स के पास दौलत की कमी नहीं है, लेकिन वह एक ऐसी चीज के लिए तड़प रहा है जो कभी इंसानों को मुफ्त में मिलती थी-सच्ची बातचीत. आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और तकनीक (Technology) ने हमें दुनिया से जोड़ा तो है, लेकिन अपनों से दूर कर दिया है. हम स्क्रीन पर तो हजारों लोगों से जुड़े हैं, पर असल जिंदगी में ‘हेलो’ बोलने वाला कोई नहीं है.
शादीशुदा जिंदगी और ‘खामोश’ अकेलापन
इस खबर पर आए कुछ कमेंट्स ने समाज की एक और दुखती नस पर हाथ रख दिया है. एक यूजर ने लिखा, “ज्यादातर शादीशुदा लोग अकेले हैं. सिर्फ समाज के डर से वे इसे जाहिर नहीं करते.” यह वाकई डरावना सच है. लोग एक ही छत के नीचे रहते हैं, एक ही बेड शेयर करते हैं, लेकिन उनके बीच संवाद (Communication) खत्म हो चुका है. यह ‘सोशल लोनलीनेस’ से कहीं ज्यादा खतरनाक है क्योंकि यहाँ आप भीड़ में होकर भी अकेले होते हैं.
बात करना जब बीमारी बन जाए
अकेलेपन का एक दूसरा पहलू भी है. जहाँ कुछ लोग बात करने को तरस रहे हैं, वहीं कुछ लोग अकेलेपन के डर से ‘पीपल प्लीजिंग’ (People Pleasing) का शिकार हो रहे हैं. एक यूजर ने अपना दर्द साझा करते हुए कहा कि वह दूसरों को खुश रखने के लिए जरूरत से ज्यादा बात करता है और तारीफें करता है ताकि कोई उसे छोड़ कर न जाए. एक्सपर्ट्स इसे एक डिसऑर्डर की तरह देखते हैं, जहाँ इंसान खुद को खोकर दूसरों का साथ पाने की कोशिश करता है.
क्या पैसे से खरीदी जा सकती है दोस्ती?
प्रोफेशनल रिलेशनशिप कोचेस का मानना है कि अकेलापन दूर करने के लिए पैसे देना कोई हेल्दी तरीका नहीं है. उनका कहना है:
“आप इंसान का वक्त खरीद सकते हैं, लेकिन उसका लगाव (Intimacy) नहीं. जब आप किसी रिश्ते में पैसा लाते हैं, तो वह ‘दोस्ती’ नहीं बल्कि ‘सर्विस’ बन जाती है. सच्ची दोस्ती में भरोसा और भावनाएं होती हैं, न कि बैंक ट्रांजेक्शन.”
क्यों अकेले हो रहे हैं हम?
डिजिटल दीवार- हमने तकनीक को संवाद का जरिया बनाया था, लेकिन उसने हमें दिलों से दूर कर दिया. अब हम इमोजी तो भेजते हैं, पर उनमें जज्बात गायब होते हैं. सामने बैठकर आंखों में आंखें डालकर की जाने वाली बातें अब व्हाट्सएप के ‘सीन’ और ‘ब्लू टिक’ में सिमट गई हैं.
दिखावे की संस्कृति- सोशल मीडिया पर हर कोई अपनी जिंदगी को परफेक्ट दिखाने की रेस में लगा है. सब ‘हैप्पी’ और ‘कूल’ दिखना चाहते हैं, जिससे हमारा असली दर्द और अकेलापन फिल्टर के पीछे छिप जाता है. हम अपनी कमजोरी दिखाने से डरते हैं क्योंकि समाज में भरोसे की कमी हो गई है. लोग जज होने के डर से अपनी बात नहीं कह पाते, उन्हें लगता है कि उनकी तकलीफ का मजाक उड़ाया जाएगा.
यह खबर सिर्फ एक शख्स की कहानी नहीं, बल्कि हम सबके लिए एक चेतावनी है. अगर आपके पास कोई ऐसा है जिससे आप बिना किसी झिझक के बात कर सकते हैं, तो यकीन मानिए आप उस 27 साल के रईस युवक से कहीं ज्यादा अमीर हैं. तकनीक का इस्तेमाल कीजिए, लेकिन अपनों का हाथ थामना मत छोड़िए. आखिर इंसान को इंसान ही चाहिए!





