चुनाव में करारी हार के बाद ईडी की कार्रवाई, केरल में सीपीएम पर सबसे कमजोर दौर में बीजेपी का ‘निशाना’!


ईडी की कार्रवाई जांच का हिस्सा है या राजनीतिक हथकंडा है, यह समय बताएगा। लेकिन राजनीति में समय को कभी संयोग नहीं माना जाता। अब केरल में यह चर्चा तेज हो गई है कि बीजेपी शायद कांग्रेस के बजाय कमजोर पड़ती सीपीआई(एम) की जमीन में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।

चुनाव में करारी हार के बाद ईडी की कार्रवाई, केरल में सीपीएम पर सबसे कमजोर दौर में बीजेपी का 'निशाना'!

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केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन से जुड़े ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी को सिर्फ एक वित्तीय जांच के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे राज्य की बदलती राजनीतिक तस्वीर से जोड़कर भी समझा जा रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी ने अब सीपीआई (एम) पर उसी समय हमला बोला है, जब पार्टी अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रही है।

विजयन पर ईडी की यह कार्रवाई ऐसे वक्त हुई है, जब सिर्फ 23 दिन पहले ही कांग्रेस नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने केरल विधानसभा चुनाव में सीपीएम के नेतृत्व वाले एलडीएफ को हराकर जोरदार वापसी की थी। 140 सदस्यीय विधानसभा में यूडीएफ ने 102 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की, जबकि कभी मजबूत माने जाने वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) की सीटें 99 से घटकर सिर्फ 35 रह गईं। यह हार सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि विजयन के लिए व्यक्तिगत झटका भी मानी जा रही है, क्योंकि लंबे समय तक सरकार और पार्टी संगठन पर उनकी मजबूत पकड़ रही थी।

केरल हमेशा से बीजेपी के लिए चुनौतीपूर्ण राज्य रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौर तक पार्टी केंद्र में मजबूत रही, लेकिन केरल में उसे कभी बड़ी चुनावी सफलता नहीं मिली। राज्य की राजनीति पर लंबे समय से दो गठबंधनों (कांग्रेस नेतृत्व वाला यूडीएफ और सीपीआई (एम) नेतृत्व वाला एलडीएफ) का दबदबा रहा है। यही वजह रही कि दूसरे राज्यों की तरह कांग्रेस के बड़े नेताओं का बीजेपी में जाना यहां देखने को नहीं मिला।

अब राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बीजेपी अपनी रणनीति बदल सकती है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के उदाहरण अक्सर इस चर्चा में सामने आते हैं। पश्चिम बंगाल में तीन दशक के वाम शासन के बाद पहले सीपीआई (एम) का कैडर तृणमूल कांग्रेस की ओर गया और बाद में बीजेपी वहां मुख्य विपक्षी ताकत बनकर उभरी। त्रिपुरा में भी कभी अभेद्य माने जाने वाले वामपंथी संगठन का बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे बीजेपी के साथ जुड़ता गया, जिसने अंततः पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया।

ऐसे में केरल में ईडी की कार्रवाई को सिर्फ जांच तक सीमित नहीं माना जा रहा। चुनावी हार के बाद पी. विजयन की पकड़ कमजोर हुई है और कार्यकर्ताओं का मनोबल भी गिरा हुआ दिखाई दे रहा है। माना जा रहा है कि बीजेपी इस मौके को सीपीआई (एम) के संगठनात्मक ढांचे को कमजोर करने के अवसर के रूप में देख सकती है। हालांकि ईडी की कार्रवाई पूरी तरह जांच का हिस्सा है या राजनीतिक समयबद्धता के तहत की गई है, इस पर बहस जारी रहेगी। लेकिन राजनीति में समय को कभी संयोग नहीं माना जाता। और अब केरल में यह चर्चा तेज हो गई है कि बीजेपी शायद कांग्रेस के बजाय कमजोर पड़ती सीपीआई(एम) की जमीन में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।




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