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Eating on Banana leaf : दक्षिण भारत में अक्सर आपने लोगों को केले के पत्तों पर खाते हुए देखा होगा. उत्तर भारत में भी पहले जब सामुहिक भोज का आयोजन किया जाता था, तब लोग केले के पत्ते पर ही भोजन करते थे. लेकिन अब उत्तर भारत में शायद ही कोई केले के पत्ते पर भोजन करता हो. हालांकि दक्षिण भारत में केले के पत्ते पर भोजन करने की परंपरा आज भी कायम है. अंगर आप होटल भी जाएंगे तो भले ही आपको प्लेट में भोजन मिले लेकिन प्लेट के अंदर छोटा सा केले का पत्ता जरूर होगा. केले के पत्ते पर भोजन करने की दक्षिण भारतीय परंपरा भले ही गहरे सांस्कृतिक और सामाजिक चलन का हिस्सा हो लेकिन इसके पीछे गहरा विज्ञान भी जुड़ा है और इससे सेहत को कई फायदे भी हैं.
पहले जानिए कि दक्षिण भारत में केले के पत्तों पर भोजन करने की परंपरा क्यों है. दरअसल, दक्षिण भारत में केले के पत्ते पर भोजन करने की परंपरा बहुत पुरानी है. दो हजार साल पुराने संगम साहित्य में भी इसका जिक्र है. इसे सनातन परंपरा सबसे शुद्ध और पवित्र माना गया है. पूरे देश भर में किसी भी शुभ कार्य, पूजा या विवाह में भगवान को भोग लगाने और मेहमानों को भोजन कराने के लिए केले के पत्ते का ही इस्तेमाल किया जाता है. पत्ता बिछाकर जमीन पर बैठकर भोजन करना विनम्रता और समानता का प्रतीक है, जहां राजा और रंक एक साथ बैठते हैं. चूंकि केले के पौधे दक्षिण भारत में आज भी बहुतायात में होते हैं, इसलिए यह परंपरा आज भी वहां कायम है.

आयुर्वेद के अनुसार केले के पत्ते पत्ते पर भोजन करना केवल एक परंपरा नहीं बल्कि संपूर्ण स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का एक प्राकृतिक माध्यम है. केले का पत्ता अग्निदोष को दूर करने के लिए शानदार है. यह पाचन तंत्र के लिए भी उत्तम माना जाता है. आयुर्वेद के मुताबिक केले के पत्ते की हरी सतह एकदम कोमल और शीतल होती है. इससे भोजन जल्दी ही ठंडा होने लगता है. साथ ही केले के पत्ते से निकलने वाली खुशूब दिमाग को शांत कर भूख को तेज करता है.

केले के पत्ते पर भोजन करने से वात्त, पित्त और कफ दोष दूर होता है. इससे जठराग्नि यानी पेट में पाचन की अग्नि संतुलित होती है. केले के पत्ते पर किसी अन्य सूक्ष्म जीव का साया नहीं होता है. इसलिए यह कीटनाशकों से मुक्ति दिलाता है. यह पूरी तरह से शुद्ध और रसायन-मुक्त माध्यम है. प्लास्टिक या प्लास्टिक-कोटेड बर्तनों के विपरीत, इसमें किसी भी तरह के हानिकारक टॉक्सिन्स भोजन में नहीं घुलते. इसका परिणाम यह होता है कि यह शरीर आंतरिक रूप से स्वच्छ रखता है.
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केले के पत्तों पर भोजन करने के कई वैज्ञानिक कारण भी है. केले के पत्ते में कई तरह के पॉलीफेनोल्स कंपाउड होते हैं. ये सब एंटीऑक्सीडेंट्स हैं. जब इन पर गर्म खाना परोसा जाता है, तो ये पोषक तत्व भोजन में मिल जाते हैं. एंटीऑक्सीडेंट्स हमारे शरीर में फ्री रेडिकल्स को कम करता है जिससे ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस भी कम होता है. जब शरीर में एंटीऑक्सीडेंट्स बढ़ेगा तो कई तरह की क्रोनिक बीमारियों का खतरा भी कम हो जाएगा. इससे कैंसर का जोखिम भी कम हो सकता है.

केले के पत्ते में एंटी-ऑक्सीडेंट के अलावा एंटी-एजिंग गुण भी होता है. इसमें भारी मात्रा में एपिगैलोकैटेचिन गैलेट जैसे पॉलीफेनोल्स पाए जाते हैं. यह शरीर की कोशिकाओं को नुकसान से बचाता है. इससे कोशिकाएं जल्दी बूढ़ी नहीं होती है. इसमें एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण भी है. केले के पत्तों पर मोम जैसी एक प्राकृतिक परत होती है. इसमें ऐसे कंपाउड होते हैं जो हानिकारक बैक्टीरिया और फंगस को पनपने नहीं देते, जिससे इस पर रखा भोजन स्वाभाविक रूप से सुरक्षित रहता है.

आज के समय में केले के पत्ते का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह बायोडिग्रेडेबल और इको-फ्रेंडली है. केले के पत्ते का इस्तेमाल के बाद यह कुछ ही दिनों में मिट्टी में मिलकर खाद बन जाता है, जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता. केले के पत्ते की ऊपरी सतह पर मोम जैसी जो कोमल परत होती है उससे भोजन में एक विशिष्ट मिट्टी जैसी सोंधी खुशबू होती है. इससे भोजन का स्वाद भी बढ़ जाता है. दक्षिण भारत में पत्ते को बिछाने और उस पर खाना परोसने का भी एक नियम है. पत्ते का नुकीला हिस्सा हमेशा बाईं ओर रखा जाता है और भोजन के बाद पत्ते को अपनी ओर मोड़कर बंद करना इस बात का प्रतीक है कि आप भोजन से पूरी तरह संतुष्ट हैं.





