इजरायल और अमेरिकी की दोस्ती पर युद्ध विराम का क्या फर्क पड़ेगा? एक्सपर्ट ने समझाया


‘इजरायल को ये समझौता मानना ही होगा और कोई रास्ता नहीं. हां ये हो सकता है वो लेबनान में कुछ न कुछ करता रहे. छोटे-मोटे हमले चलते रहें. उसके पास दुनिया की सबसे ताकतवर एजेंसी मोसाद है, हो सकता है वो मोसाद के जरिए कुछ करा दे और इल्जाम ईरान पर डाल दे. मगर अभी के लिए ये समझौता उससे मानना ही होगा. इस पीस डील में सबसे बड़ा विनर ईरान है. ईरान के हिसाब से उसने परमाणु हथियार से भी बड़ा सुपर वेपन बना लिया है. वो है होर्मुज. ईरान, होर्मुज कभी भी बंद कर सकता है. अमेरिका ने अपनी पूरी ताकत लगा ली, मिसाइल लगा लीं, नेवी लगा लीं मगर इसके दम पर वो होर्मुज नहीं खुलवा पाया. इसका सबसे बड़ा फायदा ईरान को हुआ है. ईरान इस डील में विनर बनकर उभरा है और इससे वो इजराइल पर ज्यादा हमलावर रहेगा साथ ही मिडिल ईस्ट के देशों पर भी अपनी चला सकेगा. ‘

हालांकि, अगर आप इतिहास में थोड़ा पीछे जाएं तो आप पाएंगे कि अमेरिका ने इजराइल का किस तरह ख्याल रखा है और क्यों?

दुनिया के नक्शे पर अगर आप दो ऐसे देशों को ढूंढेंगे जो एक-दूसरे के लिए जान देने और जान लेने को तैयार रहते हैं, तो वो नाम हैं, अमेरिका और इजरायल. इनकी दोस्ती को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ‘पवित्र’ और ‘अटूट’ माना जाता रहा है. लेकिन आज के वक्त का पहिया ऐसा घूमा है कि इसी अटूट दोस्ती के बीच गहरी दरारें और कड़वाहट दिख रही है.

अमेरिका ने ईरान के साथ मिलकर एक ऐतिहासिक पीस डील पर साइन कर दिए हैं. इस डील के बाद पूरी दुनिया पूछ रही है, क्या अमेरिका और इजरायल की दशकों पुरानी दोस्ती अब टूट जाएगी? ट्रंप और नेतन्याहू के बीच ऐसा क्या हुआ कि बात गुस्से और तल्खी तक पहुंच गई?

1. कब और कैसे हुई इस ‘फेविकोल’ जैसी दोस्ती की शुरुआत?

साल 1948 – जब दुनिया के नक्शे पर आया इजरायल: दूसरे विश्व युद्ध के बाद, 14 मई 1948 को जब इजरायल ने खुद को एक स्वतंत्र देश घोषित किया, तो उसके ठीक 11 मिनट बाद अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने इजरायल को एक देश के रूप में मान्यता दे दी थी. ऐसा करने वाला अमेरिका दुनिया का पहला देश था.

इसके पीछे सिर्फ सहानुभूति नहीं थी, बल्कि बड़ी कूटनीति थी. मिडिल ईस्ट एक ऐसा इलाका था जहां दुनिया का सबसे ज्यादा तेल था. अमेरिका को इस पूरे इलाके पर नजर रखने और सोवियत संघ (रूस) के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए वहां एक ऐसा वफादार दोस्त चाहिए था जो उसकी भाषा बोले. इजरायल अमेरिका के लिए वही ‘अड्डा’ बना. तब से लेकर आज तक, अमेरिका में सरकार चाहे रिपब्लिकन पार्टी की आए या डेमोक्रेट्स की, इजरायल की मदद करना अमेरिकी विदेश नीति का पहला नियम बन गया.

2. जब दोनों ने मिलकर लड़े युद्ध
अमेरिका और इजरायल ने सिर्फ कागजों पर दोस्ती नहीं निभाई, बल्कि युद्ध के मैदान में एक-दूसरे का खूब साथ दिया है.

1967 का ‘सिक्स-डे वॉर’: इस युद्ध में इजरायल ने अकेले अपने चारों तरफ के अरब देशों मिस्र, सीरिया, जॉर्डन को सिर्फ 6 दिनों में धूल चटा दी. इस युद्ध के बाद अमेरिका को समझ आ गया कि इजरायल मिडिल ईस्ट का सबसे ताकतवर योद्धा है. अमेरिका ने इजरायल को आधुनिक फाइटर जेट्स और मिसाइलें देना शुरू कर दिया.

1973 का ‘योम किप्पुर युद्ध’: अरब देशों ने इजरायल पर अचानक हमला कर दिया था और इजरायल हारने की कगार पर था. तब अमेरिका ने रातों-रात अपने हथियारों के गोदाम खोल दिए और ‘ऑपरेशन निकेल ग्रास’ के जरिए इजरायल को इतने हथियार पहुंचाए कि इजरायल ने हारी हुई बाजी को जीत में बदल दिया.

हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार और दाता: अमेरिका हर साल इजरायल को बिना किसी शर्त के लगभग 3.8 अरब डॉलर यानी करीब ₹31,000 करोड़ की सैन्य मदद देता है. इसके बदले में इजरायल अमेरिका को मिडिल ईस्ट की पल-पल की खुफिया जानकारी देता है.

3. गाजा जंग और लेबनान सीजफायर का वो ‘पेच’ जिसने रिश्तों में खटास घोली
कहानी में असली ट्विस्ट आया अक्टूबर 2023 में जब हमास ने इजरायल पर हमला किया. इसके बाद इजरायल ने गाजा को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया. युद्ध सिर्फ गाजा तक नहीं रुका, यह लेबनान और सीधे ईरान तक पहुंच गया. अमेरिका ने इस युद्ध में इजरायल का पूरा साथ दिया, अरबों डॉलर के बम और गोले भेजे. लेकिन युद्ध जब ढाई साल से ज्यादा खिंच गया, तो दुनिया भर में अमेरिका की थू-थू होने लगी.

लेबनान सीजफायर
कुछ समय पहले अमेरिका के भारी दबाव के बाद इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच लेबनान फ्रंट पर कुछ समय के लिए सीजफायर की बात बनी. लेकिन इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक ऐसी शर्त रख दी जिसने अमेरिका को भड़का दिया. नेतन्याहू ने साफ कहा कि भले ही सीजफायर हो जाए, लेकिन अगर हिजबुल्लाह ने थोड़ी सी भी हलचल की, तो इजरायल लेबनान के भीतर घुसकर दोबारा हमला करने से पीछे नहीं हटेगा. अमेरिका चाहता था कि ये एक परमानेंट शांति समझौता हो ताकि मिडिल ईस्ट में व्यापार और तेल की सप्लाई सामान्य हो सके. लेकिन इजरायल युद्ध को खत्म करने के मूड में बिल्कुल नहीं था.

4. जब डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू पर उतारा अपना गुस्सा
जब अमेरिका की कमान दोबारा डोनाल्ड ट्रंप के हाथों में आई, तो पूरी दुनिया को लगा कि ट्रंप तो इजरायल के पक्के यार हैं, वो नेतन्याहू को खुला हाथ दे देंगे. ट्रंप का मानना था कि इजरायल के इस अंतहीन युद्ध की वजह से अमेरिका के अरबों डॉलर पानी की तरह बह रहे हैं और इंटरनेशनल मार्केट में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे अमेरिकी जनता परेशान हो रही है.

ट्रंप का वो गुस्सा
सूत्रों और कूटनीतिक गलियारों से जो खबरें आईं, उसके मुताबिक ट्रंप ने बेंजामिन नेतन्याहू पर सीधा और तीखा गुस्सा निकाला. ट्रंप ने फोन पर बेहद कड़े शब्दों में नेतन्याहू से कहा,

“बस बहुत हुआ बिबी (नेतन्याहू का निकनेम)! यह युद्ध अब बंद होना चाहिए. आप अमेरिकी टैक्सपेयर्स के पैसे पर इस जंग को हमेशा के लिए नहीं खींच सकते. हमें अपने देश की इकोनॉमी देखनी है, दुनिया की शांति देखनी है. अगर आप नहीं रुके, तो अमेरिका को अपने फैसले खुद लेने होंगे.” ये इजरायल के लिए सबसे बड़ा शॉक था. जिस अमेरिका के भरोसे वो पूरी दुनिया से लड़ रहा था, उसी अमेरिका का राष्ट्रपति अब आंखें दिखा रहा था.

5. गेम चेंजर स्ट्रोक
जब नेतन्याहू युद्ध रोकने को तैयार नहीं हुए, तो ट्रंप ने एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला जिसकी उम्मीद इजरायल ने सपने में भी नहीं की थी. अमेरिका ने इजरायल को बाईपास करके सीधे उसके सबसे बड़े दुश्मन ईरान के साथ पीस डील पर साइन कर दिए! इस पीस डील को करवाने में पर्दे के पीछे एक बहुत बड़ा खेल हुआ, जिसमें तीन देशों ने मुख्य भूमिका निभाई. कतर, पाकिस्तान और तुर्की.

इस पीस डील में क्या तय हुआ?

ईरान को क्या मिला: दुनिया भर के बैंकों में फ्रीज पड़े ईरान के अरबों डॉलर वापस मिलने का रास्ता साफ हुआ. साथ ही, ईरान के पुनर्निर्माण के लिए $300 बिलियन का एक विशाल इन्वेस्टमेंट फंड तैयार किया जा रहा है, जिसका बड़ा हिस्सा खाड़ी के अमीर देश देंगे).

अमेरिका को क्या मिला: ईरान ने वादा किया है कि वह ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ से जहाजों पर हमले रोकेगा, लाल सागर में शांति बहाल होगी और कच्चे तेल की कीमतें तुरंत नीचे आएंगी जो डील साइन होते ही $80 से नीचे गिर भी गईं.

6. अब इजरायल और अमेरिका की दोस्ती पर क्या फर्क पड़ेगा?
इस ऐतिहासिक समझौते के बाद अमेरिका और इजरायल के रिश्ते अब पहले जैसे नहीं रहेंगे. इसके 4 बड़े प्रभाव आने वाले समय में दिखने वाले हैं.

A. इजरायल खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है
इजरायल के लिए ईरान एक ऐसा देश है जो परमाणु बम बनाकर इजरायल को मिटाना चाहता है. अब जब अमेरिका ने उसी ईरान से हाथ मिला लिया है और उस पर से प्रतिबंध हटा रहा है, तो इजरायल को लग रहा है कि उसके सबसे भरोसेमंद दोस्त ने ही उसकी पीठ में छुरा घोंप दिया.

B. नेतन्याहू की राजनीतिक जमीन खिसकेगी
बेंजामिन नेतन्याहू की पूरी राजनीति ‘ईरान के डर’ और ‘युद्ध’ पर टिकी है. अब जब अमेरिका ही शांति की बात कर रहा है, तो इजरायल की जनता नेतन्याहू से पूछेगी कि इस अंतहीन युद्ध से देश को क्या मिला? इजरायल के भीतर नेतन्याहू को इस्तीफा देने के लिए दबाव बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा.

C. क्या अमेरिका हथियारों की सप्लाई रोक देगा?
नहीं, दोस्ती इतनी जल्दी पूरी तरह नहीं टूटती. अमेरिका अभी भी इजरायल को हथियार देता रहेगा क्योंकि अमेरिकी संसद में इजरायल का बहुत तगड़ा होल्ड है. लेकिन अब अमेरिका के उन हथियारों पर ‘शर्तें’ लागू होंगी. इजरायल अब अपनी मर्जी से जब चाहे जहां चाहे बमबारी नहीं कर पाएगा.

C. मिडिल ईस्ट का नया पावर बैलेंस
अब तक मिडिल ईस्ट की राजनीति का सीधा नियम था, अमेरिका + इजरायल + सऊदी अरब एक तरफ, और ईरान दूसरी तरफ. लेकिन इस डील के बाद ये बैलेंस बिगड़ गया है. अब अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के रास्ते खुल गए हैं, जिससे इजरायल इस पूरे इलाके में थोड़ा अलग-थलग पड़ सकता है.



Source link

Latest articles

spot_imgspot_img

Related articles

spot_imgspot_img