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ब्रह्मांड के सबसे खूंखार और रहस्यमयी ‘ब्लैक होल’ को लेकर एक ऐसी स्टडी सामने आई है जिसने बरसों पुरानी वैज्ञानिक मान्यताओं को हिलाकर रख दिया है. कार्डिफ यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स का दावा है कि अंतरिक्ष के सबसे विशालकाय ब्लैक होल केवल मरते हुए तारों से नहीं बनते, बल्कि वे घने तारा समूहों के भीतर एक-दूसरे को ‘निगलकर’ विशाल रूप लेते हैं. ‘मास गैप’ के भीतर मिले इन भारी-भरकम ब्लैक होल्स ने साबित कर दिया है कि ये ‘सीरियल मर्जर’ का नतीजा हैं, जहां छोटे ब्लैक होल बार-बार आपस में टकराते हैं और एक काला राक्षस बन जाते हैं.
ब्लैक होल थ्योरी
कैलिफोर्निया: ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों में से एक ‘ब्लैकहोल’ को लेकर वैज्ञानिकों ने एक ऐसा खुलासा किया है जो अब तक की सारी थ्योरी को पलट कर रख सकता है. दावा किया जा रहा है कि अंतरिक्ष के सबसे विशालकाय ब्लैक होल शायद किसी मरते हुए तारे से नहीं, बल्कि ‘सीरियल किलर’ की तरह एक के बाद एक दूसरे ब्लैक होल्स को निगलने से बने हैं. वैज्ञानिकों ने खुद इस विशालकाय ‘काले राक्षस’ को बनते हुए देखा तो हैरान रह गए. कार्डिफ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की एक नई स्टडी ने दावा किया है कि ये ‘ब्रह्मांडीय राक्षस’ यानी ब्लैकहोल तब बना जब तारा समूह पहले आपस में टकराए और फिर एक-दूसरे से मिल गए.
कैसे बनता है विशालकाय ‘ब्लैकहोल’?
अब तक यही माना जाता था कि जब कोई बड़ा तारा मरता है तो वो सिमटकर ब्लैकहोल बन जाता है. लेकिन LIGO-Virgo-KAGRA जैसे पावरफुल उपकरणों से जो डेटा मिला है, उसने पुरानी रिसर्च की हवा निकाल दी है. डेटा में कुछ ऐसे ‘भारी-भरकम’ ब्लैक होल मिले हैं जो किसी एक तारे के टूटने से बन ही नहीं सकते. वैज्ञानिकों का मानना है कि ये काले राक्षस ‘स्टेप-बाय-स्टेप’ बड़े हुए हैं. ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक छोटा ब्लैकहोल अपने पास वाले छोटे ब्लैकहोल को निगल जाए. बताया जा रहा है कि एक-दूसरे में समा जाने का ये खेल करोड़ों सालों से चल रहा है, जिससे विशालकाय ब्लैकहोल तैयार हुआ है.
ग्लोबुलर क्लस्टर्स: ब्लैक होल्स का ‘अखाड़ा’
अंतरिक्ष में कुछ जगहें ऐसी हैं जिन्हें ग्लोबुलर क्लस्टर कहा जाता है. आप इन्हें सितारों का ‘भीड़भाड़ वाला इलाका’ समझ सकते हैं, जहां लाखों तारे एक छोटी सी जगह में ठुंसे होते हैं. यहां गुरुत्वाकर्षण इतना भयानक होता है कि ब्लैकहोल एक-दूसरे से दूर नहीं रह पाते. वे लगातार एक-दूसरे के करीब खिंचते हैं और अंत में टकराकर एक-दूसरे में समा जाते हैं और एक ‘काले राक्षस’ यानी विशालकाय ब्लैकहोल का रूप ले लेते हैं.
धरती से 28,000 प्रकाश वर्ष दूर बैठा M80 क्लस्टर इसका सबसे बड़ा सबूत है. यहां ब्लैकहोल्स के बीच हर वक्त ‘गैंगवार’ जैसी स्थिति रहती है. वैज्ञानिकों ने जब 153 ब्लैक होल मर्जर के डेटा को खंगाला, तो उन्हें दो तरह के ब्लैक होल मिले.
शरीफ ब्लैक होल: ये कम वजन के होते हैं और तमीज से एक ही दिशा में घूमते हैं. ये मरते हुए तारों से बनते हैं.
खूंखार ब्लैक होल: इनका वजन बहुत ज्यादा होता है और ये पागलों की तरह बहुत तेज घूमते हैं. सबसे बड़ी बात, इनके घूमने की कोई तय दिशा नहीं होती, ये बेतरतीब ढंग से नाचते हैं. यही इस बात का पक्का सबूत है कि ये कई टक्करों और ‘लड़ाइयों’ के बाद बने हैं.
‘मास गैप’ का रहस्य: पुरानी थ्योरी हुई फुस्स
पुरानी साइंस थ्योरी कहती है कि सूरज से 45 गुना ज्यादा वजन वाले तारे सीधे ब्लैक होल नहीं बन सकते, क्योंकि वे फटने के बाद पूरी तरह बिखर जाते हैं. इसे वैज्ञानिक ‘मास गैप’ कहते हैं लेकिन नई स्टडी ने यहां भी सबको चौंका दिया है. इस गैप के बीच में भी बहुत भारी ब्लैक होल मिले हैं. इसका सीधा मतलब है कि ये किसी तारे की मौत से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे ब्लैकहोल्स के आपस में ‘जुड़ने और एक-दूसरे को निगल जाने’ से तैयार हुए हैं.
सच तो ये है कि ब्रह्मांड केवल ब्लैक होल बना ही नहीं रहा, बल्कि उन्हें ‘रिसाइकिल’ भी कर रहा है. घने तारा समूहों के भीतर चल रही ये टक्करों और निगलने का दौर ही इन ब्रह्मांडीय राक्षसों को जन्म दे रहा है.
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Utkarsha Srivastava is seasoned digital journalist specializing in geo-politics issues, currently writing for World section of News18 Hindi. With over a decade of extensive experience in hindi digital media, sh…और पढ़ें





