इस सियासी गहमागहमी के बीच, कांग्रेस आलाकमान द्वारा भूपेश बघेल को पंजाब प्रभारी के पद से हटाकर कमान सचिन पायलट को सौंपने का फैसला पहली नजर में एक सामान्य फेरबदल लग सकता है। लेकिन गहराई से देखें, तो यह एक बड़ा और रणनीतिक सुधार है।
फरवरी 2025 में जिम्मेदारी पाने वाले भूपेश बघेल का काम कम-से-कम तीन धड़ों में बंटी पंजाब कांग्रेस को एक सूत्र में पिरोना था- एक तरफ चरणजीत चन्नी और सुखजिंदर रंधावा, दूसरी तरफ नेता प्रतिपक्ष प्रताप बाजवा का खेमा, और तीसरे छोर पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग। सबको एकजुट करने के बजाय बघेल खुद एक गुट बन बैठे, और उन पर वड़िंग खेमे के प्रति खुले तौर पर पक्षपाती होने के आरोप लगे। यहां तक कि जुलाई में राहुल गांधी द्वारा किए गए संगठन फेरबदल-जिसमें वड़िंग को बनाए रखते हुए चन्नी को चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख और रंधावा को कोर कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया था- के बाद भी खींचतान थमी नहीं। पायलट की ताजपोशी संकेत है कि राहुल गांधी की राज्यव्यापी यात्रा से पहले चन्नी खेमे, जिसमें अधिकतर वरिष्ठ नेता हैं, को साधने की योजना है।
चन्नी, रंधावा और वड़िंग- तीनों ने सार्वजनिक रूप से पायलट की नियुक्ति का स्वागत किया है। 2022 के बाद से शायद ही किसी मुद्दे पर सहमत होने वाली इस तिकड़ी में ऐसी सर्वसम्मति का यह दुर्लभ क्षण था। सियासी गलियारों में अब यह सवाल गूंज रहा है कि क्या वड़िंग प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी बचा पाएंगे? चर्चा है कि आलाकमान उन्हें किसी ‘अन्य जिम्मेदारी’ के बहाने दिल्ली बुला सकता है- जो कांग्रेस की कार्यशैली में सम्मानजनक विदाई का दूसरा नाम है। वैसे, यहां एक बड़ा सबक छिपा है। कांग्रेस आलाकमान, गलतियों को सुधारने- कार्यकर्ताओं को सुनने, फेरबदल करने और सबको साथ लेकर चलने-का माद्दा रखता है, जबकि भाजपाई नेतृत्व फैसले थोपने में यकीन रखता है।




