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अमेरिका में नवंबर के मध्यावधि चुनाव से पहले मेल के जरिए वोटिंग को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मेल वोटिंग के नियमों को सख्त करना चाहते हैं, जबकि कई राज्य और मतदान अधिकार संगठन इसका विरोध कर रहे हैं. अब सुप्रीम कोर्ट ने इस ऑर्डर पर लगी कोर हटा दी है.
डोनाल्ड ट्रंप
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन को उनके नए मेल वोटिंग नियम पर लगी रोक को हटा दिया है. निचली अदालत के उस आदेश पर रोक लगाई थी. यह फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए राहत की खबर है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ट्रंप का पूरा आदेश अब तुरंत लागू हो जाएगा. सोनिया सोतोमयोर और केतनजी ब्राउन जैक्सन इस फैसले के विरोध में खड़ी थीं. उन्होंने इस फैसले को बेहद खराब बतााय है.
कौन हैं सोनिया और केतनजी?
सोनिया सोतोमयोर और केतनजी ब्राउन जैक्सन दोनों को अदालत के उदारवादी धड़े का हिस्सा माना जाता है. कई अहम मामलों में दोनों का रुख नागरिक अधिकारों और मतदान अधिकारों के पक्ष में रहा है. सोनिया सोतोमयोर अदालत में वह उदारवादी विचारों की प्रमुख आवाज मानी जाती हैं. वे मतदान अधिकार, नागरिक अधिकार तथा सामाजिक न्याय से जुड़े मामलों में अक्सर अपनी मजबूत राय रखती हैं. केतनजी ब्राउन जैक्सन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की पहली अश्वेत महिला जस्टिस हैं. सुप्रीम कोर्ट में आने से पहले वह अमेरिकी कोर्ट ऑफ अपील्स की जज थीं.
केतनजी ब्राउन जैक्सन ने जताया विरोध
सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ एक रोक हटाई है. दूसरी रोक अभी भी कायम है, इसलिए मामला अभी पूरी तरह साफ नहीं हुआ है. लेकिन इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट की उदारवादी जस्टिस केतनजी ब्राउन जैक्सन बेहद नाराज हैं. उन्होंने अपने ही साथी जजों के फैसले पर तीखी आपत्ति जताई है. उन्होंने कहा कि इस साल होने वाले अमेरिकी चुनावों में अराजकता और अनिश्चितता पैदा हो सकती है.
जैक्सन ने फैसले को बताया गंभीर गलती
केतनजी ने 23 पन्नों की अपनी असहमति में लिखा कि यह मामला कोई मुश्किल फैसला नहीं था. अदालत को ट्रंप प्रशासन को मेल वोटिंग के नियमों में आगे बढ़ने की इजाजत नहीं देनी चाहिए थी. उन्होंने अपने साथी जजों पर जमीनी हालातों की सही जानकारी न होने का आरोप लगाया.
जैक्सन का कहना था कि अगर सरकार राज्यों की चुनाव व्यवस्था में दखल देने की कोशिश कर रही है. संविधान इसकी अनुमति नहीं देता है. इसे आगे बढ़ने देना गंभीर कानूनी गलती होगी.
जैक्सन के अलावा जस्टिस सोनिया सोतोमेयर भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ खड़ी दिखीं. उन्होंने कहा कि राज्यों को आदेश को चुनौती देने के लिए इंतजार नहीं करना चाहिए. आज के फैसले में इस बात पर विचार नहीं किया गया है कि नवंबर 2026 के चुनावों के राज्यों के प्रशासन में राष्ट्रपति का दखल करना कानूनन है या नहीं.
ट्रंप को मिली राहत, लेकिन रास्ता अभी पूरी तरह साफ नहीं
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ट्रंप प्रशासन को मध्यावधि चुनावों से पहले अपने एग्जीक्यूटिव ऑर्डर को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने का मौका मिला है. लेकिन अहम बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह तय नहीं किया है कि ट्रंप का पूरा आदेश कानूनी और संवैधानिक है या नहीं. यानी ट्रंप को फिलहाल कानूनी लड़ाई में बढ़त मिली है, लेकिन अंतिम फैसला अभी बाकी है.
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