ईरान के साथ जारी टकराव अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए चुनौती बनता जा रहा है. एक तरफ इजरायल ईरान पर और सख्त कार्रवाई चाहता है, तो दूसरी ओर सऊदी अरब तनाव कम करने की सलाह दे रहा है. ऐसे में ट्रंप दोनों सहयोगी देशों के बीच फंसते नजर आ रहे हैं.
व्हाइट हाउस में इस हफ्ते लगातार दो दिनों तक अहम बैठकें हुईं. पहले दिन इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप से मुलाकात की. इसके अगले ही दिन सऊदी अरब के रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान अचानक व्हाइट हाउस पहुंचे. वहां सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का संदेश ट्रंप तक पहुंचाया.
इजरायल बोला- दबाव बढ़ाइए
सूत्रों के मुताबिक, नेतन्याहू ने ट्रंप से कहा कि ईरान के साथ बातचीत से कोई नतीजा नहीं निकलेगा. उनका मानना है कि तेहरान पर सैन्य और आर्थिक दबाव और बढ़ाया जाना चाहिए. जरूरत पड़ी तो बड़े सैन्य अभियान पर भी विचार किया जा सकता है.
सऊदी ने कहा- जंग रोकिए
वहीं, सऊदी अरब का रुख बिल्कुल अलग रहा. सऊदी नेतृत्व ने ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से कहा कि तनाव कम करने की कोशिश की जाए, क्योंकि लंबी जंग पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर सकती है.
अमेरिका के भीतर पहुंचे ईरानी हमले!
अमेरिका के सबसे अहम वाटर सप्लाई सिस्टम और प्लांट्स पर बड़े पैमाने पर साइबर अटैक हुए हैं. हैकर्स ने सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी करीब 7 जगहों को अपना निशाना बनाया. हालात इतने बिगड़ गए कि कई राज्यों में वाटर सप्लाई को बचाने के लिए ऑटोमैटिक सिस्टम को तुरंत बंद करना पड़ा है. अधिकारियों को हाथों से मैन्युअल काम संभालना पड़ा.
इस घटना का पहला सुराग मिनेसोटा राज्य से मिला. यहां 26 और 27 जुलाई के बीच 30 से ज्यादा कम्युनिटी वाटर सिस्टम्स को हैकर्स ने निशाना बनाया था. जब मिनेसोटा आईटी सर्विसेज ने जांच शुरू की, तो पता चला कि किसी ने जानबूझकर पानी की सप्लाई कंट्रोल करने वाले डिजिटल सिस्टम का एक्सेस अपने हाथ में ले लिया था.
इस साइबर हमले ने अमेरिकी राजनीति और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है. पूरी दुनिया जहां इस हमले के पीछे ईरान का हाथ होने का शक जता रही है, वहीं ट्रंप फिलहाल सीधे तौर पर ईरान का नाम लेने से बचते दिख रहे हैं.
बातचीत की उम्मीद फिलहाल कम
हालांकि ट्रंप लगातार कहते रहे हैं कि ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि दोनों देशों के बीच सीधे बातचीत जल्द शुरू होने की संभावना नहीं दिख रही. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का मानना है कि ईरान के प्रभावशाली सैन्य समूह अब भी हॉर्मुज को लेकर दबाव बनाने और अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल हमले जारी रखने की रणनीति पर कायम हैं.
बताया जा रहा है कि ईरान के रवैये से ट्रंप भी नाराज हैं. इसी वजह से उन्होंने हाल ही में कैंप डेविड में कैबिनेट की बैठक बुलाकर आगे की रणनीति पर चर्चा की. ट्रंप ने कहा है कि वो जीत चाहते हैं. वे कभी कमजोर होंगे, कभी थोड़ा मजबूत दिखेंगे, लेकिन आखिरकार उनकी ताकत खत्म हो जाएगी.
सैन्य कार्रवाई का विकल्प अभी भी खुला
कूटनीतिक कोशिशें धीमी पड़ने के बीच अमेरिका सैन्य विकल्पों पर भी विचार कर रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने ईरान के मिसाइल ठिकानों पर एक से दो हफ्ते तक चलने वाले हवाई हमलों की योजना तैयार कर ली है. हालांकि अंतिम फैसला ट्रंप को लेना है.
लेकिन अमेरिकी सेना के टॉप अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि सिर्फ हवाई हमलों से सभी लक्ष्य हासिल नहीं किए जा सकते. ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन ने सांसदों से कहा कि “सिर्फ एयर पावर एक लिमिट तक ही कार्रवाई कर सकती है. उन्होंने यह भी चिंता जताई कि अमेरिका के एयर डिफेंस इंटरसेप्टर मिसाइलों का भंडार तेजी से घट रहा है.
कुछ अधिकारियों ने यह भी चेतावनी दी कि अगर ईरान के पुलों, बिजली या पानी से जुड़े बड़े ढांचों पर हमला हुआ तो भारी संख्या में आम नागरिकों की जान जा सकती है. इस पर ट्रंप ने कहा कि वो आम लोगों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते. उनका ऐसा कोई इरादा नहीं है.
अब हॉर्मुज पर टिकी नजर
इस समय सबसे ज्यादा ध्यान हॉर्मुज पर है, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी रास्ते से गुजरता है. सूत्रों के मुताबिक, बातचीत कराने वाले देश ऐसा समझौता कराने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे इस समुद्री मार्ग पर जहाजों की आवाजाही फिर सामान्य हो सके और दोनों पक्ष तनाव कम कर सकें.
अमेरिका में भी बढ़ रहा राजनीतिक दबाव
ईरान के साथ लंबा खिंचता संघर्ष ट्रंप के लिए घरेलू राजनीति में भी मुश्किलें पैदा कर रहा है. रिपब्लिकन नेताओं को डर है कि अगर हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव जारी रहा तो तेल और ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं. इसका असर अगले साल होने वाले मिडटर्म चुनावों में पार्टी को उठाना पड़ सकता है. एक हालिया CNN सर्वे के मुताबिक, सिर्फ 28 प्रतिशत अमेरिकी ही ईरान युद्ध को संभालने के ट्रंप के तरीके से संतुष्ट हैं.
ईरान के अंदर भी बढ़ी अनिश्चितता
अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ईरान के अंदर भी सत्ता को लेकर खींचतान बढ़ गई है. उनका कहना है कि अब इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स का प्रभाव पहले से ज्यादा हो गया है. इससे बातचीत और मुश्किल हो गई है.
ट्रंप ने भी माना कि अब उन्हें यह समझना कठिन हो रहा है कि ईरान में फैसले आखिर कौन ले रहा है. उन्होंने कहा कि पहले जिन लोगों से वो बात कर रहे थे, अब हालात अलग हैं. लोग बात करना चाहते हैं, लेकिन बार-बार अपना वादा तोड़ देते हैं. इससे मुझे सिर्फ गुस्सा आता है.
आगे क्या होगा?
फिलहाल ट्रंप के सामने दो रास्ते हैं. एक ओर इजरायल चाहता है कि ईरान पर और कड़ा सैन्य दबाव बनाया जाए. दूसरी ओर सऊदी अरब का मानना है कि बातचीत और तनाव कम करने का रास्ता ही पूरे क्षेत्र के लिए बेहतर होगा.
ऐसे में पूरी दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि डोनाल्ड ट्रंप आखिर इजरायल की सलाह मानते हैं या सऊदी अरब की, या फिर दोनों के बीच कोई नया कूटनीतिक रास्ता निकालते हैं.




