नई दिल्ली: अमेरिका की दक्षिणी सीमा पर एक ऐसा खतरा मंडरा रहा है, जो किसी हॉरर फिल्म की कहानी जैसा लगता है. हम बात कर रहे हैं न्यू वर्ल्ड स्क्रूवर्म (Cochliomyia hominivorax) की, जिसे ‘मांस खाने वाली मक्खी’ कहा जाता है. यह परजीवी मक्खी मेक्सिको के रास्ते उत्तर की ओर बढ़ते हुए अब अमेरिकी सीमा से कुछ ही सौ मील की दूरी पर पहुंच गई है. मेक्सिको के दो राज्यों- तमाउलिपास और नुएवो लियोन में इसके मामले सामने आए हैं, जिनकी सीमा टेक्सास से लगती है. यह मक्खी केवल जानवरों के लिए ही नहीं, बल्कि इंसानों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकती है. 1950 के दशक से पहले इसने अमेरिका में भारी तबाही मचाई थी, लेकिन दशकों की मेहनत के बाद इसे खत्म कर दिया गया था. अब इसका दोबारा लौटकर आना न केवल पशुपालन उद्योग के लिए बड़ा आर्थिक झटका है, बल्कि एक गंभीर हेल्थ इमरजेंसी का संकेत भी है.
क्या यह मक्खी सच में जिंदा जीव का मांस खा जाती है?
न्यू वर्ल्ड स्क्रूवर्म का नाम सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं, क्योंकि इसके काम करने का तरीका बेहद डरावना है. यह मक्खी गर्म खून वाले जीवों, जैसे मवेशी, कुत्ते और कभी-कभी इंसानों के शरीर पर मौजूद खुले घावों या प्राकृतिक छिद्रों में अपने अंडे देती है. एक बार में यह मादा मक्खी 200 से 300 अंडे तक दे सकती है. अंडों से निकलने वाले लार्वा या मैगॉट्स तुरंत जिंदा मांस को खाना शुरू कर देते हैं. इस स्थिति को ‘मयाइसिस’ कहा जाता है. जैसे-जैसे ये लार्वा शरीर के अंदर मांस खाते हैं, गहरे और भयावह घाव बन जाते हैं. अगर समय पर इलाज न मिले, तो संक्रमित जीव की मौत बहुत जल्दी हो सकती है. टेक्सास में 1935 के दौरान आए एक प्रकोप में करीब 2.30 लाख पशु और 55 इंसान इस संक्रमण का शिकार हुए थे.
स्क्रूवर्म लार्वा के मुंह से बाहर निकले हुए हुक, जीवित गर्म-खून वाले जानवरों के मांस को खुरचते हैं. (फोटो : John Kucharski / USDA)
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निगरानी में ढील और बजट की कमी ने कैसे बढ़ाया खतरा?
स्क्रूवर्म के दोबारा फैलने के पीछे कई बड़ी वजहें सामने आ रही हैं. पनामा और मध्य अमेरिका में मक्खियों को रोकने वाली बैरियर लाइनों को बनाए रखना बहुत महंगा काम है. हाल के वर्षों में अमेरिकी संघीय बजट में कटौती और विदेशी सहायता में कमी के कारण निगरानी कार्यक्रम कमजोर पड़ गए. मार्च 2025 में जब अमेरिका ने अपनी फंडिंग वापस ली, तो संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) को भी अपना सर्विलांस कम करना पड़ा. इसके अलावा, बिना किसी मेडिकल जांच के अवैध रूप से पशुओं की आवाजाही ने भी इस परजीवी को एक देश से दूसरे देश में फैलने का मौका दिया.
पुराने एक्सपर्ट्स का रिटायर होना क्यों बना बड़ी मुसीबत?
एक और बड़ा कारण है कि हम इस मक्खी से हार रहे हैं- वह है अनुभव की कमी. पुराने समय के वेटरनरी एंटोमोलॉजिस्ट (कीट विशेषज्ञ) अब रिटायर हो चुके हैं. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इन मक्खियों को ट्रैक करने में बिताई थी. नए दौर में जेनेटिक और मॉलिक्यूलर रिसर्च पर तो जोर दिया जा रहा है, लेकिन फील्ड पर काम करने वाले एक्सपर्ट्स की कमी हो गई है. जब ये अनुभवी विशेषज्ञ रिटायर हुए, तो उनके साथ वह प्रैक्टिकल नॉलेज भी चला गया जो इन कीड़ों को कंट्रोल करने के लिए जरूरी था. अब नए सिरे से तैयारी करने में समय लग रहा है, और तब तक मक्खियां अपनी सीमा बढ़ा चुकी हैं.
क्या अमेरिका में आर्थिक संकट आने वाला है?
अगर यह मक्खी अमेरिका के टेक्सास में एंट्री कर लेती है, तो इसके नतीजे बहुत महंगे साबित होंगे. अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) का अनुमान है कि टेक्सास में एक छोटा सा प्रकोप भी पशुपालकों को सालाना 700 मिलियन डॉलर (करीब 5800 करोड़ रुपये) से ज्यादा का नुकसान पहुंचा सकता है. पनामा, कोस्टा रिका, निकारागुआ और होंडुरास में पहले ही हजारों मामले सामने आ चुके हैं. इसे देखते हुए अमेरिका ने अब आनन-फानन में फंड जारी किया है. एडिनबर्ग, टेक्सास में मूर एयरबेस पर एक नई फैसिलिटी भी बनाई जा रही है, ताकि 2026 की गर्मियों तक फिर से बांझ मक्खियों का उत्पादन शुरू किया जा सके.
क्या भविष्य में कीटनाशक ही एकमात्र विकल्प बचेंगे?
वर्तमान स्थिति को देखते हुए वैज्ञानिक काफी डरे हुए हैं. बांझ मक्खियों को तैयार करने वाली पुरानी लैब बंद हो चुकी हैं और नई लैब को शुरू होने में समय लगेगा. तब तक के लिए केवल कीटनाशकों (Insecticides) का सहारा लेना ही एकमात्र रास्ता नजर आ रहा है. यह चिंताजनक है क्योंकि कीड़ों में अक्सर दवाओं के प्रति रेजिस्टेंस पैदा हो जाता है. पनामा में जिस बैरियर को बनाए रखना सस्ता था, उसे नजरअंदाज करना अब पूरी दुनिया के लिए महंगा सौदा साबित हो रहा है.
क्या हमने इतिहास से कोई सबक नहीं सीखा?
इस पूरे संकट ने एक बात साफ कर दी है कि कीड़े बॉर्डर या देशों की सीमाएं नहीं समझते. अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना ऐसे परजीवियों को रोकना नामुमकिन है. जलवायु परिवर्तन और बढ़ते ग्लोबल ट्रैवल के कारण नए-नए परजीवी उभर रहे हैं. अगर हम रिसर्च को नजरअंदाज करेंगे और बजट में कटौती जारी रखेंगे, तो यह ‘मांस खाने वाली मक्खी’ सिर्फ शुरुआत हो सकती है. हमें यह समझना होगा कि पड़ोसी देश की समस्या को अपनी समस्या न मानना सबसे बड़ी गलती है.





