भारत के वो 5 ऐतिहासिक स्मारक, जिन्हें महिलाओं ने बनवाया, खूबसूरती देख रह जाएंगे हैरान


जब भी भारत के ऐतिहासिक स्मारकों की बात होती है, तो अक्सर राजा-महाराजाओं के नाम सामने आते हैं. लेकिन इतिहास में कई ऐसी महिलाएं भी रही हैं, जिन्होंने शानदार इमारतें बनवाकर अपनी पहचान छोड़ी. किसी ने अपने पति की याद में स्मारक बनवाया, तो किसी ने अपने शासन के दौरान मस्जिद और दूसरी इमारतों का निर्माण करवाया. आज हम आपको भारत के ऐसे ही 5 ऐतिहासिक स्मारकों के बारे में बता रहे हैं, जिनके निर्माण में महिलाओं की अहम भूमिका रही है.

1. रानी की वाव, गुजरात

गुजरात के पाटन में स्थित रानी की वाव भारत की सबसे खूबसूरत बावड़ियों में से एक है. इसका निर्माण 11वीं सदी में रानी उदयमती ने अपने पति राजा भीमदेव प्रथम की याद में करवाया था. इसे पानी के महत्व को दर्शाने वाले एक उल्टे मंदिर की तरह बनाया गया था. इस बावड़ी की सबसे खास बात इसकी बारीक नक्काशी है. इसमें सीढ़ियों के सात स्तर हैं. दीवारों और खंभों पर देवी-देवताओं, धार्मिक कथाओं और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी आकृतियां बनाई गई हैं. यहां 500 से ज्यादा मुख्य मूर्तियां और 1,000 से ज्यादा छोटी मूर्तियां मौजूद हैं.

क्या है खास? पानी जमा करने के लिए बनाई गई यह बावड़ी सिर्फ उपयोगी ढांचा नहीं थी, बल्कि कला और वास्तुकला का शानदार उदाहरण भी है. साल 2014 में इसे UNESCO World Heritage Site में शामिल किया गया था.

2. अदालज की वाव, गुजरात

गुजरात के गांधीनगर के पास स्थित अदालज की वाव अपनी अनोखी बनावट और खूबसूरत नक्काशी के लिए जानी जाती है. यह पांच मंजिला बावड़ी है, जिसे 1499 में रानी रुदाबाई से जोड़ा जाता है. इसकी दीवारों और खंभों पर फूलों, पत्तियों और दूसरी आकृतियों की नक्काशी देखने को मिलती है. इसकी बनावट ऐसी है कि नीचे उतरते हुए बाहर की तेज गर्मी से कुछ राहत महसूस हो सकती है. पुराने समय में ऐसी बावड़ियां पानी जमा करने के साथ-साथ लोगों को गर्मी से राहत देने की जगह भी थीं.

क्या है खास? अदालज की वाव में पानी की जरूरत और शानदार वास्तुकला का मेल देखने को मिलता है. इसकी कई मंजिलें, नक्काशीदार खंभे और अलग-अलग स्थापत्य शैलियों का मेल इसे खास बनाते हैं.

3. हुमायूं का मकबरा, दिल्ली

दिल्ली का हुमायूं का मकबरा भी एक महिला के संरक्षण में बनवाया गया था. मुगल बादशाह हुमायूं की पत्नी बेगा बेगम ने इसका निर्माण करवाया था. इसका निर्माण 1570 तक पूरा हो गया था. इस मकबरे की खासियत इसके चारों ओर बना बगीचा है. इसे चारबाग शैली में तैयार किया गया था, जिसमें रास्ते और पानी की नहरें एक व्यवस्थित ढंग से बनाई गई हैं. इसकी वास्तुकला में फारसी और भारतीय शिल्पकला का मेल दिखाई देता है.

क्या है खास? हुमायूं का मकबरा भारतीय उपमहाद्वीप के शुरुआती भव्य बगीचे वाले मकबरों में शामिल है. इसकी वास्तुकला ने बाद के मुगल स्मारकों को भी प्रभावित किया. ताजमहल की वास्तुकला में भी इस परंपरा का विकसित रूप देखने को मिलता है.

4. मोती मस्जिद, भोपाल

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित मोती मस्जिद का निर्माण सिकंदर जहां बेगम ने करवाया था. इसे 19वीं सदी में बनवाया गया था. इसके सफेद रंग और खूबसूरत बनावट के कारण इसे ‘पर्ल मॉस्क’ यानी मोती मस्जिद भी कहा जाता है. मस्जिद की बाहरी बनावट में सफेद रंग और लाल पत्थरों का मेल दिखाई देता है. इसकी नक्काशी और मीनारें इसे अलग पहचान देती हैं. यह भोपाल की उन ऐतिहासिक इमारतों में से एक है, जो शहर की पुरानी वास्तुकला और वहां की महिला शासकों के योगदान को दिखाती है.

क्या है खास? सिकंदर जहां बेगम ने    अपने शासन के दौरान शहर के विकास और कई सार्वजनिक निर्माण कार्यों पर ध्यान दिया. मोती मस्जिद इसी दौर की महत्वपूर्ण इमारतों में शामिल है.

5. ताज-उल-मसाजिद, भोपाल

भोपाल की ताज-उल-मसाजिद भारत की प्रसिद्ध मस्जिदों में गिनी जाती है. इसका निर्माण शाहजहां बेगम ने शुरू करवाया था और उनकी बेटी सुल्तान जहां बेगम ने भी इसे आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई. निर्माण का काम लंबे समय तक रुका रहा और बाद में इसे फिर आगे बढ़ाया गया. ‘ताज-उल-मसाजिद’ का अर्थ है ‘मस्जिदों का ताज’. इसकी गुलाबी रंग की बाहरी दीवारें, बड़ा आंगन और ऊंची मीनारें इसे खास बनाती हैं. यह भोपाल के इतिहास और वहां की महिला शासकों की विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

क्या है खास? इस मस्जिद की कहानी यह भी दिखाती है कि किसी बड़े निर्माण को पूरा होने में कई पीढ़ियां लग सकती हैं. शाहजहां बेगम ने इसकी शुरुआत की और सुल्तान जहां बेगम ने इसे आगे बढ़ाया.



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