ब्रिगेड परेड ग्राउंड यानी ‘मैदान’ क्यों है हर कोलकातावासी के दिल के करीब? जानें यहां का इतिहास और संस्कृति की पूरी कहानी


Kolkata Maidan History : कोलकाता की पहचान हावड़ा ब्रिज से होती है. लेकिन आपको बता दें कि यहां एक ऐसी जगह है जो शहर की धड़कन कही जाती है. जी हां, हम बात कर रहे हैं ब्रिगेड परेड ग्राउंड की, जिसे स्थानीय लोग प्यार से ‘मैदान’ कहते हैं। अंग्रेजों के जमाने में युद्ध की रणनीति के लिए तैयार किया गया यह मैदान, आज कोलकाता का ‘फेफड़ा’ (Green Lung) बन चुका है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि क्यों इस मैदान को बंगाल की सत्ता का प्रवेश द्वार कहा जाता है? और क्यों एक आम कोलकातावासी के लिए यह सिर्फ घास का मैदान नहीं, बल्कि उसकी भावनाओं का केंद्र है? आइए, आज इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और जानते हैं इस ऐतिहासिक मैदान की पूरी कहानी.

1. प्लासी की लड़ाई से जुड़ा है इतिहास
ब्रिगेड परेड ग्राउंड का इतिहास किसी सुनियोजित पार्क के रूप में नहीं, बल्कि सामरिक जरूरत (Strategic Necessity) के रूप में शुरू हुआ. ऐतिहासिक दस्तावेजों और भारतीय सेना के रिकॉर्ड्स के अनुसार, 1757 में प्लासी की लड़ाई जीतने के बाद अंग्रेजों ने नए फोर्ट विलियम का निर्माण शुरू किया.

किले की सुरक्षा के लिए यह जरूरी था कि उसके चारों ओर एक ऐसा खाली क्षेत्र (Free Zone) हो, जहां दुश्मन छिप न सके. इसी उद्देश्य के लिए आसपास के घने जंगलों को साफ किया गया. यही खाली जमीन समय के साथ ‘मैदान’ बन गई. शुरुआती दिनों में यहां ब्रिटिश सेना की परेड और तोपों का अभ्यास होता था, जिससे इसे ‘ब्रिगेड परेड ग्राउंड’ नाम मिला.

आज कोलकाता का ‘ग्रीन लंग’
आज के कंक्रीट के जंगल में, ब्रिगेड परेड ग्राउंड कोलकाता के फेफड़ों का काम करता है. लगभग 1280 एकड़ में फैला यह क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े शहरी पार्कों में गिना जाता है. हुगली नदी के किनारे से शुरू होकर यह मैदान विक्टोरिया मेमोरियल, ईडन गार्डन्स और सेंट पॉल कैथेड्रल को अपने घेरे में लेता है. कोलकाता की उमस भरी गर्मी में यह मैदान ही है जो शहर को ताजी हवा की सांस देता है.

राजनीति का बना महामंच
बंगाल की राजनीति में एक कहावत मशहूर है, “सत्ता का रास्ता ब्रिगेड से होकर गुजरता है.” यह मैदान भारत की राजनीतिक चेतना का गवाह रहा है. साल 1972 में जब बांग्लादेश आजाद हुआ, तब शेख मुजीबुर रहमान ने इसी मैदान से लाखों की भीड़ को संबोधित किया था. वामपंथी मोर्चे से लेकर ममता बनर्जी की ‘परिवर्तन’ रैलियों तक, इस मैदान ने इतिहास बनते देखा है. यहां की रैलियों में जुटने वाली ‘सिरों की गिनती’ (Headcount) यह तय करती है कि हवा का रुख किस ओर है.

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जहां फुटबॉल है धर्म
मैदान के बिना कोलकाता का फुटबॉल अधूरा है. यहां की घास पर मोहन बागान, ईस्ट बंगाल और मोहम्मडन स्पोर्टिंग जैसे क्लबों का पसीना बहा है. मैदान के अलग-अलग कोनों में बने छोटे-छोटे क्लब टेंट (Tents) और हर सुबह अभ्यास करते हजारों बच्चे इस बात का प्रमाण हैं कि बंगाल में खेल केवल मनोरंजन नहीं, एक जुनून है. उनके लिए मैदान कर्म भूमि है.

संस्कृति और ‘अड्डा’ का केंद्र
मैदान की संस्कृति ‘अड्डा’ (चर्चा) में बसती है. सर्दियों की गुनगुनी धूप में चाय की चुस्‍की और मूंगफली चबाते हुए राजनीति, सिनेमा और साहित्य पर बहस करना कोलकातावासियों का सबसे प्रिय शगल है. कभी कोलकाता पुस्तक मेला (Book Fair) की पहचान इसी मैदान से थी. आज भी सर्दियों में यहां घोड़ों की सवारी, ट्राम की धीमी घंटी और विक्टोरिया मेमोरियल की छाया में बैठने वाले प्रेमी जोड़ों और परिवारों के लिए यह ‘साझा आंगन’ है.

क्यों है यह इतना खास?
मैदान यानी ब्रिगेड परेड ग्राउंड किसी खास वर्ग का नहीं, बल्कि सबका है. यहां एक तरफ रईस लोग गोल्फ खेलते हैं, तो दूसरी तरफ गरीब बच्चे फुटबॉल. यह मैदान कोलकाता के लोकतंत्र का प्रतीक है. यह शहर की भागदौड़ के बीच ठहरने की जगह है. इसीलिए, एक कोलकातावासी के लिए मैदान सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उसकी यादों का एक बड़ा हिस्सा है.



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