अंबाला: देश और दुनिया में कई ऐसी बीमारियां मौजूद हैं, जिनका इलाज आज भी चुनौती बना हुआ है. इन्हीं गंभीर बीमारियों में एक नाम लिम्फीडिमा यानी फाइलेरिया, या आम भाषा में कहे जाने वाले ‘हाथी पांव’ रोग का भी शामिल है. यह बीमारी केवल शरीर को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि मरीज के पूरे जीवन को बदलकर रख देती है. बिहार, असम और नागालैंड जैसे राज्यों में इस बीमारी के सबसे अधिक मामले सामने आते रहे हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन इलाकों में हजारों लोग फाइलेरिया से पीड़ित हैं और लंबे समय से इस बीमारी का सामना कर रहे हैं.
क्या होता है हाथी पांव
फाइलेरिया एक ऐसा संक्रमण है, जिसमें व्यक्ति के शरीर के अंगों में असामान्य सूजन आ जाती है. खासकर पैरों में सूजन इतनी बढ़ जाती है कि वह हाथी के पैर जैसी दिखाई देने लगती है. यही कारण है कि इसे आम बोलचाल में ‘हाथी पांव’ कहा जाता है. बीमारी बढ़ने पर मरीज को चलने-फिरने में भारी परेशानी होने लगती है और कई मामलों में वह शारीरिक रूप से दिव्यांग जैसा जीवन जीने को मजबूर हो जाता है.
क्यों होता है हाथी पांव
इस गंभीर बीमारी को लेकर अंबाला छावनी नागरिक अस्पताल के आयुर्वेदिक विशेषज्ञ डॉ. जितेंद्र वर्मा ने लोकल 18 से बातचीत में कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं. उन्होंने बताया कि फाइलेरिया एक संक्रामक बीमारी है, जो मादा क्यूलेक्स मच्छर के काटने से फैलती है. यह संक्रमण किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है और इसके लक्षण धीरे-धीरे दिखाई देने लगते हैं.
डॉ. वर्मा के अनुसार, पुरुषों में इस बीमारी के कारण अंडकोष में सूजन आ सकती है, जबकि महिलाओं में स्तनों में सूजन देखने को मिलती है. वहीं पैरों की सूजन लगातार बढ़ती जाती है, जिससे मरीज सामान्य जीवन नहीं जी पाता. उन्होंने कहा कि हाथी पांव अत्यंत गंभीर बीमारी है और समय पर इलाज नहीं मिलने पर स्थिति और भी खराब हो सकती है.
फाइलेरिया से बचाव
उन्होंने लोगों को सलाह देते हुए कहा कि फाइलेरिया से बचाव के लिए मच्छरों से बचना बेहद जरूरी है. इसके लिए मच्छरदानी का उपयोग करना चाहिए और डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाइयों का सेवन समय पर करना चाहिए. साथ ही हाथी पांव से प्रभावित मरीजों को अपने पैरों की विशेष देखभाल करनी चाहिए. यदि त्वचा को साफ-सुथरा नहीं रखा गया तो बैक्टीरिया और फंगल संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है.
हाथी पांव का इलाज
डॉक्टर ने बताया कि संक्रमण बढ़ने पर पैरों में घाव भी बन सकते हैं और गंभीर स्थिति में अंग काटने तक की नौबत आ सकती है. इसलिए प्रभावित पैर को रोजाना साबुन से धोकर सूती कपड़े से अच्छी तरह साफ करना चाहिए. इसके अलावा एंटीबायोटिक और एंटीफंगल क्रीम का इस्तेमाल भी फायदेमंद माना जाता है. उन्होंने कहा कि मरीज को हल्का व्यायाम करना चाहिए और पैरों को चोट लगने से बचाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि लंबे समय तक पैर लटकाकर बैठना मरीज के लिए नुकसानदायक हो सकता है.
आयुर्वेदिक उपचार के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. जितेंद्र वर्मा ने बताया कि हाथी पांव को आयुर्वेद में कफज बीमारी माना गया है. इसके उपचार में पंचकर्म पद्धति के तहत सरसों के तेल की मालिश की जाती है. साथ ही कई आयुर्वेदिक औषधियों की धारा पैरों पर डाली जाती है, जिससे मरीज को राहत मिलती है.
उन्होंने बताया कि नित्यानंद रस और श्रीपद गजकेसरी रस को आयुर्वेद में लाभकारी माना गया है और डॉक्टर की सलाह के बाद मरीज इनका सेवन कर सकते हैं. खानपान को लेकर भी डॉक्टर ने विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि मरीज को मैदा, रिफाइंड, बेसन, खटाई, तला हुआ भोजन और केले का सेवन बंद कर देना चाहिए. इसके बजाय हरी सब्जियां, दूध और गाय के शुद्ध घी का सेवन फायदेमंद माना जाता है. इसके अलावा गिलोय और दशमूल का काढ़ा भी सूजन कम करने में लाभकारी बताया गया है.
कौन सी दवाएं हैं प्रभावी
डॉ. वर्मा ने बताया कि डॉक्टर की सलाह के बाद डाइ-इथाइल कार्बामाजिन साइट्रेट (हैटराजन और बनोसाइड) जैसी दवाएं भी हाथी पांव के इलाज में प्रभावी मानी जाती हैं. उन्होंने कहा कि अंबाला छावनी नागरिक अस्पताल की आयुर्वेदिक ओपीडी में मरीज केवल 5 रुपये की पर्ची बनवाकर निशुल्क इलाज का लाभ उठा सकते हैं.





