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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ब्रिटेन के बीच के रिश्ते अब तक के सबसे खराब दौर में पहुंच गए हैं. हाल ही में पेंटागन के कुछ आंतरिक ईमेल लीक हुए हैं जिनसे पूरी दुनिया में तहलका मच गया है. इन ईमेल से संकेत मिलता है कि ट्रंप प्रशासन फॉकलैंड द्वीप समूह पर ब्रिटेन के दशकों पुराने दावे की समीक्षा करने की योजना बना रहा है. फॉकलैंड द्वीप को लेकर ब्रिटेन और अर्जेंटीना के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है और अमेरिका हमेशा से ब्रिटेन का साथ देता रहा है. लेकिन अब ट्रंप इस समर्थन को खत्म कर ब्रिटेन को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अकेला छोड़ सकते हैं. यह सब कुछ इसलिए हो रहा है क्योंकि ट्रंप ईरान के साथ चल रहे युद्ध में ब्रिटेन और अन्य नाटो सहयोगियों के रवैये से बेहद नाराज हैं. ट्रंप का मानना है कि जब अमेरिका को जरूरत थी, तब उसके दोस्तों ने पीठ दिखा दी. अब वही अमेरिका अपने इन तथाकथित दोस्तों को उनकी जगह दिखाने की तैयारी में है. (Photos : Reuters)
पेंटागन से निकले एक आंतरिक ईमेल ने यह साफ कर दिया है कि व्हाइट हाउस अब नाटो देशों के प्रति नरम रुख अपनाने के मूड में नहीं है. इस ईमेल में उन विकल्पों पर चर्चा की गई है जिनके जरिए उन नाटो सहयोगियों को सजा दी जा सके जो ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका के काम नहीं आए. ट्रंप ने नाटो को ‘कागजी शेर’ करार दिया है और वे इस गठबंधन को छोड़ने तक की धमकी दे चुके हैं. इस नोट में खासतौर पर उन देशों पर गुस्सा निकाला गया है जिन्होंने अमेरिकी सेना को अपने बेस और हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने से मना कर दिया था.

रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन ने ईरान पर हमला करने के लिए अपने ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी थी. इसी बात से तिलमिलाए ट्रंप अब ब्रिटेन के ‘शाही क्षेत्रों’ पर उसके अधिकार को चुनौती देने की सोच रहे हैं. इसमें फॉकलैंड द्वीप का नाम सबसे ऊपर है, जो ब्रिटेन के लिए एक संवेदनशील मुद्दा रहा है. जैसे ही पेंटागन के इस प्लान की खबर बाहर आई, ब्रिटिश गलियारों में हड़कंप मच गया. प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने तुरंत इस पर प्रतिक्रिया दी और साफ किया कि फॉकलैंड द्वीप पर ब्रिटेन का नियंत्रण बना रहेगा. प्रधानमंत्री के प्रवक्ता ने एक कड़ा बयान जारी करते हुए कहा कि फॉकलैंड की संप्रभुता को लेकर ब्रिटेन का रुख बिल्कुल स्पष्ट और अपरिवर्तित है. ब्रिटेन का मानना है कि वहां के लोगों को आत्मनिर्णय का अधिकार है और वे ब्रिटेन के साथ ही रहना चाहते हैं.

स्टार्मर ने यह भी साफ कर दिया है कि वे किसी भी तरह के दबाव में नहीं आएंगे और ब्रिटेन के राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए मजबूत कदम उठाएंगे. 1982 में ब्रिटेन ने अर्जेंटीना के खिलाफ एक भीषण युद्ध लड़ा था ताकि इन द्वीपों की रक्षा की जा सके. ऐसे में ट्रंप का यह नया रुख उन सभी सैनिकों और दिग्गजों के लिए एक बड़ा अपमान माना जा रहा है जिन्होंने उस युद्ध में अपनी जान दांव पर लगाई थी.
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ब्रिटिश नौसेना के दिग्गज एडमिरल लॉर्ड वेस्ट ने ट्रंप के इस रवैये पर कड़ी चिंता जताई है. उनका कहना है कि ट्रंप को गठबंधन और उसके नेतृत्व की कोई समझ नहीं है. लॉर्ड वेस्ट के मुताबिक, ट्रंप आधुनिक इतिहास के सबसे सफल सैन्य गठबंधन को नष्ट करने पर तुले हुए हैं. उन्होंने यह भी कहा कि अगर अमेरिका नाटो को कमजोर करता है, तो इससे सबसे ज्यादा खुशी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को होगी. फॉकलैंड द्वीप के बहाने ब्रिटेन को निशाना बनाना वहां के स्वतंत्र और आत्मनिर्भर लोगों का अपमान है. वहीं रियर एडमिरल क्रिस पैरी का मानना है कि अगर अमेरिका वास्तव में अपना समर्थन वापस लेता है, तो यह उन लोगों के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात होगा जिन्होंने इन द्वीपों के लिए खून बहाया है. वे मौजूदा ब्रिटिश सरकार को भी कटघरे में खड़ा कर रहे हैं कि उनकी कमजोरी की वजह से दुश्मन इसका फायदा उठा सकते हैं.

तनाव की शुरुआत तब हुई जब ट्रंप ने ईरान के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूंका. ट्रंप चाहते थे कि नाटो देश हर तरह से अमेरिका की मदद करें, लेकिन ब्रिटेन समेत कई देशों ने अपने सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करने से मना कर दिया. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालते हुए कहा कि जब जरूरत थी तब ये देश किसी काम के नहीं आए. ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित करने का आदेश दिया था, लेकिन सहयोगियों ने समय पर मदद नहीं भेजी. हालांकि ब्रिटेन अब वहां अपने टाइफून फाइटर जेट भेजने की तैयारी कर रहा है, लेकिन ट्रंप का कहना है कि अब बहुत देर हो चुकी है. ट्रंप के लिए यह सिर्फ एक सैन्य मुद्दा नहीं है, बल्कि एक व्यक्तिगत अपमान की तरह है. वे इसे ‘कागजी शेर’ की संज्ञा दे रहे हैं जो सिर्फ नाम का गठबंधन रह गया है.

सिर्फ फॉकलैंड या नाटो ही नहीं, ट्रंप कई अन्य मोर्चों पर भी ब्रिटेन को घेर रहे हैं. ट्रंप ने ब्रिटेन के डिजिटल सर्विस टैक्स (DST) की भी आलोचना की है. उनका आरोप है कि यह टैक्स अमेरिकी कंपनियों को निशाना बनाने के लिए बनाया गया है. उन्होंने धमकी दी है कि अगर ब्रिटेन ने अपनी नीतियां नहीं बदलीं, तो वे ब्रिटिश उत्पादों पर भारी टैरिफ लगा सकते हैं.

इसके अलावा ट्रंप ने प्रिंस हैरी को लेकर भी तीखी टिप्पणी की है. प्रिंस हैरी ने वाशिंगटन से यूक्रेन के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं को निभाने का आग्रह किया था, जिस पर ट्रंप ने पलटवार करते हुए कहा कि हैरी ब्रिटेन की तरफ से नहीं बोल रहे हैं. ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि वे खुद प्रिंस हैरी से ज्यादा ब्रिटेन की आवाज का प्रतिनिधित्व करते हैं. ये बयान दिखाते हैं कि ट्रंप और ब्रिटेन के बीच की खाई कितनी गहरी हो चुकी है.

यह सारा विवाद ऐसे समय में खड़ा हुआ है जब ब्रिटेन के राजा किंग चार्ल्स अपनी ऐतिहासिक अमेरिकी यात्रा पर जा रहे हैं. अमेरिका की आजादी की 250वीं वर्षगांठ के मौके पर किंग चार्ल्स और कैमिला व्हाइट हाउस में एक शानदार स्टेट डिनर में शामिल होने वाले हैं. लेकिन पर्दे के पीछे का तनाव इस यात्रा के उत्साह को कम कर सकता है. एक तरफ ट्रंप किंग चार्ल्स की मेजबानी करेंगे और दूसरी तरफ उनके अधिकारी ब्रिटेन को सजा देने की लिस्ट तैयार कर रहे होंगे. राजनयिकों के लिए यह स्थिति बहुत ही अजीबोगरीब है. वाशिंगटन और लंदन के बीच के रिश्ते पिछले कई दशकों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं. क्या एक डिनर टेबल पर बैठकर इन गहरे मतभेदों को सुलझाया जा सकता है या फिर यह सिर्फ एक औपचारिक मुलाकात बनकर रह जाएगी?

ईरान के साथ समझौते को लेकर भी ट्रंप किसी जल्दबाजी में नहीं दिख रहे हैं. जब उनसे पूछा गया कि समझौता कब तक होगा, तो उन्होंने दो टूक जवाब दिया कि उन्हें कोई जल्दी नहीं है. उन्होंने वियतनाम युद्ध का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका वहां 18 साल तक रहा था. ट्रंप का मानना है कि समय का दबाव उन पर नहीं, बल्कि उनके विरोधियों पर है. वे एक ऐसा समझौता चाहते हैं जो हमेशा के लिए रहे. लेकिन इस लंबी प्रक्रिया में वे अपने सहयोगियों को लगातार परख रहे हैं. जो देश उनके साथ मजबूती से नहीं खड़े हैं, उन्हें वे भविष्य में किसी भी तरह के अमेरिकी सहयोग से बाहर रखने का मन बना चुके हैं. फॉकलैंड की समीक्षा इसी बड़ी रणनीति का एक हिस्सा मात्र है.

वर्तमान में अमेरिकी विदेश मंत्रालय फॉकलैंड को ब्रिटेन द्वारा प्रशासित क्षेत्र मानता है, लेकिन साथ ही अर्जेंटीना के दावे का भी जिक्र करता है. अमेरिका इसके लिए अंग्रेजी के साथ-साथ स्पेनिश नाम ‘इस्लास माल्विनास’ का भी उपयोग करता है. अब तक यह एक संतुलित रुख था, लेकिन ट्रंप के नए प्लान से यह संतुलन बिगड़ सकता है. अगर ट्रंप खुलकर अर्जेंटीना के पक्ष में खड़े हो जाते हैं, तो यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव होगा. ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय ने फिलहाल इसे एक काल्पनिक स्थिति माना है, लेकिन वे अंदरूनी तौर पर इसके लिए तैयार हो रहे हैं. फॉकलैंड के लोग पूरी तरह से ब्रिटेन के साथ रहना चाहते हैं और उनके लिए ट्रंप की यह ‘सजा’ किसी त्रासदी से कम नहीं होगी.

ब्रिटेन के पास एक शक्तिशाली सेना है और वह दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. लेकिन अमेरिका जैसे सुपरपावर का साथ छूटना उसके लिए बड़ी चुनौती हो सकता है. जानकारों का कहना है कि ब्रिटेन को अब अपनी रक्षा बजट में बढ़ोतरी करनी होगी और अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए खुद को और मजबूत करना होगा. ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका अब ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति पर चल रहा है, जहां पुराने रिश्तों की जगह केवल वर्तमान के फायदे देखे जा रहे हैं. ब्रिटेन के लिए यह एक अलार्म कॉल है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए केवल नाटो या अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकता. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ट्रंप वाकई अपने इन कड़े फैसलों को लागू करते हैं या फिर यह सिर्फ दबाव बनाने की एक रणनीति है.

अगर दुनिया की दो बड़ी लोकतांत्रिक ताकतें आपस में भिड़ती हैं, तो इसका असर पूरे विश्व पर पड़ेगा. चीन और रूस जैसे देश इस दरार का फायदा उठा सकते हैं. नाटो की एकता ही पश्चिम की सबसे बड़ी ताकत रही है, और अगर ट्रंप इसे कमजोर करते हैं, तो वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है. फॉकलैंड जैसा मुद्दा तो बस एक चिंगारी है, असली आग तो उन सिद्धांतों की है जिन पर यह गठबंधन टिका हुआ था. क्या ब्रिटेन अपने आत्मसम्मान के साथ समझौता करेगा या फिर वह ट्रंप की चुनौतियों का डटकर मुकाबला करेगा? आने वाला समय ही बताएगा कि 2026 की यह सर्दी वैश्विक राजनीति में कितनी बड़ी तब्दीली लेकर आती है.





