सिजोफ्रेनिया शब्द इन दिनों आपने टीवी, इंटरनेट और अखबार में खूब देखा, सूना होगा. ये एक गंभीर मानसिक बीमारी है. इसका जिक्र ट्विशा शर्मा केस में भी किया गया है. मृतक ट्विशा की सास ने मीडिया में बताया कि उन्हें सिजोफ्रेनिया नाम की बीमारी थी. हालांकि ये बीमारी ट्रीटेबल है, लेकिन बहुत ही रेयर और सीरियस होती है. जिन लोगों को सिजोफ्रेनिया का पता चलता है, उन्हें यह समझने में दिक्कत हो सकती है कि क्या असली है और क्या काल्पनिक है. सिर्फ 100 में से एक को ही ये बीमारी होती है. खासबात ये है कि मरीज को खुद अपनी इस बीमारी का पता नहीं लग पाता है.
नई दिल्ली स्थित तुलसी हेल्थकेयर के सीनियर साइकेट्रिस्ट और सी ई ओ डॉक्टर गौरव गुप्ता से हमने इस बीमारी के बारे में गहराई से समझने के लिए बात की. डॉक्टर ने बताया कि सिजोफ्रेनिया ट्रीटेबल मेंटल बीमारी है जो किसी व्यक्ति के सोचने के तरीके, भावनाओं, टास्क और रियलिटी की समझ पर असर डालती है. लेकिन इसका निदान तुरंत नहीं होता है. इसके लिए कई हफ्तों और महीनों तक मरीज की काउंसलिंग करनी पड़ती है. लेकिन इससे पहले भी जरूरी है कि इसके लिए लक्षण नजर आए. तो चलिए समझते हैं सिजोफ्रेनिया के लक्षण और इसके निदान के लिए क्या प्रोसेस किया जाता है और कितना समय निकलता है.
सिजोफ्रेनिया के लक्षण
ऐसी चीजें देखना और सुनना जो असल में वहां नहीं हैं.
हेल्लुसिनेशन होना, ऐसी चीजों का अनुभव करना या उन पर यकीन करना जो सच नहीं हैं.
उलझे हुए और रैंडम थॉट्स आना.
अजीबोगरीब व्यवहार करना.
सामाजिक मेलजोल से दूर रहना.
बहुत कम या बिल्कुल भी भावनाएं जाहिर न करना.
ध्यान न लगा पाना.
नींद का पैटर्न बिगड़ जाना.
रोजमर्रा के काम न कर पाना.
साफ-सफाई का ध्यान न रखना.
व्यक्तित्व में बदलाव.
दूसरों पर विश्वास न करना या शक करना.
बीमारी को समझने में हो सकती है गलत!
एक्सपर्ट बताते हैं कि सिजोफ्रेनिया को अक्सर गलत समझा जाता है, क्योंकि यह माना जाता है कि इस बीमारी वाले व्यक्ति की स्प्लिट पर्सनैलिटी होती है. जबकि सिजोफ्रेनिया और स्प्लिट पर्सनैलिटी एक ही चीज नहीं हैं. लेकिन अगर आपने ट्विशा की सास को मीडिया ट्रायल में ये कहते हुए सुना है कि ट्विशा की दो स्प्लिट पर्सनैलिटी नजर आने लगी थी, तो आपको डॉक्टर की बात पर गौर करने की जरूरत है. क्योंकि सिजोफ्रेनिया में ऐसा नहीं होता है.
कैसे शुरु होती है ये बीमारी
एक्सपर्ट ने बताया कि इस बीमारी की शुरुआत धीरे-धीरे होती है, लेकिन जिन लोगों को यह बीमारी होती है, उनमें लक्षण अचानक भी उभर सकते हैं. सिजोफ्रेनिया के लक्षण अक्सर दूसरी मानसिक बीमारियों, जिनमें अन्य साइकोटिक या न्यूरोलॉजिकल बीमारियां भी शामिल हैं, के लक्षण एक जैसे ही लगते हैं. इसलिए, सिजोफ्रेनिया का पता लगाने के लिए डॉक्टर को व्यक्ति का ध्यान से असेसमेंट करना पड़ता है
निदान में कितना समय लगता है
एक्सपर्ट ने ये बात साफ कहा है कि तुरंत किसी व्यक्ति को देखकर सिजोफ्रेनिया की पुष्टि नहीं की जा सकती है. इसके निदान के लिए एक पूरा प्रोसेस फॉलो किया जाता है, जिसमें कुछ हफ्तों से लेकर कई महीनों तक का समय लग सकता है. अगर लक्षण 6 महीने या उससे ज्यादा समय तक बने रहें, तब डॉक्टर इस बीमारी को कन्फर्म करते है. क्योंकि डायग्नोसिस के लिए डॉक्टर को मरीज के व्यवहार, सोच और मानसिक स्थिति को लगातार जांचना पड़ता है.
क्या है डायग्नोसिस का पूरा प्रोसेस
सिजोफ्रेनिया के डायग्नोसिस प्रोसेस के बारे में डॉक्टर ने बताया कि इसका का पता किसी एक लैब टेस्ट, डायग्नोस्टिक स्कैन या किसी अन्य मेडिकल प्रॉसिजर के जरिए नहीं लगाया जा सकता है. जांच प्रक्रिया के दौरान, आमतौर पर मरीज की पूरी तरह से मानसिक जांच करके आकलन की प्रक्रिया शुरू की जाती है.
– असेसमेंट के इंटरव्यू वाले हिस्से के दौरान, साइकेट्रिस्ट व्यक्ति के मानसिक स्थिति, कामकाज और रोजमर्रा के काम-काज के बारे में सावल पूछे जाते हैं ताकि सिजोफ्रेनिया का पता लगाने के लिए एक क्लिनिकल आधार बनाया जा सके. मरीज की पिछली या मौजूदा मेडिकल हिस्ट्री पर भी गौर किया जाता है, जिसमें परिवार में मानसिक समस्याएं, ड्रग्स या शराब का इस्तेमाल, और नींद से जुड़े दूसरे जरूरी दस्तावेज शामिल हैं. हर इंटरव्यू साइकेट्रिस्ट को मरीज की अपनी सोच, भावनाओं और व्यवहार को जाहिर करने की काबिलियत और तरीके को समझने का मौका देता है.
– इसके अलावा मेडिकल जांच भी किया जाता है. इसमें ब्लड टेस्ट और ब्रेन इमेजिंग शामिल हैं, साथ ही साइकोलॉजिकल जांच भी, बीमारी का पता लगाने में मददगार साबित होती है. इन टेस्ट का मकसद यह पता लगाना है कि क्या मरीज के लक्षण ड्रग्स के इस्तेमाल, हार्मोन के असामान्य स्तर, इन्फेक्शन, न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर या किसी दूसरी शारीरिक समस्या से जुड़े हैं.
– मरीज की जांच में परिवार के सदस्यों को भी शामिल किया जाता है. क्योंकि वे ऐसी बहुत सी जानकारी देते हैं जो हेल्थकेयर देने वालों को मरीज की पर्सनैलिटी में आए बदलावों, जैसे कि अग्रेशन , सबसे अलग-थलग रहना, भ्रम या कामकाज और सोशल एक्टिविटी में सफलता के लेवल में कमी, को पहचानने में मदद करती है, जिनके बारे में शायद मरीज को खुद पता न हो.
क्या है इलाज
उपचार में आमतौर पर दवाएं , साइकोथेरेपी , फॅमिली थेरेपी , रिहैबिलिटेशन , जीवनशैली संबंधी सहायता और लगातार मनोचिकित्सकीय जांच-पड़ताल शामिल होती है. जिन लोगों में सिजोफ्रेनिया का डायग्नोसिस हुआ है, वे लगातार देखभाल और एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम मिलने पर अपने लक्षणों को कंट्रोल कर सकते हैं और अपने जीवन की क्वालिटी में सुधार ला सकते हैं.
क्या ट्विशा की बीमारी को लेकर किया दावा सही?
यदि यहां बताए गए जानकारी और ट्विशा की सास के दावों को देखा जाए तो दिमाग में कुछ सवाल खड़े होते हैं. पहला- जब शादी को ही 5 महीने हुए थे तो ट्विशा को ऐसी मेंटल डिजीज कैस हो सकती है जिसके निदान में ही 6 महीने तक समय लग जाता है? दूसरा- ट्विशा की सास ने ये बात भी खुद कही है कि शादी के 1-2 महीने तक सब कुछ ठीक था, उनका व्यवहार भी अच्छा था, तो अचानक उन्हें सिजोफ्रेनिया कैसे हो सकता है, जो कि बहुत ही धीरे- धीरे होता है? हालांकि अभी इस मामले में जजमेंट आना बाकी है, हम सिर्फ इस बीमारी के बारे में आपको जानकारी दे रहे हैं.
Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.





