अमरीकी राष्ट्रपतियों की सुरक्षा के लिए सीक्रेट सर्विस और सेना किस हद तक जा सकती है, इसका अंदाजा दो अलग-अलग दौर की बेहद रोमांचक घटनाओं से लगाया जा सकता है. जब राष्ट्रपति की जान पर गंभीर खतरा होता है, तो किस तरह मीडिया और दुनिया की आंखों में धूल झोंककर सीक्रेट ऑपरेशन चलाए जाते हैं. आइए इसे आसान और रोचक अंदाज में समझते हैं.
पाकिस्तान में उतरा था नकली एयरफोर्स वन
मार्च 2000 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पाकिस्तान के इस्लामाबाद पहुंचे थे. उस समय अमेरिका को राष्ट्रपति की सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरा महसूस हो रहा था. इसके लिए सुरक्षा एजेंसियों ने एक खास योजना बनाई. मीडिया के सामने पहले एक विमान उतारा गया, जिस पर एयरफोर्स वन के निशान थे. इसके बाद क्लिंटन जैसे दिखने वाले एक सीक्रेट सर्विस एजेंट को भी विमान से बाहर निकाला गया. मीडिया को लगा कि राष्ट्रपति इसी विमान से आए हैं.
लेकिन असली कहानी कुछ और थी
कुछ देर बाद एक बिना किसी खास आम विमान वहां उतरा. इसी विमान से असल में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन बाहर निकले. यानी मीडिया की नजरों के सामने एक तरह से डमी विमान और डिकॉय ऑपरेशन चलाया गया.
एक पत्रकार को पहले ही बता दिया गया था राज
इस पूरे ऑपरेशन की जानकारी बहुत कम लोगों को थी. क्लिंटन के भारत से पाकिस्तान जाने से पहले व्हाइट हाउस अधिकारियों ने उन्हें एक गोपनीय ऑफ-द-रिकॉर्ड ब्रीफिंग दी थी. उन्हें बताया गया कि सुरक्षा कारणों से राष्ट्रपति सामान्य तरीके से एयरफोर्स वन से पाकिस्तान नहीं उतरेंगे.
सुसान पेज ने बताया कि उन्हें यह भी बताया गया था कि पाकिस्तान यात्रा के दौरान राष्ट्रपति और उनके साथ यात्रा कर रहे पत्रकारों की सुरक्षा के लिए असाधारण इंतजाम किए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि उस समय इन बातों को सबके सामने नहीं रखा गया था, क्योंकि ब्रीफिंग ऑफ-द-रिकॉर्ड थी. लेकिन अब 25 साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद उन्होंने इस घटना के बारे में बताया है.
25 साल बाद ट्रंप के साथ भी हुआ ऐसा ही ऑपरेशन
अब आते हैं मौजूदा मामले पर. पिछले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सुरक्षा के लिए तुर्की में भी कुछ ऐसा ही गुप्त ऑपरेशन किया गया. रिपोर्ट में बताया है कि ईरान की ओर से ट्रंप के खिलाफ एक विश्वसनीय खतरे की जानकारी मिली थी. इसके बाद सुरक्षा अधिकारियों ने उन्हें एयरफोर्स वन से चुपचाप दूसरे छोटे और बिना पहचान वाले प्लेन में शिफ्ट कर दिया.
लेकिन यह काम बेहद गुप्त तरीके से हुआ
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप को विमान से दूसरे विमान में ले जाने के लिए एयरपोर्ट के एक कैटरिंग ट्रक का इस्तेमाल किया गया. इस दौरान एयरफोर्स वन में मौजूद 100 से ज्यादा अधिकारी, कर्मचारी और पत्रकार ब्रिटेन की ओर उड़ान जारी रखते रहे. इनमें से ज्यादातर लोगों को यह पता ही नहीं था कि ट्रंप विमान बदल चुके हैं.
पत्रकारों को भी दी गई हिदायतें
ऑपरेशन के दौरान एयरफोर्स वन में मौजूद पत्रकारों और दूसरे लोगों को विमान की खिड़कियों के शेड नीचे रखने को कहा गया. ट्रंप के साथ नाटो समिट में गए विदेश मंत्री मार्को रुबियो और ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट भी उसी बड़े विमान में रह गए. यानी एक तरफ राष्ट्रपति को गुपचुप तरीके से दूसरे प्लेन में ले जाया गया. दूसरी तरफ एयरफोर्स वन को ऐसे ही ब्रिटेन की ओर भेज दिया गया, ताकि ट्रंप की असली लोकेशन छिपी रहे.
ट्रंप ने खुद बताई पूरी कहानी
बाद में डोनाल्ड ट्रंप ने इस घटना की पुष्टि की. उन्होंने कहा कि सीक्रेट सर्विस और सेना ने उन्हें दूसरे विमान में जाने का निर्देश दिया था. ट्रंप ने बताया कि उन्हें बताया गया था कि जिस प्लेन में वह पहले सवार हुए थे, उसके लिए खतरा ज्यादा था.
उन्होंने कहा कि वह आमतौर पर सुरक्षा एजेंसियों और सेना के निर्देशों का पालन करते हैं. उन्हें बताया गया था कि वहां कोई खतरा मौजूद था. ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्हें लगता है कि जिस विमान में उन्हें बाद में भेजा गया, शायद वही ज्यादा सुरक्षित था.
25 साल बाद भी तरीका लगभग वही
क्लिंटन और ट्रंप के इन दोनों मामलों में 25 साल का अंतर है, लेकिन मकसद लगभग एक जैसा नजर आता है. दुश्मन को राष्ट्रपति की असली लोकेशन और विमान की पहचान का पता न चलने देना. क्लिंटन के मामले में डिकॉय एयरफोर्स वन और उनके जैसे दिखने वाले एजेंट का इस्तेमाल किया गया था. वहीं ट्रंप के मामले में कैटरिंग ट्रक की आड़ में विमान बदलने का गुप्त ऑपरेशन किया गया.




