India US Rare Earth Deal : अमेरिका-भारत के इस महा-पैक्ट ने चीन को किया चोकहोल्ड, समझें 14 क्रिटिकल मिनरल्स का खेल


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भारत और अमेरिका ने मिलकर एक ऐतिहासिक पैक्ट पर साइन कर दिया है. इस डील के बाद क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग और सप्लाई पर भारत का कंट्रोल होगा, जिस पर अब तक चीन की दादागीरी चलती थी. अब भारत में ही बड़े-बड़े रिफाइनिंग प्लांट लगाए जाएंगे और दोनों देश मिलकर अफ्रीका-साउथ अमेरिका की खदानों में चीन को सीधी टक्कर देंगे.

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भारत अमेरिका रेयर अर्थ डील

क्वाड के मंच से जियो-पॉलिटिक्स में एक बहुत बड़ा धमाका हुआ है, जिसने चीन की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा दिया है. इस समिट के दौरान भारत और अमेरिका ने मिलकर एक ऐसा महा-पैक्ट साइन किया है, जो ग्लोबल मार्केट में चीन की दादागिरी को खत्म कर देगा. इस डील के जरिए दोनों देशों ने साफ कर दिया है कि अब क्लीन एनर्जी और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग के मामले में चीन की मनमानी नहीं चलेगी. ये समझौता चीन के उस ‘चोकहोल्ड’ को तोड़ने का अचूक हथियार है, जिसके दम पर वो पूरी दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाता था.

US-India का 14 क्रिटिकल मिनरल्स का पूरा खेल

चीन की सबसे बड़ी ताकत उसकी माइनिंग नहीं, बल्कि इन मिनरल्स को साफ करने यानी प्रोसेसिंग की क्षमता है. पूरी दुनिया में जमीन से निकलने वाले इन दुर्लभ तत्वों को रिफाइन करने के मामले में चीन अकेले 70 फीसदी से ज्यादा का कंट्रोल रखता है. वो जब चाहता है, इनके एक्सपोर्ट पर रोक लगा देता है लेकिन अब खेल पलट चुका है! इस नए समझौते के तहत भारत और अमेरिका मिलकर भारत के अंदर ही बड़े-बड़े प्रोसेसिंग प्लांट लगाने जा रहे हैं. इसका सीधा मतलब ये है कि अब कच्चा माल कहीं से भी आए, उसे भारत में ही रिफाइन किया जाएगा और चीन का पत्ता पूरी तरह साफ हो जाएगा.

चीन की दुखती रग पर हाथ!

स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक गाड़ी (EV) और सेना के हथियारों को बनाने के लिए क्रिटिकल मिनरल्स बेहद जरूरी हैं. चीन इसी बात का फायदा उठाता था लेकिन अब भारत और अमेरिका ने एक ऐसा चक्रव्यूह रचा है कि चीन उसमें बुरी तरह फंसने वाला है. दोनों महाशक्तियों के बीच हुए इस समझौते ने 14 ऐसे खास मिनरल्स को सुरक्षित करने का काम किया है, जो आने वाले भविष्य में दुनिया के कई देशों की तकदीर तय करेंगे. इनमें लिथियम, कोबाल्ट, निकल और ग्रेफाइट जैसे नाम शामिल हैं. इन मिनरल्स के बिना न तो आपकी ईवी गाड़ियां बन सकती हैं और न ही सेना के आधुनिक हथियार.

तीसरे देशों में चीन को मात

ये लड़ाई सिर्फ भारत और अमेरिका तक सीमित नहीं है. अब दोनों देश मिलकर अफ्रीका और साउथ अमेरिका जैसे खनिज खजानों से लबालब इलाकों में एंट्री करने वाले हैं. भारत का खान मंत्रालय और अमेरिका की डीएफसी (DFC) संस्था मिलकर काम करेंगी. ये दोनों मिलकर उन खदानों को खरीदेंगे जिन पर चीन नजर गड़ाए बैठा रहता है. अब चीन के सरकारी पैसे के मुकाबले भारत और अमेरिका की प्राइवेट और सरकारी कंपनियां मिलकर बोली लगाएंगी, जिससे चीन को इन देशों से खाली हाथ लौटना पड़ेगा.

भारत के सेमीकंडक्टर मिशन को पंख

गुजरात और असम में जो भारत के सेमीकंडक्टर प्लांट लग रहे हैं, उन्हें गैलियम, जर्मेनियम और इंडियम जैसे बेहद दुर्लभ मिनरल्स की लगातार जरूरत होती है. इस पैक्ट के बाद भारत को इन चीजों के लिए कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा. बदले में, अमेरिका को भारत से रिफाइन किए गए बेहतरीन क्वालिटी के मैग्नेट्स मिलेंगे, जो उनके फाइटर जेट्स और डिफेंस सिस्टम में काम आएंगे. यह एक ऐसा तगड़ा बिजनेस और रणनीतिक गठजोड़ है, जिसने चीन की सबसे बड़ी ताकत को ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बना दिया है.

क्लीन एनर्जी का नया दौर

ग्लोबल एक्सपर्ट्स मान रहे हैं कि ये समझौता दुनिया की सप्लाई चेन का पूरा इतिहास बदल देगा. अब तक जो क्लीन एनर्जी का रास्ता चीन से होकर गुजरता था, वो अब भारत और अमेरिका के सुरक्षित और लोकतांत्रिक रास्ते से आगे बढ़ेगा. ये चीन की दादागीरी पर सबसे करारा अटैक है.

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Utkarsha Srivastava

Utkarsha Srivastava is seasoned digital journalist specializing in geo-politics issues, currently writing for World section of News18 Hindi. With over a decade of extensive experience in hindi digital media, sh…और पढ़ें





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