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China-US Equal: एक तरफ अमेरिका पहले से ही युद्ध में उलझा हुआ है, वहीं अब उसे चीन की ओर से एक और टेंशन वाली खबर मिल गई है. दरअसल खुद को तकनीकी मामले में सबसे बेहतर मानने वाले अमेरिका की ही एक रिपोर्ट ने दावा किया है कि अब चीन उससे ज्यादा पीछे नहीं बल्कि बराबरी पर आ चुका है.
चीन की बराबरी से अमेरिका को झटका.
वॉशिंगटन: व्हाइट हाउस की ओर से साइंस पॉलिसी पर एक बड़ी रिपोर्ट में कहा गया कि रिसर्च पर खर्च के मामले में चीन अमेरिका का बराबरी का कॉम्पिटिटर बन गया है. इतना ही नहीं रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बीजिंग की वेल प्लानिंग और कोशिशों से अहम और उभरती हुई टेक्नोलॉजी में उसकी क्षमताएं तेजी से बढ़ रही हैं. यह आकलन ‘साइंस: ए न्यू गोल्डन एज’ नाम की रिपोर्ट में किया गया है. इसे व्हाइट हाउस के ऑफिस ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी पॉलिसी ने जारी किया था.
यह अमेरिका के सालाना लगभग 200 अरब डॉलर के फेडरल रिसर्च और डेवलपमेंट सिस्टम को फिर से व्यवस्थित करने का एक ब्लूप्रिंट है. रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले बीस सालों में, चीन का रिसर्च और डेवलपमेंट पर खर्च, जो पहले अमेरिका के मुकाबले न के बराबर था, कुछ पैमानों के अनुसार ‘परचेजिंग-पावर-एडजस्टेड’ आधार पर अब अमेरिका के बराबर हो गया है. इसमें इस कॉम्पिटिशन की तुलना कोल्ड वॉर के दौर से की गई है.
चीन-अमेरिका आ चुके हैं बराबरी पर
रिपोर्ट में अमेरिका, चीन और 27 देशों वाले यूरोपीय संघ की तुलना करने वाले एक चार्ट में बताया गया है कि पहली बार अमेरिका को रिसर्च और डेवलपमेंट खर्च में परचेजिंग पावर पैरिटी एडजस्टेड आधार पर बराबरी का कॉम्पिटिटर मिला है. दस्तावेज में कहा गया है कि बीजिंग ने वैज्ञानिक रिसर्च क्षमता को अपनी ग्लोबल कॉम्पिटिटिव स्ट्रैटेजी के केंद्र में रखा है, जिसमें सबसे ऊंचे स्तर पर फैसले लिए जाते हैं और अलग-अलग सेक्टर में रिसर्च की कोशिशों में तालमेल बिठाया जाता है. इसमें कहा गया है कि समाज के सभी वर्गों को शामिल करने वाले इस नजरिये की वजह से चीन बुनियादी वैज्ञानिक रिसर्च के लिए संसाधन जुटा पाया है, राष्ट्रीय हित की अहम टेक्नोलॉजी में तेजी से आगे बढ़ पाया है और अपनी इनोवेशन प्रक्रिया में सुधार कर पाया है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स में आगे
चीन की पहचान ऑटोनॉमस लैब में भी एक कॉम्पिटिटर के तौर पर की गई है, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स प्रयोगों को डिजाइन करने और उन्हें करने में मदद कर सकते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका ने अपनी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में प्रोटोटाइप ऑटोनॉमस सुविधाएं स्थापित की हैं, लेकिन कनाडा और चीन समेत दूसरे देश तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. व्हाइट हाउस का ब्लूप्रिंट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, न्यूक्लियर फिशन और फ्यूजन, एडवांस्ड कम्युनिकेशन, रोबोटिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और स्पेस सिस्टम पर फेडरल संसाधनों को केंद्रित करने की सलाह देता है.
रिपोर्ट में भारत कहां?
रिपोर्ट में भारत या भारतीय वैज्ञानिक संस्थानों का कोई जिक्र नहीं है. दस्तावेज में बताए गए किसी भी राष्ट्रीय टेक्नोलॉजी मिशन में भारत को संभावित पार्टनर के तौर पर भी नहीं पहचाना गया है. हालांकि इसके साथ जारी वित्तीय वर्ष 2028 की रिसर्च प्राथमिकताओं से जुड़े मेमोरेंडम में फेडरल एजेंसियों को ऐसी फंडिंग पहलों पर विचार करने की अनुमति दी गई है, जिनमें इंटरनेशनल पार्टनर लागत साझा करते हैं. हालांकि रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय तुलनाओं में चीन का दबदबा दिखता है, लेकिन रिसर्च में सुधार या औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के उदाहरण के तौर पर कई अन्य देशों का भी ज़िक्र किया गया है।
यूनाइटेड किंगडम को अपने विज्ञान-फंडिंग सिस्टम को फिर से व्यवस्थित करने और 2024 में एक ‘मेटासाइंस यूनिट’ बनाने का श्रेय दिया जाता है. नॉर्वे का उदाहरण दिया गया है कि कैसे उसने अपनी राष्ट्रीय रिसर्च काउंसिल को पोर्टफोलियो-आधारित सिस्टम के तहत व्यवस्थित किया है. रिपोर्ट में यह भी याद दिलाया गया है कि कैसे 1980 के दशक तक जापानी निर्माताओं ने ग्लोबल मेमोरी-चिप मार्केट के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था. व्यापक स्तर पर, दस्तावेज चेतावनी देता है कि अमेरिका में हुई खोजों का औद्योगिक लाभ अक्सर दूसरे देशों को मिला है.
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News18 में इंटरनेशनल डेस्क पर कार्यरत हैं. टीवी पत्रकारिता का भी अनुभव है और इससे पहले Zee Media Ltd. में कार्य किया. डिजिटल वीडियो प्रोडक्शन की जानकारी है. टीवी पत्रकारिता के दौरान कला-साहित्य के साथ-साथ अंतरर…और पढ़ें




