US Iran War | Shadow of 1979 Crisis | जिमी कार्टर की वो गलती जो ट्रंप नहीं दोहराना चाहते, अमेरिकी सेना की सबसे घातक यूनिट ईरान के लिए रवाना!


वाशिंगटन: पेंटागन ने इस हफ्ते मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सेना की 82nd एयरबोर्न डिवीजन के लगभग 1,000 सैनिकों को तैनात करने की योजना की पुष्टि की है. इस फैसले ने ईरान के उस इतिहास को फिर से जिंदा कर दिया है, जो करीब आधी सदी से अधूरा पड़ा था. साल 1979 में जब ईरानी क्रांति ने शाह का तख्ता पलट दिया था, तब अमेरिकी योजनाकारों ने गुप्त रूप से जमीनी सेना भेजने की तैयारी की थी. उस वक्त भी 82nd एयरबोर्न को बंधक बचाव अभियान के लिए अलर्ट पर रखा गया था. हालांकि, उस समय के राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने अंतिम समय में जमीनी आक्रमण का विचार त्याग दिया था. उन्हें डर था कि यह रणनीतिक रूप से विनाशकारी साबित हो सकता है. उन्होंने इसके बजाय हेलीकॉप्टर रेस्क्यू मिशन ‘ऑपरेशन ईगल क्लॉ’ को चुना, जो बुरी तरह विफल रहा था. अब साल 2026 में हालात फिर से वैसे ही नजर आ रहे हैं. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बढ़ते हवाई युद्ध और कूटनीतिक अनिश्चितता के बीच पैराट्रूपर्स की तैनाती को मंजूरी दे दी है

82nd एयरबोर्न डिवीजन की ताकत क्या है और यह क्यों खास है?

नॉर्थ कैरोलिना के फोर्ट ब्रैग में स्थित 82nd एयरबोर्न डिवीजन अमेरिकी सेना की सबसे घातक ‘रैपिड रिस्पॉन्स’ यूनिट मानी जाती है. इसकी खासियत यह है कि यह दुनिया के किसी भी कोने में महज 18 घंटे के भीतर तैनात हो सकती है. यह भारी बख्तरबंद यूनिट्स की तुलना में काफी हल्की और तेज है. इनका मुख्य काम दुश्मन के इलाके में पैराशूट से उतरना और महत्वपूर्ण ठिकानों पर कब्जा करना है.

1979 के संकट के दौरान भी योजनाकारों ने सोचा था कि अगर बंधकों को नुकसान पहुंचा, तो इसी यूनिट का इस्तेमाल किया जाएगा. आज भी जब ईरान के साथ तनाव चरम पर है, तो इसी यूनिट को सबसे पहले याद किया गया है. इस बार की तैनाती में सिर्फ सैनिक ही नहीं, बल्कि डिवीजन के कमांडिंग जनरल और हेडक्वार्टर स्टाफ भी शामिल है.

कमांडिंग अधिकारियों का भेजा जाना संकेत देता है कि यह केवल प्रतीकात्मक तैनाती नहीं है. यह किसी बड़े ऑपरेशनल कंट्रोल की तैयारी का हिस्सा हो सकता है.

क्या हवाई हमले के बाद अब जमीनी युद्ध की बारी है?

  • अब तक ईरान के खिलाफ युद्ध का सारा दारोमदार एयर पावर पर रहा है. फाइटर जेट्स, बॉम्बर्स और ड्रोन की मदद से मिसाइल साइट्स और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया जा रहा है. लेकिन हवाई हमलों की अपनी एक सीमा होती है.
  • अगर वॉशिंगटन को लगता है कि सिर्फ आसमान से लक्ष्य हासिल नहीं हो रहे, तो जमीनी सेना का विकल्प ही बचता है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुला रखने या खार्ग द्वीप जैसे तेल ठिकानों को सुरक्षित करने के लिए 82nd एयरबोर्न की भूमिका अहम हो जाती है.
  • एयरबोर्न सैनिक बिना किसी पोर्ट या रनवे के सीधे टारगेट पर उतर सकते हैं. उनकी मौजूदगी मात्र से ईरान की रणनीति बदल सकती है. अब तेहरान को सिर्फ हवाई हमलों को सहना नहीं होगा, बल्कि उसे अपनी जमीन बचाने के लिए भी लड़ना पड़ेगा.
  • हालांकि, जरूरी नहीं कि सैनिकों की आमद का मतलब तुरंत हमला ही हो. अक्सर ऐसी तैनाती दुश्मन को डराने और बातचीत की मेज पर लाने के लिए भी की जाती है.

2026 में क्या ट्रंप लेंगे कार्टर से अलग फैसला?

इतिहास गवाह है कि 82nd एयरबोर्न ने अक्सर युद्ध रोकने के लिए ‘डिटरेंस’ का काम किया है. पोलैंड में रूस के खिलाफ या 2021 में अफगानिस्तान से लोगों को निकालने में इसकी बड़ी भूमिका रही थी. लेकिन आज का संदर्भ बिल्कुल अलग है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पेंटागन ने ईरान के अंदर जमीनी कार्रवाई के लिए विस्तृत प्लान तैयार कर रखे हैं.

1979 में इस यूनिट ने ट्रेनिंग की और इंतजार किया, लेकिन कभी मैदान में नहीं उतरी. साल 2026 में जब पैराट्रूपर्स एक बार फिर युद्ध के आदेश पर पूर्व की ओर बढ़ रहे हैं, तो वह फैसला अब सिर्फ कागजी नहीं रह गया है जिसे कार्टर ने टाल दिया था. अगर राष्ट्रपति ट्रंप जमीनी युद्ध का रास्ता चुनते हैं, तो 82nd एयरबोर्न इस पूरे संघर्ष के केंद्र में होगी.



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