फिलहाल असली कहानी एक नए भुगतान नेटवर्क की घोषणा से ज्यादा अलग-अलग देशों के मौजूदा भुगतान सिस्टम को आपस में जोड़ने, स्थानीय मुद्राओं में भुगतान बढ़ाने और केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC- Central Bank Digital Currency) के इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश की है. यही कोशिश अगर बड़े पैमाने पर सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में अमेरिका और डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के लिए चुनौती जरूर बन सकती है.
SWIFT और अमेरिकी वित्तीय शक्ति का संबंध
SWIFT नेटवर्क अमेरिकी वित्तीय शक्ति से इसलिए जुड़ा है क्योंकि यह दुनिया भर में होने वाले अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन के लिए एक प्रमुख सुरक्षित मैसेजिंग सिस्टम है. SWIFT खुद पैसा ट्रांसफर नहीं करता, बल्कि बैंकों के बीच भुगतान संबंधी निर्देश भेजता है. बड़ी मात्रा में वैश्विक लेनदेन अमेरिकी डॉलर में होते हैं, जिससे अमेरिकी वित्तीय संस्थान इस नेटवर्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर की प्रमुख भूमिका है. SWIFT के जरिए होने वाले अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में डॉलर की हिस्सेदारी करीब आधे के आसपास रही है. इसके कारण अमेरिकी बैंक और वित्तीय संस्थान वैश्विक भुगतान श्रृंखला में महत्वपूर्ण केंद्र बने हुए हैं.
ब्रिक्स आखिर करना क्या चाहता है?
ब्रिक्स देशों के बीच सीमा-पार भुगतान को आसान बनाने का मुद्दा नया नहीं है. रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद इसकी अहमियत और बढ़ गई. ब्रिक्स देशों में यह सोच मजबूत हुई कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए किसी एक देश या एक वित्तीय नेटवर्क पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम पैदा कर सकती है. भारत की तरफ से भी इस दिशा में काम आगे बढ़ाया जा रहा है.
यानी फिलहाल फोकस यह नहीं है कि एक दिन अचानक “नया SWIFT” सामने आ जाए. कोशिश यह है कि अलग-अलग देशों की मौजूदा डिजिटल भुगतान क्षमताओं को जोड़कर अंतरराष्ट्रीय भुगतान को ज्यादा आसान बनाया जाए.
SWIFT इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
SWIFT (Society for Worldwide Interbank Financial Telecommunication) को समझना जरूरी है. स्विफ्ट खुद किसी बैंक खाते से पैसा निकालकर दूसरे खाते में नहीं भेजता. यह दुनिया के बैंकों और वित्तीय संस्थानों के बीच भुगतान संबंधी सुरक्षित संदेश और निर्देश भेजने का नेटवर्क है.
उदाहरण के लिए: जब किसी देश का बैंक दूसरे देश के बैंक को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के बारे में निर्देश भेजता है, तो इस पूरी प्रक्रिया में SWIFT की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है. इसी वजह से SWIFT सिर्फ तकनीकी नेटवर्क नहीं है. वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में इसकी पहुंच इसे भू-राजनीतिक ताकत का हिस्सा भी बनाती है.
रूस के कुछ बैंकों को पश्चिमी प्रतिबंधों के तहत SWIFT से बाहर किए जाने के बाद पूरी दुनिया ने देखा कि अंतरराष्ट्रीय भुगतान नेटवर्क तक पहुंच कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है. यही कारण है कि BRICS के भीतर वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था की चर्चा को केवल तकनीकी मामला नहीं माना जा रहा.
SWIFT ट्रांसफर की प्रक्रिया
- संदेश भेजना: जब आप भारत से किसी दूसरे देश में पैसे भेजते हैं, तो आपका बैंक एक सुरक्षित SWIFT संदेश तैयार करता है.
- SWIFT कोड (BIC): हर बैंक की विशेष शाखा को 8 से 11 अंकों का एक यूनिक SWIFT कोड (या BIC) मिलता है. यह कोड पहचानता है कि पैसा किस देश के किस बैंक और शाखा में जाना है.
- मध्यस्थ बैंक (Correspondent Banks): यदि भेजने वाले और पाने वाले बैंक का सीधा खाता आपस में नहीं है, तो बीच में मध्यस्थ (Correspondent) बैंकों की मदद से SWIFT संदेश के जरिए भुगतान पूरा किया जाता है.
क्या BRICS Pay बनेगा SWIFT का सीधा विकल्प?
यहां सबसे ज्यादा सावधानी की जरूरत है. BRICS Pay नाम से एक साझा भुगतान व्यवस्था की अवधारणा जरूर सामने आती रही है, लेकिन इसे अभी SWIFT का स्थापित और पूर्ण विकल्प बताना सही नहीं होगा. SWIFT का नेटवर्क कई दशकों में बना है. दुनिया के हजारों बैंक और वित्तीय संस्थान इसके जरिए जुड़े हुए हैं.
दूसरी तरफ BRICS देशों के बैंकिंग और भुगतान सिस्टम अलग-अलग हैं. भारत का यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI- Unified Payments Interface), चीन की अलग डिजिटल भुगतान व्यवस्था और रूस की अपनी वित्तीय प्रणालियां एक जैसी तकनीक और नियमों पर काम नहीं करतीं.
इसलिए चुनौती केवल एक नया ऐप या नेटवर्क बनाने की नहीं है, चुनौती है:
अलग-अलग देशों के भुगतान सिस्टम को जोड़ना भुगतान के नियमों में तालमेल बनाना सुरक्षा और साइबर जोखिमों से निपटना अलग-अलग मुद्राओं में भुगतान का हिसाब करना बैंकों और वित्तीय संस्थानों को एक साझा व्यवस्था में जोड़ना
यही वजह है कि “BRICS SWIFT को खत्म करने जा रहा है” कहना अभी अतिशयोक्ति होगी. सही बात यह है कि BRICS SWIFT पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक रास्ते तैयार करने की कोशिश कर रहा है.
भारत के UPI की क्यों हो रही है चर्चा?
इस पूरी कहानी में भारत की भूमिका खास है. भारत ने पिछले कुछ वर्षों में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस के जरिए घरेलू डिजिटल भुगतान का बड़ा नेटवर्क तैयार किया है. अब भारत चाहता है कि उसकी डिजिटल भुगतान तकनीक का इस्तेमाल दूसरे देशों के साथ सीमा-पार भुगतान में भी हो.
इन समझौतों में डिजिटल पहचान, डिजिटल भुगतान, डेटा एक्सचेंज और डिजिटल सेवा उपलब्ध कराने वाले प्लेटफॉर्म जैसे क्षेत्रों में सहयोग शामिल है. ये समझौते भारत की इंडिया स्टैक के तहत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को दूसरे देशों तक पहुंचाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं.
भारत सरकार ने क्यूबा, केन्या, संयुक्त अरब अमीरात और लाओ पीपुल्स डेमोक्रेटिक रिपब्लिक (LPDR- Lao People’s Democratic Republic) के साथ डिजिलॉकर (DigiLocker) के क्षेत्र में भी समझौता ज्ञापन किए हैं. यही वजह है कि BRICS की भुगतान चर्चा में फास्ट पेमेंट सिस्टम को जोड़ने का विचार महत्वपूर्ण हो जाता है.
अगर भविष्य में BRICS के देशों के फास्ट पेमेंट नेटवर्क आपस में जुड़ जाते हैं, तो कल्पना कीजिए कि भारत से किसी BRICS देश में भुगतान करने वाले व्यक्ति या कारोबारी को पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रक्रिया के कई चरणों से गुजरने की जरूरत न पड़े.
भुगतान ज्यादा तेज और सस्ता हो सकता है, हालांकि, यह व्यवस्था लागू करने के लिए सिर्फ तकनीक काफी नहीं होगी. देशों को नियम, मुद्रा विनिमय, बैंकिंग निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था पर भी सहमति बनानी होगी.
CBDC का इसमें क्या रोल है?
CBDC (Central Bank Digital Currency) यानी केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा इस पूरी योजना का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा है. CBDC किसी देश के केंद्रीय बैंक द्वारा जारी डिजिटल मुद्रा होती है. भारत में इसका डिजिटल रुपया या ई-रुपया (e₹) प्रयोग के रूप में मौजूद है.
अगर अलग-अलग BRICS देश अपनी केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं को आपस में जोड़ने की व्यवस्था विकसित करते हैं, तो भविष्य में सीमा-पार भुगतान के लिए नई संभावनाएं खुल सकती हैं. मसलन, भारत का डिजिटल रुपया और किसी दूसरे देश की डिजिटल मुद्रा के बीच सीधे भुगतान की व्यवस्था तैयार की जा सकती है.
लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण अंतर है:
- CBDC को आपस में जोड़ने की चर्चा का मतलब यह नहीं है कि BRICS ने कोई साझा डिजिटल मुद्रा बना ली है
- BRICS की साझा मुद्रा की चर्चा अलग मुद्दा है और CBDC इंटरऑपरेबिलिटी यानी अलग-अलग डिजिटल मुद्राओं को आपस में काम करने योग्य बनाना अलग मुद्दा है
क्या इससे डॉलर को चुनौती मिलेगी?
यहीं से कहानी अमेरिका तक पहुंचती है. दुनिया की वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर की भूमिका बहुत बड़ी है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश, बैंकिंग और विदेशी मुद्रा बाजारों में डॉलर की गहरी पकड़ है. अगर BRICS देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान बढ़ाते हैं, तो कुछ लेन-देन में डॉलर की जरूरत कम हो सकती है.
पश्चिमी देशों से बढ़ते तनाव और प्रतिबंधों के बाद रूस ने भारत समेत ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने शुरू किए. भारत और रूस के बीच व्यापार में वित्त वर्ष 2024-25 में काफी बढ़ोतरी हुई. इसमें भारत की ओर से रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदना सबसे बड़ी वजह रही.
मान लीजिए भारत और रूस के बीच व्यापार का एक हिस्सा सीधे रुपये और रूबल में निपटाया जाता है. ऐसी स्थिति में हर लेन-देन में डॉलर को बीच की मुद्रा बनाने की जरूरत नहीं होगी.
इसी तरह अगर भारत और अन्य BRICS देशों के भुगतान नेटवर्क आपस में जुड़ते हैं, तो पश्चिमी वित्तीय नेटवर्क पर निर्भरता के कुछ हिस्से को कम किया जा सकता है.
लेकिन इसका मतलब डॉलर का अंत नहीं है, यह अंतर समझना बेहद जरूरी है.
अमेरिका को कितना झटका लगेगा?
अगर BRICS की भुगतान व्यवस्था सफल होती है, तो अमेरिका के लिए सबसे बड़ा असर तत्काल आर्थिक नुकसान से ज्यादा रणनीतिक और भू-राजनीतिक हो सकता है. अमेरिका की ताकत सिर्फ SWIFT से नहीं आती. इसके पीछे अमेरिकी डॉलर की वैश्विक मांग, अमेरिकी वित्तीय बाजारों की गहराई, अमेरिकी बैंकिंग व्यवस्था और दुनिया के निवेश तंत्र में अमेरिकी संस्थानों की बड़ी भूमिका है.
इसलिए BRICS द्वारा वैकल्पिक भुगतान नेटवर्क बनाना अकेले डॉलर की वैश्विक स्थिति को नहीं बदल देगा. लेकिन अगर कई देश धीरे-धीरे, स्थानीय मुद्रा → स्थानीय मुद्रा भुगतान की तरफ बढ़ते हैं, तो डॉलर की मध्यस्थ भूमिका कुछ क्षेत्रों में कम हो सकती है. यही अमेरिका के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण चुनौती होगी.
रूस के लिए यह सबसे अहम क्यों है?
रूस इस पूरी बहस के सबसे बड़े समर्थकों में से एक है. पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस ने वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था विकसित करने की कोशिश तेज की. उसका अपना वित्तीय संदेश नेटवर्क और घरेलू भुगतान ढांचा है. रूस के लिए ऐसी BRICS व्यवस्था का फायदा यह हो सकता है कि पश्चिमी वित्तीय नेटवर्क से बाहर भी व्यापार के लिए नए रास्ते उपलब्ध हों. लेकिन भारत की स्थिति रूस से अलग है.
भारत किसी एक वित्तीय व्यवस्था से बाहर निकलने की रणनीति नहीं अपना रहा है. भारत का दृष्टिकोण ज्यादा व्यावहारिक है: जहां जो व्यवस्था फायदेमंद हो, उसका इस्तेमाल करना और साथ ही विकल्प तैयार रखना.
चीन की भूमिका भी बेहद अहम
BRICS की किसी भी वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था की सफलता में चीन की भूमिका बड़ी होगी. चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और उसके पास विशाल बैंकिंग तथा डिजिटल भुगतान ढांचा है. चीन लंबे समय से अपनी मुद्रा युआन के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.
अगर BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में भुगतान बढ़ता है, तो चीन को भी अपने युआन के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाने का अवसर मिल सकता है. लेकिन यहां भारत और चीन के हित पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं.
भारत डॉलर पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ यह भी नहीं चाहता कि किसी दूसरी मुद्रा पर नई निर्भरता पैदा हो. इसलिए भारत के लिए “डॉलर से मुक्ति” से ज्यादा महत्वपूर्ण “विकल्पों की स्वतंत्रता” हो सकती है.
क्या 2026 में SWIFT जैसा सिस्टम लॉन्च होगा?
अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. 2026 में जिस दिशा में ठोस चर्चा सामने आई है, वह है:
फास्ट पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ना केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी स्थानीय मुद्राओं में सीमा-पार भुगतान भुगतान की लागत और समय कम करना अंतरराष्ट्रीय भुगतान में एकल नेटवर्क पर निर्भरता कम करना
इसलिए अगर BRICS 2026 में कोई बड़ा ऐलान करता भी है, तो संभव है कि वह SWIFT की हूबहू नकल करने वाले नेटवर्क के बजाय मौजूदा राष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों को जोड़ने की दिशा में हो.
असली खेल SWIFT को हटाना नहीं, विकल्प बनाना है
BRICS की रणनीति को अगर एक लाइन में समझना हो तो वह यह होगी: “SWIFT को कल खत्म करना नहीं, बल्कि ऐसा विकल्प तैयार करना कि जरूरत पड़ने पर SWIFT के बिना भी भुगतान किया जा सके”
यही अंतर इस पूरी कहानी को समझने के लिए महत्वपूर्ण है. अगर BRICS देश सफलतापूर्वक अपने भुगतान नेटवर्क जोड़ लेते हैं, CBDC को सीमा-पार भुगतान में इस्तेमाल करने लगते हैं और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाते हैं, तो दुनिया की वित्तीय व्यवस्था ज्यादा बहुध्रुवीय हो सकती है.
इसका मतलब अमेरिका की वित्तीय ताकत खत्म होना नहीं होगा. लेकिन अमेरिका के पास मौजूद वित्तीय दबदबे का एक हिस्सा धीरे-धीरे चुनौती के घेरे में जरूर आ सकता है.
निष्कर्ष: झटका अमेरिका को लगेगा, लेकिन धीरे-धीरे
BRICS 2026 को इसलिए “SWIFT बनाम BRICS” की लड़ाई के रूप में देखना सही नहीं होगा. यह कहानी है कि क्या भारत, चीन, रूस और दूसरे BRICS देश मिलकर अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए एक से ज्यादा रास्ते तैयार कर सकते हैं.
अगर ऐसा होता है तो अमेरिका को सबसे बड़ा झटका किसी एक दिन नहीं लगेगा. असर धीरे-धीरे दिखाई देगा, जब व्यापार के ज्यादा हिस्से में डॉलर की जरूरत कम होगी, स्थानीय मुद्राओं में भुगतान बढ़ेगा और पश्चिमी वित्तीय नेटवर्क के बाहर भी अंतरराष्ट्रीय भुगतान संभव होगा.
2003 में दुनिया के कुल निर्यात में ब्रिक्स की हिस्सेदारी करीब 12 फीसदी थी, जो 2024 में बढ़कर लगभग 24 फीसदी हो गई. यानी दुनिया के कुल सामान के निर्यात में अब ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी करीब एक-चौथाई है.
आयात की बात करें तो 2003 में ब्रिक्स देशों ने दुनिया से करीब 783 अरब डॉलर का सामान खरीदा था. 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 4.92 ट्रिलियन डॉलर हो गया. वैश्विक आयात में भी ब्रिक्स की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी से बढ़कर 20 फीसदी हो गई.
सीधे शब्दों में कहें तो ब्रिक्स अब सिर्फ राजनीतिक समूह नहीं रह गया है. व्यापार के मामले में भी इसका वजन तेजी से बढ़ा है. दुनिया के कुल निर्यात और आयात में ब्रिक्स की बढ़ती हिस्सेदारी बताती है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में इन देशों का प्रभाव लगातार मजबूत हो रहा है.




