अमेरिकी सर्विलांस और सटीक हमलों में माहिर MQ-9 रिपर को अमेरिका अब बदलने जा रहा है. एक समय आसमान का बेताज बादशाह माने जाने वाला MQ-9 रिपर अब अमेरिका को बोझ लगने लगा है. इसकी वजह दुश्मन नहीं, बल्कि वक्त का बदलता मिजाज और युद्ध की नई सच्चाई है.
करीब दो दशकों तक एमक्यू-9 रीपर अमेरिका के ड्रोन युद्ध का सबसे बड़ा हथियार रहा. लेकिन अमेरिका ऐसे महंगे ड्रोन नहीं चाहता जिन्हें हर कीमत पर बचाना पड़े. इसलिए अब अमेरिका सस्ते ड्रोनों की तलाश में है. यानी कम लागत में ज्यादा गिनती में ड्रोन बनाना. कुछ ड्रोन दुश्मन मार भी गिराए, तो पूरी ताकत कमजोर न पड़े.
इसी सोच के बीच अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स ने अपने नए वाइल्डफायर जानकारी सामने रखी है. इसे अगली पीढ़ी के ऐसे ड्रोन के तौर पर देखा जा रहा है. खुफिया निगरानी से लेकर दुश्मन पर हमला करने तक कई काम करेगा.
5 करोड़ डॉलर का एक ड्रोन!
रीपर की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी कीमत भी बन गई है. अमेरिकी वायुसेना का मानना है कि सेंसर और दूसरे पार्ट के साथ एक एमक्यू-9 रीपर की कीमत करीब 5 करोड़ डॉलर तक पहुंच सकती है. ऐसे ड्रोन को ऐसे युद्ध में खोना अमेरिका के लिए काफी महंगा सौदा है. यही वजह है कि अब अमेरिका अब ऐसे ड्रोन बनाने में लगा है जिन्हें खोने पर भारी नुकसान न हो.
वाइल्डफायर की एंट्री
जनरल एटॉमिक्स का वाइल्डफायर इसी नई सोच तैयार किया जा रहा है. कंपनी ने बताया है कि यह ड्रोन लंबी दूरी तक उड़ान भरने और लंबे समय तक मिशन पर रहने में सक्षम होगा. इसकी अनुमानित फेरी रेंज करीब 18 हजार किलोमीटर बताई गई है.
इसमें भविष्य में लंबी दूरी की एलआरएएसएम एंटी-शिप मिसाइल जैसी घातक मिसाइलों को शामिल करने की क्षमता भी बताई गई है. यानी यह सिर्फ आसमान में निगरानी करने वाला ड्रोन नहीं होगा. जरूरत पड़ने पर यह दुश्मन के जहाजों को भी निशाना बना सकता है.
अकेला ड्रोन नहीं, पूरा झुंड!
अमेरिका की नई रणनीति का सबसे दिलचस्प हिस्सा है ड्रोन स्वॉर्म. सोचिए दुश्मन के सामने एक-दो महंगे ड्रोन नहीं, बल्कि बड़ी गिनती में ड्रोन एक साथ पहुंच जाएं. दुश्मन अगर कुछ ड्रोन मार भी गिराता है, तो बाकी ड्रोन अपना मिशन जारी रख सकते हैं. यही है एट्रिटेबल मास यानी बड़ी संख्या में ऐसे हथियार जिन्हें खोने का जोखिम उठाया जा सके.
यूक्रेन और मिडिल ईस्ट के युद्धों ने दिखाया है कि छोटे और सस्ते ड्रोन भी बेहद खतरनाक हो सकते हैं. कम कीमत वाले ड्रोन बड़ी संख्या में भेजकर महंगी एयर डिफेंस मिसाइलों को खर्च कराया जा सकता है. यानी कभी-कभी कुछ लाख डॉलर के ड्रोन को रोकने के लिए लाखों डॉलर की मिसाइल खर्च करनी पड़ती है. अमेरिका अब इसी बदलते वॉर मॉडल के लिए खुद को तैयार करना चाहता है.
लेकिन रीपर अभी खत्म नहीं हुआ
इसका मतलब यह नहीं है कि एमक्यू-9 रीपर तुरंत मैदान से बाहर हो जाएगा. रीपर अभी भी खुफिया निगरानी और लंबी दूरी के मिशन में बेहद उपयोगी है. अमेरिकी सेना इसकी क्षमता बढ़ाने के लिए ईंधन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम बना रही है. साथ ही लंबी दूरी के हथियार भी जोड़ रही है. समस्या सिर्फ इतनी है कि दुश्मन के मजबूत एयर डिफेंस वाले इलाके में रीपर को भेजना लगातार महंगा और जोखिम भरा होता जा रहा है.
एमक्यू-9 रीपर ने अफगानिस्तान और इराक जैसे युद्धों में अमेरिका को बड़ी ताकत दी. यह लंबे समय तक हवा में रह सकता है. दुश्मन की निगरानी कर सकता है. जरूरत पड़ने पर मिसाइलें भी दाग सकता है.
लेकिन अब युद्ध का मैदान बदल चुका है.
ईरान और हूती जैसे विरोधियों के पास भी ऐसे हथियार हैं जो इन ड्रोन को मार गिरा सकते हैं. ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका के कम से कम 45 रीपर ड्रोन तबाह हो चुके हैं. एक समस्या यह भी है कि रीपर का प्रोडक्शन बंद हो चुका है. यानी जितने ड्रोन खोए जा रहे हैं, उन्हें तेजी से बदलना आसान नहीं है.




