हमने अभी-अभी अपनी 23 दिन की भूख हड़ताल खत्म की थी और जंतर-मंतर पर बैठे थे। हम कहीं भी मार्च करने की हालत में नहीं थे।
पुलिस ने खुद ही लोगों को संसद से दूर
जंतर-मंतर की तरफ भेजा। फिर, जब लोग वहां
जमा हो गए, तो आंसू गैस छोड़ी गई और लाठीचार्ज किया गया। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को पीटा गया, कितनों की हड्डियां टूट गईं, सिर फट गए और उन्हें बुरी तरह जख्मी कर दिया गया। क्या इनमें से कुछ भी जरूरी था?
घायल छात्र लगातार हमारे टेंट में आ रहे थे, जहां वॉलंटियर डॉक्टरों द्वारा उन्हें प्राथमिक उपचार दिया जा रहा था। इसी अफरा-तफरी के बीच आइसा टेंट के पीछे की एक दीवार गिर गई, जिससे भूख हड़ताल पर बैठे हमारे साथियों में से एक साथी घायल हो गया।
शुरुआत में अधिकारी इस बात से इनकार करते रहे कि पैलेट गन का इस्तेमाल भी किया गया था। आप ‘आउटलुक’ के पत्रकार और दिल्ली यूनिवर्सिटी एवं ऑम्बेडकर यूनिवर्सिटी के उन छात्रों से पूछिए जो पैलेट की चपेट में आए थे। दिल्ली पुलिस का अपना रिकॉर्ड बताता है कि एक अधिकारी ने पैलेट गन के इस्तेमाल का आदेश दिया था। हमारे पास ऐसे दस्तावेज भी हैं जिनसे पता चलता है कि पैलेट गन जारी (इशू) की गई थीं।
अधिकारियों को एक सीधे-सादे सवाल का जवाब देना चाहिए: जिन लोगों की आंखें हमेशा के लिए खराब हो गईं, जिनकी सुनने की क्षमता चली गई या जिन्हें अन्य स्थायी किस्म का नुकसान हुआ, उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा? कई छात्र अब भी अस्पताल में हैं, जिनमें से कुछ की हालत गंभीर है।
20 जुलाई के बाद, यह आंदोलन सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक सीमित नहीं रहा। उनका इस्तीफा आखिरकार मंजूर भी कर लिया गया, क्योंकि भाजपा और आरएसएस, दोनों ही समझ चुके थे कि जनता का गुस्सा अब प्रधानमंत्री तक पहुंच चुका है। पूरी भाजपा सरकार से ही जवाबदेही की मांग की जा रही थी, क्योंकि इतने व्यापक स्तर पर हिंसा ऊपर से मिले आदेशों के बिना नहीं हो सकती थी।
इसीलिए मैं कहती हूं कि असली जवाबदेही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की है।




