टेक इंडस्ट्री के डेटा के मुताबिक, इस साल जनवरी से लेकर आज 20 मई 2026 तक दुनिया भर में 1 लाख से ज्यादा टेक कर्मचारी अपनी नौकरी गंवा चुके हैं. मार्च का महीना सबसे खराब रहा, जिसमें अकेले लगभग 50,000 लोगों की नौकरी गई. अगर हम इस साल की 5 सबसे बड़ी छंटनियों को देखें, तो तस्वीर और साफ हो जाती है.
Oracle: इसने सबसे ज्यादा 30,000 कर्मचारी निकाले, क्योंकि कंपनी पर AI के लिए बड़े कंप्यूटर और सर्वर खरीदने के चक्कर में कर्ज बहुत बढ़ गया था.
Amazon: इसने जनवरी में 16,000 लोगों को निकाला ताकि कंपनी के अंदर के फालतू के मैनेजमेंट लेयर्स और कागजी काम को कम किया जा सके.
Microsoft: इसने एक अलग तरीका अपनाया और करीब 8,750 कर्मचारियों को खुद से रिटायरमेंट लेने का ऑफर यानी वॉलंटरी रिटायरमेंट बायआउट देकर विदा कर दिया.
Meta: इसने आज 8,000 लोगों को निकाला है ताकि कंपनी की टीमों को छोटा और सीधे AI पर काम करने लायक बनाया जा सके.
Block, Inc. (जैक डोर्सी की कंपनी): इन्होंने अपने लगभग 40% स्टाफ यानी 4,000 से ज्यादा लोगों को कम कर दिया ताकि पूरी कंपनी को AI के हिसाब से नए सिरे से ढाला जा सके. इसके अलावा PayPal, Cisco और LinkedIn जैसी कंपनियों ने भी हजारों लोगों को निकाला है.
क्या कंपनियां मंदी की वजह से लोगों को निकाल रही हैं?
नहीं, ये मंदी नहीं है. मेटा जैसी कंपनियों ने इस तिमाही में अरबों डॉलर का मुनाफा कमाया है. तो फिर ये छंटनी क्यों हो रही है? इसका सीधा जवाब है. पैसा इंसानों से हटाकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर लगाया जा रहा है. कंपनियां इस समय दो बड़ी चीजें कर रही हैं.
कम लोगों से ज्यादा काम: उदाहरण के लिए, स्नैपचैट के सीईओ ने बताया कि उनकी कंपनी का 65% कोड अब AI खुद लिख रहा है. इसका मतलब है कि जहां पहले 10 जूनियर कोडर्स की जरूरत होती थी, वहां अब एक सीनियर इंजीनियर AI टूल्स की मदद से वही काम कुछ घंटों में कर लेता है.
मैनेजर्स की छुट्टी: कंपनियां अब मिड-लेवल मैनेजर्स को हटा रही हैं. एंथ्रोपिक के ‘Claude’ और ओपनएआई के ‘ChatGPT’ जैसे एडवांस टूल्स ने फाइलों को मैनेज करने और एंट्री-लेवल के कामों को इतना आसान कर दिया है कि अब उतने लोगों की जरूरत ही नहीं बची.
कर्मचारियों से ही AI को ट्रेनिंग: मेटा जैसी कंपनियां अपने कर्मचारियों के लैपटॉप में ऐसे सॉफ्टवेयर डाल रही हैं जो यह नोट करते हैं कि इंसान कंप्यूटर पर काम कैसे करता है. कंपनियां इस डेटा का इस्तेमाल अपने AI एजेंट्स को और समझदार बनाने के लिए कर रही हैं, ताकि आगे चलकर वे काम खुद कर सकें. कर्मचारी इस बात से खुश नहीं हैं, क्योंकि वे एक तरह से खुद को रिप्लेस करने वाली तकनीक को ही ट्रेन कर रहे हैं.
भारत के इंजीनियर्स और IT सेक्टर पर इसका क्या असर होगा?
जब भी सिलिकॉन वैली में टेक कंपनियां छींकती हैं, तो भारत के टेक सेक्टर को जुकाम हो जाता है. इस पूरी उथल-पुथल का भारत पर तीन तरह से सीधा असर पड़ रहा है.
1. भारतीय IT कंपनियों पर दबाव
भारत की बड़ी आईटी कंपनियां अमेरिका और यूरोप के बैंकों और रिटेल कंपनियों के लिए सॉफ्टवेयर बनाने का काम करती हैं. जब विदेशी कंपनियां अपना बजट इंसानों से हटाकर AI पर लगा रही हैं, तो वे भारतीय कंपनियों को मिलने वाले प्रोजेक्ट्स भी कम कर रही हैं. यही वजह है कि पिछले कुछ महीनों में भारतीय आईटी कंपनियों ने नए कॉलेज पास-आउट्स की हायरिंग बहुत कम कर दी है.
2. भारत के टेक स्टार्टअप्स में ‘फॉलो-द-लीडर’ का खेल
भारतीय स्टार्टअप्स हमेशा अमेरिकी कंपनियों के मॉडल को फॉलो करते हैं. जब मेटा और अमेजन जैसी कंपनियां छंटनी करके मुनाफा कमा रही हैं, तो भारत के बड़े स्टार्टअप्स भी अपने यहां से मिड-लेवल मैनेजर्स और जूनियर कोडर्स को हटा रहे हैं ताकि वे भी खुद को ‘AI-First’ दिखा सकें.
3. ‘सिर्फ कोडिंग’ जानने वालों के लिए खतरे की घंटी
भारत में हर साल लाखों छात्र इंजीनियरिंग करके निकलते हैं, जिनमें से ज्यादातर का काम बेसिक कोडिंग या टेस्टिंग का होता है. चूंकि यह बेसिक काम अब AI खुद कर ले रहा है, इसलिए सिर्फ ‘रटी-रटाई कोडिंग’ जानने वाले भारतीय युवाओं के लिए नौकरी पाना या उसे बचाए रखना मुश्किल हो रहा है.
भारतीय टेक वर्कर्स को अब क्या करना चाहिए?
डार्विन का एक नियम है, जो समय के साथ बदलेगा, वही बचेगा. भारतीय इंजीनियर्स के लिए भी अब यही मंत्र है. AI से डरना नहीं, उसे टूल बनाना है. कंपनियों को अब ऐसे लोग चाहिए जो ये कहें, ‘मैं AI का इस्तेमाल करके 5 लोगों का काम अकेले कर सकता हूं.’ पारंपरिक कोडिंग के बजाय अब डेटा साइंस, AI मॉडल ट्यूनिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग और साइबर सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों में मौके बढ़ रहे हैं. AI कोड लिख सकता है, लेकिन वह किसी क्लाइंट की बिजनेस प्रॉब्लम को इंसानों की तरह समझ नहीं सकता. इसलिए अपनी बातचीत करने और सोचने की क्षमता को मजबूत करना होगा.





