क्या आपने कभी सोचा है कि जिस पीएनजी गैस से आज लाखों घरों में खाना बनता है वो पीएनजी आखिर बनती कैसे है? आप रोज अपने घर में गैस पर खाना बनाते हैं, लेकिन यह गैस आपके घर तक पहुंचती कैसे है, क्या यह भी सिलेंडर की तरह कहीं भरकर किसी जगह पर लाई जाती है या फिर इसके पीछे कोई और ही कहानी छुपी हुई है? आज के समय में हर चीज स्मार्ट और आसान होती जा रही है, उसी तरह गैस सिस्टम भी बदल रहा है. पहले जहां हर घर में एलपीजी सिलेंडर आता था, वहीं अब धीरे-धीरे पीएनजी यानी पाइप्ड नेचुरल गैस (Piped Natural Gas) का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है. लेकिन, असली सवाल यह है, यह पीएनजी गैस आती कहां से है? क्या यह भी सीएनजी की तरह ही होती है? आखिर पाइप के जरिए यह गैस हमारे घर तक कैसे पहुंचती है? असल में, पीएनजी और एलपीजी के बीच सबसे बड़ा अंतर होता है. ये अंतर उनकी डेंसिटी यानी भारी या हल्की होने पर निर्भर होता है.
पीएनजी यानी नेचुरल गैस हवा से हल्की होती है. इसका मतलब अगर कहीं गैस लीक हो जाए तो यह ऊपर की तरफ उड़ जाती है और जल्दी फैल जाती है. वहीं, एलपीजी वातावरण की हवा से भारी होती है. यानी अगर एलपीजी लीक हो जाए तो यह नीचे जमीन पर जमा होने लगती है और यही वजह है कि एलपीजी लीकेज ज्यादा खतरनाक हो सकता है क्योंकि यह एक जगह इकट्ठा होकर ब्लास्ट का खतरा बढ़ा देता है. इसी वजह से सेफ्टी के हिसाब से देखा जाए तो पीएनजी को एलपीजी से ज्यादा सुरक्षित माना जाता है. अब दोस्तों इतना समझ गए तो चलिए असली कहानी शुरू करते हैं.
क्या नेचुरल गैस से अलग होती है पीएनजी?
आपको बता दें कि पीएनजी कोई अलग गैस नहीं है बल्कि वही नेचुरल गैस है जो पाइपलाइन के जरिए सीधे आपके घर तक पहुंचती है. अब सवाल उठता है नेचुरल गैस बनती कैसे है? आपको बता दें कि नेचुरल गैस भी एक फॉसिल फ्यूल है. जब किसी प्राकृतिक आपदा जैसे बाढ़, ज्वालामुखी या भूकंप के कारण यह जीव-जंतु और पौधे मिट्टी के नीचे दब जाते है. समय के साथ इन पर मिट्टी और पत्थरों की मोटी परतें जमती चली जाती है. ऑक्सीजन की कमी और लगातार बढ़ते तापमान और प्रेशर के कारण यह धीरे-धीरे रासायनिक बदलाव से गुजरते हैं और आखिर में यही बदल जाते हैं नेचुरल गैस, क्रूड ऑयल और कोल में. नेचुरल गैस में सबसे ज्यादा मात्रा होती है मीथेन(Methane) की. यह गैस बहुत हल्की, साफ और जल्दी जलने वाली होती है. इसी वजह से इसे ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. कई बार समुद्र के नीचे भी ड्रिलिंग करनी पड़ती है. जब गैस का भंडार मिल जाता है, तो वहां पाइपलाइन लगाकर गैस को बाहर निकाला जाता है. जो गैस जमीन से निकलती है, वह सीधे इस्तेमाल के लायक नहीं होती. इसे कहा जाता है रॉ नेचुरल गैस(Raw Natural Gas). इसमें कई तरह की अशुद्धियां होती हैं. जैसे पानी की भाप, कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड और धूल के कण आदि.
अब अगर इस गैस को ऐसे ही इस्तेमाल किया जाए तो यह खतरनाक भी हो सकती है और मशीनों को नुकसान भी पहुंचा सकती है. इसलिए अगला स्टेप गैस प्रोसेसिंग का होता है. रॉ नेचुरल गैस को एक प्रोसेसिंग प्लांट में भेजा जाता है. यहां कई स्टेप्स में इसे साफ किया जाता है. सबसे पहले गैस से पानी की नमी हटाई जाती है क्योंकि नमी पाइप लाइन में जंग लगा सकती है. इसके बाद कार्बन डाइऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसे जहरीले तत्व निकाले जाते हैं.
हाइड्रोजन सल्फाइड खासतौर पर बहुत खतरनाक गैस होती है. इसके बाद गैस को और रिफाइन किया जाता है ताकि उसमें मुख्य रूप से सिर्फ मीथेन बच जाए. तब तक यह गैस काफी हद तक शुद्ध हो चुकी होती है. यही गैस आगे चलकर अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल होती है. अगर इसे हाई प्रेशर पर कंप्रेस किया जाए तो बनती है सीएनजी बन जाती है और अगर इसे पाइपलाइन के जरिए भेजा जाए तो बनती है पीएनजी. यानी गैस वही है बस इस्तेमाल करने का तरीका अलग है. पीएनजी का डिस्ट्रीब्यूशन यानी वितरण का पूरा सिस्टम एक बहुतबड़े नेटवर्क पर काम करता है जिसे कहा जाता है सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क.
पीएनजी आपके घर तक कैसे पहुंचती है?
इस नेटवर्क को भारत में कई कंपनियां संभालती हैं. जैसे इंद्रप्रस्था गैस लिमिटेड, महानगर गैस लिमिटेड और GAIL. अब समझते हैं यह पूरा सिस्टम कैसे काम करता है. सबसे पहले नेचुरल गैस को बड़े-बड़े ट्रांसमिशन पाइप लाइनों के जरिए अलग-अलग शहरों तक भेजा जाता है. यह पाइप लाइन सैकड़ों हजारों किलोमीटर लंबी होती हैं और जमीन के नीचे बिछी होती हैं. इनमें गैस हाई प्रेशर में रहती है. अब जब गैस शहर के पास पहुंचती है तो उसे सीधे घरों में नहीं भेजा जाता.
सबसे पहले यह गैस एक सिटी गेट स्टेशन यानी सीजीएस में जाती है. यहां गैस का प्रेशर कम किया जाता है क्योंकि घरों में हाई प्रेशर गैस भेजना बहुत खतरनाक हो सकता है. इसके बाद गैस छोटे-छोटे पाइपलाइनों के नेटवर्क में भेजी जाती है. अब यह गैस धीरे-धीरे हर कॉलोनी, हर गली और हर घर तक पहुंचने लगती है. अब आपके घर की बारी आती है. जब पीएनजी कनेक्शन लिया जाता है तो आपके घर तक एक पतली पाइपलाइन लाई जाती है. घर के बाहर एक मीटर लगाया जाता है. ठीक वैसे ही जैसे बिजली का मीटर होता है. यह मीटर मापता है कि आपने कितनी गैस इस्तेमाल की. इसके बाद गैस सीधे आपके किचन में लगे चूल्हे तक पहुंचती है.
पीएनजी के फायदे
सबसे बड़ा फायदा है सुविधा यानी इसमें ना सिलेंडर खत्म होने का डर ना बुकिंग की झंझट होता है. दूसरा यह लगातार सप्लाई देता है. तीसरा यह साफ ईंधन है जिससे कम प्रदूषण होता है और चौथा लंबे समय में यह किफायती भी पड़ता है. लेकिन, पीएनजी हर जगह उपलब्ध नहीं है. इंस्टॉलेशन का शुरुआती खर्च हो सकता है और अगर कभी पाइपलाइन में दिक्कत आए तो सप्लाई रुक भी सकती है. इसमें कई तरह के सेफ्टी सिस्टम होते हैं. जैसे प्रेशर कंट्रोल, ऑटोमेटिक कट ऑफ और लीकेज डिटेक्शन.





