पटना. बीते 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हवाई हमले शुरू किए. ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ के तहत सैकड़ों सैन्य ठिकानों. परमाणु सुविधाओं और मिसाइल प्लांटों को निशाना बनाया गया, और इन हमलों में सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत कई उच्च अधिकारी मारे गए. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे “ईरानी शासन को खत्म करने” का अभियान बताया और ईरानी जनता से विद्रोह करने की अपील की. वहीं, दूसरी ओर से ईरान ने भी तुरंत जवाब दिया. इजरायल के तेल अवीव, हाइफा और जेरूसलम समेत कई शहरों पर मिसाइल और ड्रोन दागे. अमेरिका के क्षेत्रीय सैन्य बेस पर हमले किए, जिसमें बहरीन. कतर और यूएई शामिल हैं. इसी बीच ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने की घोषणा की जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है.
जानकारों की नजर में वर्तमान स्थिति यह है कि पश्चिम एशिया इस समय बारूद के ढेर पर बैठा है, और अब ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर है. इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हवाई हमलों ने ईरान के परमाणु केंद्रों को हिला दिया है, तो वहीं ईरान ने ‘होर्मुज जलसंधि’ (Strait of Hormuz) को बंद कर वैश्विक अर्थव्यवस्था की सांसें अटका दी हैं. ऐसे में ईरान की युद्ध नीति को देखते हुए 21वीं सदी के इस आधुनिक महायुद्ध की हर चाल आचार्य चाणक्य के 2300 साल पुराने ‘षड्गुण्य सिद्धांत’ (Six-fold Policy) यानी छह सूत्रीय नीति के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है. आइए इसे विस्तार से जानते हैं.
संधि और विग्रह: युद्ध और शांति का द्वंद्व
आचार्य चाणक्य के पहले दो सूत्र ‘संधि’ (Peace Treaty) और ‘विग्रह’ (War) इस समय साथ-साथ चल रहे हैं. चाणक्य का पहला सिद्धांत है ‘संधि’ (शांति समझौता) और दूसरा है ‘विग्रह’ (युद्ध). वर्तमान स्थिति में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सामने 15 सूत्रीय शांति प्रस्ताव रखा. यह चाणक्य की ‘संधि’ नीति का हिस्सा है, जहां एक शक्तिशाली राष्ट्र शत्रु को झुकने का सम्मानजनक अवसर देता है. हालांकि, ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानकर खारिज कर दिया, जिससे अब ‘विग्रह’ की स्थिति पैदा हो गई है. इजरायल द्वारा तेहरान के मिसाइल अड्डों पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक ‘विग्रह’ का सबसे क्रूर और प्रत्यक्ष उदाहरण है. आचार्य चाणक्य का मानना था कि जब शत्रु शक्तिशाली हो तो संधि करें, लेकिन जब वह कमजोर पड़े तो विग्रह (प्रहार) ही एकमात्र विकल्प है.
विग्रह: सीधी सैन्य कार्रवाई का प्रहार
दूसरा महत्वपूर्ण सूत्र है ‘विग्रह’ (War/Hostility). एक तरफ अमेरिका ने पाकिस्तान के माध्यम से ईरान को 15-सूत्रीय शांति प्रस्ताव भेजा, जो ‘संधि’ की कोशिश रही. वहीं दूसरी ओर, इजरायल द्वारा ईरान के मिसाइल ठिकानों पर लगातार की जा रही बमबारी ‘विग्रह’ का साक्षात रूप है. जब शत्रु को झुकाने के लिए सैन्य शक्ति का उपयोग अनिवार्य हो जाए, तब विग्रह अपनाया जाता है. इजरायल द्वारा ईरान के मिसाइल डिपो और आईआरजीसी (IRGC) के ठिकानों पर किए जा रहे सटीक हवाई हमले ‘विग्रह’ का ही आधुनिक स्वरूप हैं. चाणक्य का मानना था कि विग्रह तभी करना चाहिए जब आप शत्रु की तुलना में सामरिक रूप से श्रेष्ठ स्थिति में हों.
यान: युद्ध की तैयारी और घेराबंदी
तीसरा सूत्र है ‘यान’ (Expedition) यानी युद्ध की तैयारी या कूच है. फारस की खाड़ी और हिंद महासागर में अमेरिकी विमानवाहक पोतों और बी-52 बॉम्बर की तैनाती ‘यान’ का आधुनिक उदाहरण है. यह केवल हमला नहीं, बल्कि शत्रु के मनोबल को तोड़ने के लिए की गई सैन्य लामबंदी है. अमेरिका की यह ‘शक्ति प्रदर्शन’ की नीति ईरान को मनोवैज्ञानिक रूप से पीछे हटने पर मजबूर करने के लिए है.
आसन: तटस्थता का रणनीतिक खेल
चौथा सूत्र ‘आसन’ (Waiting/Neutrality) इस युद्ध में सबसे दिलचस्प मोड़ है. इसका अर्थ है उपेक्षा या सही समय की प्रतीक्षा, जो यहां प्रभावी है. कई खाड़ी देश, जो पारंपरिक रूप से अमेरिका के करीब रहे हैं, फिलहाल इस युद्ध में सीधे कूदने के बजाय ‘आसन’ यानी तटस्थता की मुद्रा में हैं. ईरान वर्तमान में होर्मुज जलसंधि को बंद कर ‘आसन’ की मुद्रा में है, वह वैश्विक अर्थव्यवस्था पर चोट कर दुनिया की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहा है. वह जानता है कि तेल की आपूर्ति रुकते ही दुनिया में हाहाकार मचेगा, जिसका असर रसोई गैस और पेट्रोल के दामों में दिखने लगा है. इसके साथ ही वे सही समय का इंतजार कर रहे हैं ताकि ऊंट किस करवट बैठता है, यह देखकर अपना अगला कदम उठा सकें. चाणक्य के अनुसार, जब लाभ न दिख रहा हो, तो चुपचाप बैठना ही श्रेष्ठ कूटनीति है.
संश्रय: गठबंधनों की ताकत
पांचवां सूत्र ‘संश्रय’ (Alliance) आज के दौर में सबसे महत्वपूर्ण है. इसका सीधा और साफ अर्थ यह है कि शक्तिशाली की शरण लेना. इस युद्ध में इसके दो उदारण भी साफ और स्पष्ट हैं. ईरान अब रूस और चीन की ओर देख रहा है ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों के खिलाफ उसे सुरक्षा मिल सके. वहीं इजरायल पूरी तरह अमेरिका के ‘संश्रय’ में रहकर इस युद्ध को निर्णायक मोड़ पर ले जाने की कोशिश कर रहा है. ऐसी ही स्थिति के लिए आचार्य चाणक्य ने कहा था कि कमजोर राजा को हमेशा एक शक्तिशाली राजा की शरण लेनी चाहिए ताकि वह अपनी सत्ता बचा सके.
द्वैधीभाव: दोहरी चालों का मायाजाल
छठा और अंतिम सूत्र है ‘द्वैधीभाव’ (Double-faced Policy) यानी दोहरी नीति. अमेरिका की रणनीति इस समय यही है. एक तरफ वह ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा रहा है और इजरायल को हथियारों की सप्लाई कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह पर्दे के पीछे से तेहरान के साथ बातचीत के दरवाजे भी खुले रखे हुए है. खास बात यह कि अमेरिका साथ-साथ अपनी सैन्य तैयारियों को भी आगे बढ़ा रहा है. दूसरी ओर ईरान एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मंच पर शांति की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर हिजबुल्ला और हूतियों (Houthis) के जरिए इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइलें दाग रहा है. साफ है कि ‘एक से दोस्ती, दूसरे से बैर’ या एक ही समय में युद्ध और शांति की बातें करना ही चाणक्य का द्वैधीभाव है.
शत्रु को तब तक न छेड़ें जब तक…
आचार्य चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य की रक्षा और विस्तार के लिए छह नीतियों का वर्णन किया था, जो आज वर्तमान आधुनिक युद्ध में ईरान की ‘हठधर्मी’ और अमेरिका की ‘आक्रामक शांति नीति’ के बीच सटीक बैठती हैं. शास्त्रों के अनुसार, आचार्य चाणक्य कहते थे कि “शत्रु को तब तक न छेड़ें जब तक आप उसे पूरी तरह नष्ट करने में सक्षम न हों.” अब जब अमेरिका ने ईरान को 6 अप्रैल तक का समय दिया है, तो ऐसा लगता है कि अमेरिका ने कुछ तो गलती जरूर की है जिसके कारण वह फिलहाल बैकफुट पर दिख रहा है.
यदि ईरान ने अपना रुख नहीं बदला?
वहीं, आचार्य चाणक्य की कूटनीति के अनुसार यहां से वो दुरुह काल आता हुआ प्रतीत हो रहा है जब ‘संधि’ से ‘महायुद्ध’ की ओर बढ़ने का संक्रमण हो सकता है. जानकार भी कहते हैं कि यदि ईरान ने अपना रुख नहीं बदला, तो आने वाले दिन न केवल पश्चिम एशिया, बल्कि बिहार जैसे राज्यों के लिए भी आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं. ऐसे में सवाल यह कि क्या 6 अप्रैल तक दी गई ट्रंप की मोहलत किसी स्थायी शांति की ओर ले जाएगी, या आचार्य चाणक्य के इन छह सूत्रों के बीच फंसा यह संघर्ष तीसरे विश्व युद्ध की चिंगारी बनेगा? पूरी दुनिया की नजरें अब तेहरान के अगले कदम पर टिकी हैं.





