यामातो क्यों बनाया गया?
1930 के दशक में जापान चाहता था कि उसकी नौसेना अमेरिका और ब्रिटेन की बराबरी कर सके. उस समय जापान को लगता था कि यदि उसके पास दुनिया के सबसे बड़े और सबसे शक्तिशाली युद्धपोत होंगे, तो वह प्रशांत महासागर में अपना दबदबा बना सकेगा.
इसी सोच के तहत यामातो श्रेणी (Yamato Class) के युद्धपोत बनाए गए. इनमें यामातो और उसका जुड़वां जहाज मुसाशी (Musashi) सबसे प्रसिद्ध रहे. इन जहाजों का निर्माण बेहद गोपनीय तरीके से किया गया था ताकि अमेरिका को इसकी जानकारी न मिल सके.
कितना बड़ा था यामातो?
यामातो अपने समय का सबसे विशाल युद्धपोत था. लंबाई लगभग 263 मीटर (863 फीट). पूरी तरह लोड होने पर वजन लगभग 72,000 टन. अधिकतम गति करीब 27 नॉट (लगभग 50 किमी प्रति घंटा). लगभग 2,500 से 3,000 नौसैनिक इसमें तैनात रह सकते थे.
Source: Imperial Japanese Navy Photograph Archive
इसकी सबसे बड़ी ताकत
यामातो की सबसे बड़ी पहचान उसकी विशाल तोपें थीं. इसमें 18.1 इंच (460 मिमी) की 9 मुख्य तोपें लगी थीं. उस समय किसी भी युद्धपोत पर इतनी बड़ी नौसैनिक तोपें नहीं थीं. एक गोला 1.4 टन से अधिक वजन का होता था और कई दर्जन किलोमीटर दूर तक मार कर सकता था. जहाज पर मजबूत स्टील का कवच लगाया गया था ताकि दुश्मन के बड़े गोले भी इसे आसानी से नुकसान न पहुंचा सकें.
लेकिन एक बड़ी कमजोरी भी थी
यामातो को तोपों से होने वाले हमलों को ध्यान में रखकर बनाया गया था, लेकिन युद्ध के दौरान लड़ाई का तरीका बदल चुका था. अब युद्धपोतों की जगह विमानवाहक पोत (Aircraft Carrier) और लड़ाकू विमान ज्यादा प्रभावी साबित हो रहे थे. ऊपर से हमला करने वाले विमानों के सामने यामातो जैसी बड़ी जहाजें आसान निशाना बन गईं. इसके अलावा जहाज की टॉरपीडो सुरक्षा भी उतनी मजबूत नहीं थी जितनी जापान ने सोची थी.
युद्ध में क्या भूमिका रही?
यामातो फरवरी 1942 में जापानी नौसेना में शामिल हुआ. इसे संयुक्त बेड़े (Combined Fleet) का प्रमुख जहाज बनाया गया. हालांकि, यह कई बड़े अभियानों में मौजूद रहा, लेकिन बहुत कम अवसरों पर सीधे युद्ध में शामिल हुआ. लंबे समय तक इसे ट्रुक (Truk) नौसैनिक अड्डे पर रखा गया, जिसके कारण इसे मजाक में “होटल यामातो” भी कहा जाने लगा.
मुसाशी का अंत
यामातो का जुड़वां जहाज मुसाशी अक्टूबर 1944 में लेयटे की लड़ाई (Battle of Leyte Gulf) के दौरान अमेरिकी विमानों के लगातार बम और टॉरपीडो हमलों का शिकार हो गया. कई दर्जन बम और टॉरपीडो लगने के बाद मुसाशी समुद्र में डूब गया. इस घटना ने साबित कर दिया कि दुनिया के सबसे बड़े युद्धपोत भी आधुनिक हवाई हमलों के सामने टिक नहीं सकते.
अंतिम मिशन: ऑपरेशन टेन-गो
1945 तक जापान लगभग हार की स्थिति में पहुंच चुका था. अमेरिका ने ओकिनावा पर हमला शुरू कर दिया था. जापान ने अंतिम प्रयास के रूप में ऑपरेशन टेन-गो (Operation Ten-Go) शुरू किया. योजना यह थी कि यामातो ओकिनावा पहुंचे, समुद्र तट पर खुद को फंसा दे और अपनी सारी गोलाबारी खत्म होने तक अमेरिकी सेना पर हमला करता रहे. इसके बाद जहाज के सैनिक जमीन पर उतरकर लड़ाई जारी रखते.
इस मिशन की सबसे बड़ी बात यह थी कि यामातो के पास वापस लौटने लायक ईंधन भी नहीं था. यानी यह लगभग आत्मघाती मिशन था.
कैसे डूबा यामातो?
7 अप्रैल 1945 को अमेरिकी पनडुब्बियों और टोही विमानों ने यामातो के बेड़े को खोज लिया. इसके बाद अमेरिकी विमानवाहक पोतों से सैकड़ों लड़ाकू विमान उड़ाए गए.
लगातार बम और टॉरपीडो हमलों ने यामातो को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया. जहाज एक तरफ झुकने लगा, उसके इंजन और संचार प्रणाली बंद होने लगी. आखिरकार दोपहर करीब 2:40 बजे यामातो पलट गया और उसके गोला-बारूद में भीषण विस्फोट हुआ. यह विस्फोट इतना बड़ा था कि धुएं का गुबार 100 मील से भी अधिक दूरी से दिखाई दिया.
कितने लोग मारे गए?
यामातो पर मौजूद लगभग 2,500 सैनिकों में से केवल 269 लोग ही बच पाए. जहाज के कमांडर और वरिष्ठ अधिकारियों ने जहाज के साथ ही डूबना चुना.
इस पूरे अभियान में जापान के लगभग 3,665 सैनिक मारे गए, जबकि अमेरिका के केवल 10 विमान और 12 सैनिक खोए.
इतिहास में यामातो की विरासत
यामातो आज भी दुनिया के सबसे प्रसिद्ध युद्धपोतों में गिना जाता है. यह जापान की तकनीकी क्षमता और उस दौर की सैन्य सोच का प्रतीक था. लेकिन इसका अंत यह भी सिखाता है कि केवल विशाल हथियार होने से युद्ध नहीं जीता जा सकता.
द्वितीय विश्व युद्ध ने साबित कर दिया कि भविष्य की नौसैनिक शक्ति बड़े युद्धपोतों में नहीं, बल्कि विमानवाहक पोतों, लड़ाकू विमानों और आधुनिक तकनीक में छिपी थी. यामातो का डूबना इसी बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है.




