US-India Trade: ‘भारत हमारे रडार पर’, व्हाइट हाउस की 40 देशों की लिस्ट के बाद बोले पीटर नवारो; क्या है वजह


US-India Trade: अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील को लेकर बातचीत चल रही है, लेकिन इसी बीच वॉशिंगटन से आई एक रिपोर्ट ने मामला थोड़ा और पेचीदा कर दिया है. व्हाइट हाउस की नई रिपोर्ट में भारत को उन 40 से ज्यादा देशों में शामिल किया गया है, जिन्हें अमेरिका चीनी सामान की ‘ट्रांसशिपमेंट’ के लिहाज से जोखिम वाला मानता है. यानी अमेरिकी चिंता यह है कि कहीं चीन का माल किसी तीसरे देश के रास्ते अमेरिकी बाजार में कम टैरिफ के साथ तो नहीं पहुंच रहा. रिपोर्ट आने के बाद व्हाइट हाउस के वरिष्ठ व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भारत का नाम भी सीधे लिया. उन्होंने कहा, ‘भारत हमारे रडार पर है.’ यह बयान ऐसे वक्त आया है, जब भारत-अमेरिका के बीच पारस्परिक टैरिफ समझौते पर बातचीत चल रही है. ऐसे में यह सिर्फ बयान नहीं, बल्कि बातचीत की मेज पर दबाव बढ़ाने वाला संकेत भी माना जा सकता है.

व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में भारत को सबसे ज्यादा जोखिम वाली पहली कैटेगरी यानी Tier-1 में रखा गया है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका ने भारत सरकार पर चीनी सामान की तस्करी या टैरिफ चोरी में शामिल होने का सीधा आरोप लगाया है. रिपोर्ट का फोकस उन देशों पर है, जहां अमेरिकी अधिकारियों को लगता है कि चीनी सामान तीसरे देश के रास्ते अमेरिका पहुंच सकता है. भारत के साथ कनाडा, यूरोपीय संघ, इजरायल, जापान, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया और ताइवान भी इसी कैटेगरी में हैं. लेकिन नवारो का भारत का नाम लेकर चेतावनी देना बताता है कि नई दिल्ली को इस मुद्दे पर वॉशिंगटन की नजर से गुजरना होगा.

पीटर नवारो ने भारत को लेकर क्या कहा?

  • व्हाइट हाउस की रिपोर्ट जारी होने के बाद पीटर नवारो ने कहा, ‘यह उन 40 से अधिक देशों के बारे में है जो ट्रांसशिपिंग को सक्षम बना रहे हैं और जैसे-जैसे हम दूसरे देशों पर अधिक टैरिफ लगाते हैं, भारत, वियतनाम और आगे चलकर अन्य देश भी इस ट्रांसशिपमेंट की कोशिश करेंगे.’
  • नवारो ने आगे कहा, ‘कम भुगतान करने का तरीका धोखा देना नहीं है; तरीका यह है कि डंपिंग बंद करें, बौद्धिक संपदा का सम्मान करें, अमेरिकी वस्तुओं के लिए अपनी बाधाएं कम करें और पारस्परिकता की दिशा में आगे बढ़ें.’ उन्होंने चेतावनी देते हुए यह भी कहा, ‘अमेरिकी बाजार तक पहुंच किसी और के निर्यात को वैध दिखाने का लाइसेंस नहीं है.’

भारत को Tier-1 में क्यों रखा गया?

अमेरिकी रिपोर्ट में 40 से ज्यादा देशों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है. Tier-1 में भारत के साथ कनाडा, यूरोपीय संघ, इजरायल, जापान, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया और ताइवान शामिल हैं. अमेरिका के मुताबिक ये बड़े और विविध औद्योगिक बाजार हैं, जहां वैध व्यापार के बीच ट्रांसशिपमेंट का जोखिम भी मौजूद हो सकता है. दूसरी कैटेगरी में ब्राजील, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, तुर्की और वियतनाम हैं. तीसरी कैटेगरी में बांग्लादेश, कंबोडिया, फिलीपींस, सिंगापुर, श्रीलंका और यूएई जैसे देश हैं. यहां यह समझना जरूरी है कि किसी देश का सूची में होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वहां की सरकार चीनी सामान को अमेरिकी टैरिफ से बचाने में मदद कर रही है.

आखिर Chinese Transshipment क्या है?

ट्रांसशिपमेंट का सामान्य मतलब है कि कोई सामान अपने मूल देश से निकलने के बाद किसी तीसरे देश के रास्ते अंतिम बाजार तक पहुंचे. यह अपने आप में गैरकानूनी नहीं है. आज की ग्लोबल सप्लाई चेन में एक उत्पाद के हिस्से कई देशों से गुजर सकते हैं. अमेरिका की आपत्ति तब है, जब चीनी सामान को तीसरे देश में केवल मामूली बदलाव या री-लेबलिंग के बाद उस देश का उत्पाद बताकर अमेरिका भेजा जाए. रिपोर्ट में ऐसे मामलों का उदाहरण भी दिया गया है. इसमें वियतनाम में चीनी इलेक्ट्रिक मोटर्स को रीक्लाइनर में फिट करने का उल्लेख है. अमेरिका ने ‘स्क्रूड्राइवर फैक्ट्रियों’ का भी जिक्र किया, जहां दूसरे देशों से आए पुर्जों की सीमित असेंबली के बाद उत्पाद को नए देश का सामान बताया जा सकता है.

अमेरिका अब AI से पकड़ेगा ऐसा माल

वॉशिंगटन ने ऐसे मामलों पर कार्रवाई और सख्त करने की तैयारी की है. रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन यानी CBP की शक्तियां बढ़ाने के लिए एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर की दिशा में काम कर रहा है. इसके अलावा AI आधारित निगरानी व्यवस्था तैयार की जा रही है, जिसे ‘डिटेक्टिव बॉर्डर’ कहा गया है.

इसका मकसद अमेरिकी बंदरगाहों तक पहुंचने से पहले ऐसे शिपमेंट की पहचान करना है, जिनमें ट्रांसशिपमेंट का जोखिम ज्यादा हो. अमेरिका नए व्यापार समझौतों में भी एंटी-ट्रांसशिपमेंट प्रावधान शामिल करने की तैयारी में है. यानी आने वाले समय में यह मुद्दा सिर्फ कस्टम्स जांच तक सीमित नहीं रह सकता.

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर क्या होगा असर?

  • यह रिपोर्ट ऐसे वक्त आई है जब भारत और अमेरिका के बीच पारस्परिक टैरिफ समझौते को लेकर बातचीत चल रही है. ऐसे में चीन के सामान के संभावित ट्रांसशिपमेंट का मुद्दा बातचीत में एक और पेचीदा विषय जोड़ सकता है. अमेरिका पहले ही भारत के व्यापार और रूस के साथ उसके ऊर्जा संबंधों को लेकर सवाल उठाता रहा है.
  • सबसे अहम बात यह है कि भविष्य में होने वाली किसी भारत-अमेरिका ट्रेड डील में ऐसे प्रावधान शामिल हो सकते हैं. अमेरिकी प्रस्ताव के मुताबिक अगर किसी शिपमेंट को बाद में ट्रांसशिपमेंट के जरिए भेजा गया पाया गया तो CBP सिर्फ उसी खेप पर नहीं, बल्कि कंपनी के पिछले एक साल तक के शिपमेंट पर भी टैरिफ की मांग कर सकता है.

भारत के लिए क्यों बढ़ी चुनौती?

भारत को लेकर अमेरिकी चिंता का मतलब फिलहाल किसी अपराध का आरोप नहीं है. लेकिन पीटर नवारो का बयान बताता है कि नई दिल्ली अब अमेरिकी ट्रेड पॉलिसी की निगरानी सूची में है. अमेरिका ने वियतनाम, कंबोडिया, मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस को प्रमुख ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में भी चिन्हित किया है. ऐसे में भारत के लिए चुनौती दोहरी है. एक तरफ उसे अमेरिका के साथ ट्रेड डील आगे बढ़ानी है, दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करना होगा कि भारतीय कंपनियों पर चीनी सामान को री-रूट करने या गलत तरीके से मूल देश बदलने के आरोप न लगें. इसलिए ‘भारत हमारे रडार पर’ वाला नवारो का बयान आने वाले दिनों में दोनों देशों की व्यापार वार्ता के लिए काफी मायने रख सकता है.



Source link

Latest articles

spot_imgspot_img

Related articles

spot_imgspot_img