Trump North Korea Mission Flop : ‘सनकी तानाशाह’ हो गया कई गुना पावरफुल, 5 वजहों धरे रह जाएंगे ट्रंप के सपने, दोस्त को धोखा देना जाएगा बेकार!


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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन को रिझाने और खुद को बड़ा ‘डीलमेकर’ साबित करने की फिर से कोशिश कर रहे हैं. हालांकि, रणनीतिक एक्सपर्ट्स का मानना है कि किम जोंग उन अब 2019 वाले दौर में नहीं हैं और वे ट्रंप के किसी दांव में नहीं फंसेंगे. बीते सालों में उत्तर कोरिया ने अमेरिका तक मार करने वाली मिसाइलें और परमाणु ताकत बढ़ाई है. साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध के जरिए रूस से आधुनिक तकनीक व जंग का अनुभव हासिल किया है. ऐसी 5 बड़ी वजहें हैं, जिनके चलते आज का मजबूत उत्तर कोरिया ट्रंप के किसी भी झांसे में नहीं फंसेगा.

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ट्रंप की बातों में नहीं आएंगे किम जोंग उन

प्योंगयांग: अमेरिकी राजनीति में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से बड़ी-बड़ी बातें, दिखावे की कूटनीति और खुद को एक महान ‘डीलमेकर’ की तरह पेश करने की रणनीति शुरू कर दी है. इस बार वो ये सारे तिकड़म उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन को रिझाने के लिए भिड़ा रहे हैं. इस चक्कर में ट्रंप ने अपने ही सहयोगी दक्षिण कोरिया को अधर में छोड़ दिया है, एक तरह से उस दोस्त की पीठ में छुरा भोंक दिया है जो खुद का डिफेंस भी ठीक से नहीं कर सकता. हालांकि, किम जोंग उन इतने कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं कि ट्रंप के इस दांव में फंस जाएं. ऐसी 5 बड़ी वजहें हैं जो अमेरिका के इस पूरे प्लान पर पानी फेर सकती हैं.

5 वजहों से ट्रंप की बातों में नहीं आएंगे किम जोंग उन

रणनीतिक मामलों के जाने-माने एक्सपर्ट डॉ ब्रह्म चेलानी के मुताबिक, किम जोंग उन आज उस स्थिति में बिल्कुल नहीं हैं जहां वो 2019 में हनोई समिट के दौरान थे. बीते कुछ सालों में ‘सनकी तानाशाह’ कहे जाने वाले किम ने अपनी ताकत इतनी बढ़ा ली है कि अब उन्हें ट्रंप के किसी भी ‘दावे’ में फंसने की कोई जरूरत ही नहीं बची है.

  1. परमाणु और मिसाइल का खतरनाक विस्तार : साल 2019 में जब हनोई में ट्रंप और किम जोंग उन की मुलाकात बिना किसी नतीजे के खत्म हुई थी, तब उत्तर कोरिया पर पाबंदियों से छूट पाने का काफी दबाव था. लेकिन पिछले 5-6 सालों में किम ने बातचीत का रास्ता छोड़कर केवल अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने पर ध्यान दिया. आज उत्तर कोरिया के पास ऐसी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBMs) और परमाणु हथियार मौजूद हैं जो सीधे अमेरिका के मेनलैंड तक हमला कर सकते हैं. जब किम के पास खुद को बचाने के लिए एक बहुत मजबूत और आक्रामक ‘न्यूक्लियर डिटर्जेंट’ तैयार हो चुका है, तो वो अमेरिका के सामने किसी समझौते के लिए हाथ फैलाने या झुकने का रिस्क क्यों लेंगे?
  2. रूस-यूक्रेन युद्ध से मिला जंग का अनुभव : किम जोंग उन की ताकत में सबसे बड़ा उछाल रूस और यूक्रेन के बीच चल रही जंग से आया है. उत्तर कोरिया ने न केवल रूस को लाखों की संख्या में तोप के गोले और मिसाइलें दीं, बल्कि अपने हजारों सैनिकों को रूस की तरफ से लड़ने के लिए जंग के मैदान में भी उतारा. इस कदम से उत्तर कोरिया को दो बहुत बड़े फायदे हुए. पहला- उत्तर कोरियाई सेना को आधुनिक युद्ध लड़ने का सीधा अनुभव मिल गया, जो दशकों से उसके पास नहीं था. दूसरा- बदले में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने उत्तर कोरिया को आधुनिक सैन्य तकनीक, उपग्रह और मिसाइल टेक्नोलॉजी मुहैया कराई है. इस नए और मजबूत गठबंधन ने किम को पूरी तरह से निडर बना दिया है.
  3. चीन के साथ सुधरते रिश्ते : एक वक्त था जब उत्तर कोरिया के लगातार मिसाइल परीक्षणों और परमाणु बयानों से उसका सबसे बड़ा मददगार देश चीन भी चिढ़ने लगा था. बीजिंग और प्योंगयांग के रिश्तों में अच्छी-खासी कड़वाहट आ गई थी. हालांकि, अब बदले हुए वैश्विक समीकरणों में चीन और उत्तर कोरिया के रिश्ते एक बार फिर बेहद मजबूत और सामान्य हो चुके हैं. चीन को अच्छी तरह पता है कि अमेरिका को घेरने के लिए उत्तर कोरिया उसका सबसे बड़ा मोहरा है. जब किम के सिर पर चीन जैसी महाशक्ति का हाथ है और रूस जैसा नया जिगरी दोस्त साथ खड़ा है तो उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति के किसी भी लालच या धमकी का कोई डर नहीं रह गया है.
  4. पाबंदियों के बावजूद पटरी पर लौटती अर्थव्यवस्था : अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र ने उत्तर कोरिया की कमर तोड़ने के लिए उस पर दुनिया के सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं. 2019 में किम का झुकाव बातचीत की तरफ इसीलिए था क्योंकि वो इन पाबंदियों से थोड़ी ढील चाहते थे. हालांकि, अब तस्वीर बदल चुकी है. कड़े प्रतिबंधों के बावजूद उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था में सुधार देखने को मिल रहा है. रूस के साथ हुए सैन्य और व्यापारिक समझौतों, चीन से मिलने वाली गुप्त मदद और अवैध साइबर हैकिंग/क्रिप्टो चोरी के जरिए उत्तर कोरिया के पास पैसों और संसाधनों की कमी नहीं हो रही है. जब अर्थव्यवस्था बिना अमेरिकी मेहरबानी के ठीक चल रही है, तो किम को ट्रंप के किसी झांसे में आने की कोई मजबूरी नजर नहीं आती.
  5. खाली वादे और छलावे वाली कूटनीति का अनुभव : किम जोंग उन अपने पिछले अनुभव से ये अच्छी तरह समझ चुके हैं कि डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीति अक्सर सिर्फ ‘हेडलाइंस’ बटोरने और दिखावे तक सीमित रहती है. ट्रंप का तरीका ये रहा है कि वो बड़ी-बड़ी घोषणाएं करते हैं, जैसे उन्होंने हाल ही में अमेरिका-दक्षिण कोरिया सैन्य अभ्यास को रोकने या छोटा करने का ड्रामा किया, लेकिन जमीन पर अमेरिकी नीतियां वही पुरानी बनी रहती हैं. किम ये देख चुके हैं कि ट्रंप अपने ही बयानों से पलट जाते हैं या अमेरिकी प्रशासन उनकी घोषणाओं के बावजूद अपने सैन्य अभियान जारी रखता है. इस खाली बड़बोलेपन को किम अब बहुत अच्छी तरह भांप चुके हैं, इसलिए वो किसी भी तरह की दिखावटी बातचीत में अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहते.



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