Trump Attack On US: ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में कमर्शियल जहाजों पर हमला किया और अमेरिका ने जवाब में 80 से ज्यादा सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें बरसाने का दावा किया. पहली नजर में यह सीजफायर तोड़ने पर अमेरिका की सीधी सैन्य प्रतिक्रिया लगती है. लेकिन मेरी राय में इस कहानी का एक राजनीतिक पहलू भी है, जिस पर ध्यान देना चाहिए. डोनाल्ड ट्रंप ने जून में जिस सीजफायर और समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत बताया था, वही समझौता कुछ ही दिनों बाद उनके लिए राजनीतिक बोझ बन गया. उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के कई बड़े नेताओं ने सवाल उठाया कि आखिर अमेरिका ने ईरान को इतना कुछ क्यों दिया.
डील के तहत अमेरिका ने होर्मुज से नेवल ब्लॉकेड हटाने और ईरानी तेल पर अस्थायी राहत देने जैसी रियायतें दीं. बदले में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने का वादा किया. लेकिन इस डील के आलोचकों का कहना था कि ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल क्षमता या प्रॉक्सी नेटवर्क पर कोई ठोस एक्शन लेने का वादा नहीं किया है. इसने ही ट्रंप के लिए मुश्किल पैदा कर दी. टॉम कॉटन, रोजर विकर, बिल कैसिडी, जॉन कॉर्निन और टेड क्रूज जैसे रिपब्लिकन नेताओं ने अलग-अलग शब्दों में इस समझौते पर सवाल उठाए. कुछ ने इसे अमेरिका की कमजोर सौदेबाजी बताया तो कुछ ने इसे अमेरिकी विदेश नीति का ब्लंडर कहा. वहीं कुछ ने कहा कि ईरान को बिना पर्याप्त कीमत चुकाए बड़ी राहत मिल गई.
ट्रंप ने अचानक हमला करने का मन क्यों बना लिया?
फिर 6-7 जुलाई को ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में 3 कॉमर्शियल जहाजों पर हमला कर दिया. इससे ट्रंप को सिर्फ सैन्य जवाब देने का कारण ही नहीं मिला, बल्कि राजनीतिक तौर पर भी अपनी छवि बदलने का मौका मिल गया. मेरी राय में यहीं से पूरी तस्वीर बदलती है. अगर ट्रंप सिर्फ कूटनीतिक रास्ते पर चलते रहते, तो विपक्ष के साथ-साथ उनकी अपनी पार्टी के आलोचक भी उन्हें ‘ईरान के सामने झुकने वाला राष्ट्रपति’ बताने की कोशिश करते. लेकिन बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई करके उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि अमेरिका समझौता कर सकता है, लेकिन चुनौती मिलने पर ताकत दिखाने से पीछे नहीं हटेगा.
हमले की टाइमिंग भी देखनी चाहिए
इसका मतलब यह नहीं है कि हमला सिर्फ घरेलू राजनीति के लिए किया गया. आधिकारिक कारण अब भी वही है जो अमेरिका कह रहा है- ईरान ने जहाजों पर हमला करके समझौते का उल्लंघन किया और अमेरिका ने जवाब दिया. लेकिन मेरी राय में ट्रंप ने इस मौके का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक साख मजबूत करने के लिए भी किया. इस राय को कुछ और बातें भी मजबूती देती हैं. ट्रंप ने यह ऑपरेशन नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान अपने शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों के साथ मीटिंग के बाद मंजूर किया. इसके तुरंत बाद उन्होंने सीजफायर को ‘खत्म’ घोषित किया और बेहद सख्त बयान दिए. यह सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि राजनीतिक संदेश भी था.
हमला करके भी फंस गए ट्रंप!
एक तरफ उन्होंने ईरान को सैन्य जवाब देकर अपनी सख्त छवि दिखाने की कोशिश की, तो दूसरी तरफ अब नए सवाल उनके सामने खड़े हो गए हैं. डेमोक्रेट नेता और युद्ध विरोधी समूह आरोप लगा रहे हैं कि एक महीने से भी कम समय में सीजफायर को खत्म कर उन्होंने पूरे क्षेत्र को फिर युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है.
दिलचस्प बात यह है कि सवाल सिर्फ विपक्ष नहीं उठा रहा. डोनाल्ड ट्रंप की पूर्व सहयोगी और पूर्व रिपब्लिकन सांसद मार्जोरी टेलर ग्रीन ने भी उनकी ईरान नीति पर निशाना साधा है. ग्रीन ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमलों के बाद अमेरिका ने ईरान पर बमबारी की, जिससे तेल की कीमतें बढ़ने लगीं और शेयर बाजार में गिरावट आई. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि ट्रंप लगातार कहते रहे कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए, लेकिन अगर विवाद की जड़ होर्मुज जलडमरूमध्य और तेल आपूर्ति है, तो फिर परमाणु कार्यक्रम का इससे क्या संबंध है? ग्रीन ने इसकी तुलना 9/11 के बाद इराक युद्ध से पहले दिए गए उन तर्कों से की, जिनमें ‘विनाशकारी हथियारों’ का मुद्दा उठाया गया था. उनका कहना था कि रिपब्लिकन पार्टी से लोगों ने ऐसी विदेश नीति खत्म होने की उम्मीद की थी. उधर, डेमोक्रेट नेता भी कांग्रेस से इस सैन्य कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं.
Iran bombed ships going through the Strait of Hormuz so Trump bombs Iran, and oil prices start rising again and the stock market goes down making buying opportunities ripe again.
Then Trump goes back to saying he bombed Iran because “Iran cannot have a nuclear weapon.”
Repeats…
— Former Congresswoman Marjorie Taylor Greene🇺🇸 (@FmrRepMTG) July 8, 2026




