नई दिल्ली: अमेरिका की ट्रंप सरकार ने समंदर की निगरानी करने वाले बडे प्रोजेक्ट को बंद करने का ऐलान किया है. इस सिस्टम का नाम ओशियन ऑब्जर्वेटरी इनिशिएटिव (OOI) है. यह प्रोजेक्ट पिछले दस साल से अटलांटिक और प्रशांत महासागर की पल-पल की जानकारी दे रहा था. इसमें लगभग 900 एडवांस सेंसर और अंडरवाटर ग्लाइडर लगे हुए हैं. यह पूरा सिस्टम समंदर के तापमान और खतरनाक लहरों पर नजर रखता है. नेशनल साइंस फाउंडेशन ने अचानक इस पूरे प्रोजेक्ट को रोकने का फैसला सुनाया है. अगले 15 महीनों में अलास्का और वाशिंगटन के तटों से इसके उपकरणों को हटा दिया जाएगा. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह फैसला बेहद खतरनाक साबित हो सकता है. इस समय दुनिया भर के समंदर रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का सामना कर रहे हैं. इसके साथ ही भयंकर अल नीनो का खतरा भी कांप रहा है. ऐसे में इस सिस्टम को बंद करना विनाशकारी हो सकता है.
समंदर की गहराई में काम करने वाला यह अनोखा सिस्टम आखिर क्या है?
ओशियन ऑब्जर्वेटरी इनिशिएटिव साल 2016 में शुरू हुआ था. इस पूरे प्रोजेक्ट की लागत लगभग 368 मिलियन डॉलर है. इस भारी-भरकम बजट को नेशनल साइंस फाउंडेशन ने फंड किया था. इस सिस्टम को समंदर की भयंकर स्थितियों को झेलने के लिए बनाया गया था.
- समंदर की गहराई में पानी का दबाव बहुत ज्यादा होता है. इसके साथ ही खारा पानी मशीनों को जल्दी खराब कर देता है. लेकिन यह सिस्टम इन सभी चुनौतियों से निपटने में सक्षम था. इसमें लगभग 900 एडवांस सेंसर लगाए गए थे.
- ये सेंसर रियल टाइम डेटा सीधे वैज्ञानिकों तक भेजते हैं. इसमें ऑटोमैटिक अंडरवाटर ग्लाइडर भी शामिल हैं. ये ग्लाइडर बिना किसी इंसानी मदद के समंदर में तैरते रहते हैं. वे पानी के अंदर होने वाले छोटे से छोटे बदलाव को भी रिकॉर्ड करते हैं.
इस पूरे नेटवर्क को तीस साल तक चलाने के लिए डिजाइन किया गया था. इसका मुख्य काम समंदर के तापमान और केमिस्ट्री पर नजर रखना था. यह सिस्टम समुद्री इकोसिस्टम में होने वाले बदलावों को भी ट्रैक करता था. इसके जरिए वैज्ञानिक मौसम में होने वाले बडे बदलावों को पहले ही समझ लेते थे. अब इस बेहतरीन सिस्टम को अचानक हटाने की तैयारी हो रही है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे रिसर्च वर्क पूरी तरह ठप हो जाएगा. समंदर के गहरे रहस्यों को समझने का यह इकलौता जरिया था. इसके बंद होने से भविष्य की पीढियों को डेटा नहीं मिल पाएगा.
भयंकर अल नीनो और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के बीच इसे क्यों हटाया जा रहा है?
नेशनल साइंस फाउंडेशन ने 21 मई को एक चौंकाने वाला बयान जारी किया था. उन्होंने कहा कि वे इस बड़े प्रोजेक्ट को छोटा करने जा रहे हैं. अगले 15 महीनों में समंदर से सारे उपकरण बाहर निकाल लिए जाएंगे. अलास्का और वाशिंगटन के समुद्री तटों से इन मशीनों को हटाया जाएगा. इसके अलावा नॉर्थ कैरोलिना और ग्रीनलैंड के पास से भी उपकरण हटाए जाएंगे.
फाउंडेशन के मीडिया हेड माइक इंग्लैंड ने इस फैसले का बचाव किया है. माइक इंग्लैंड ने कहा, ‘यह कदम नई टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया है.’ सरकार अब उभरती हुई साइंटिफिक प्राथमिकताओं पर ज्यादा ध्यान देना चाहती है. लेकिन वैज्ञानिक इस दलील से बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं.
दुनिया भर के महासागर इस समय सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं. समंदर का तापमान लगातार नए रिकॉर्ड तोड़ रहा है. इसके कारण बहुत तेज और विनाशकारी तूफान आ रहे हैं. ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से समुद्री जीवों का जीवन खतरे में पड़ गया है. इसके साथ ही एक बहुत ताकतवर अल नीनो का खतरा भी सामने आ रहा है.
अल नीनो के कारण पूरी दुनिया का मौसम पूरी तरह बदल जाता है. ऐसे नाजुक समय में निगरानी बंद करना किसी बडी आफत को न्योता देने जैसा है. ट्रंप प्रशासन पर यह भी आरोप लग रहे हैं कि वह क्लाइमेट साइंस को कमजोर करना चाहता है. वे समंदर में माइनिंग करने के लिए रास्ता साफ कर रहे हैं.
समंदर की वो कौन सी लहर है जिसके रुकने से दुनिया में मच सकती है तबाही?
- वैज्ञानिकों को सबसे बडी चिंता अटलांटिक महासागर की एक खास जलधारा को लेकर है. इसे अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन या एमोक कहा जाता है.
- यह जलधारा समंदर के अंदर बहने वाली एक बहुत बडी नदी की तरह है. यह पूरी दुनिया के तापमान और मौसम को कंट्रोल करने में मदद करती है.
- यह गर्म पानी को उत्तरी इलाकों की तरफ ले जाती है. वहां पानी ठंडा होकर नीचे बैठ जाता है और वापस दक्षिण की तरफ बहता है. इस पूरे सिस्टम को समंदर का सबसे बडा ग्लोबल वॉर्मिंग स्विच माना जाता है.
- नई रिसर्च से पता चला है कि यह सिस्टम अब कमजोर हो रहा है. वैज्ञानिकों को डर है कि यह जलधारा इसी सदी में पूरी तरह रुक सकती है. अगर ऐसा हुआ तो पूरी दुनिया में महाविनाश देखने को मिलेगा.
- अमेरिका के पूर्वी तट पर समुद्र का जलस्तर बहुत तेजी से बढने लगेगा. इसके कारण तटीय शहरों में भयानक बाढ आ जाएगी. यूरोप के देशों में रिकॉर्ड तोड कडाके की ठंड पडने लगेगी. वहीं अफ्रीका के कई बडे हिस्सों में सालों तक भयानक सूखा पडेगा.
ओशियन ऑब्जर्वेटरी इनिशिएटिव का डेटा इस जलधारा को समझने में बहुत मदद कर रहा था. अब इस सिस्टम के बंद होने से वैज्ञानिक बिल्कुल अंधेरे में आ जाएंगे. जर्मनी के पोट्सडैम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक स्टीफन रामस्टॉर्फ ने इस पर गहरी चिंता जताई है. स्टीफन रामस्टॉर्फ ने कहा, ‘समंदर में हो रहे बदलावों पर नजर रखना इस समय सबसे ज्यादा जरूरी है.’
लोकल मछुआरों और समुद्री व्यापार पर इस फैसले का क्या असर होने वाला है?
इस प्रोजेक्ट के बंद होने का सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर भी पडने वाला है.
- अमेरिका के प्रशांत उत्तर-पश्चिमी तट पर रहने वाले मछुआरे इस डेटा पर निर्भर हैं. वहां का कोस्टल एंड्योरेंस एरे लगातार पानी में ऑक्सीजन के लेवल को मापता है.
- यह डेटा डांजनेस केकडे की आबादी पर नजर रखने के लिए बहुत जरूरी है. अगर पानी में ऑक्सीजन कम होती है तो केकडों की मौत होने लगती है.
- मछुआरे इस डेटा को देखकर ही तय करते हैं कि उन्हें कब और कहां शिकार करना है. क्वीनॉल्ट इंडियन नेशन के आदिवासी मछुआरे भी इसी डेटा के सहारे अपनी आजीविका चलाते हैं.
- यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन की प्रोफेसर जैन न्यूटन इस सिस्टम की देखरेख करती हैं. उन्होंने बताया कि इस महीने के अंत तक 11 जरूरी उपकरण पानी से बाहर निकाल लिए जाएंगे. इसके बाद मछुआरों के पास समंदर की सटीक जानकारी पाने का कोई रास्ता नहीं बचेगा.
- यह सिस्टम सिर्फ मछलियों की जानकारी नहीं देता था. इसके बुए समंदर में चल रहे जहाजों को मौसम की सटीक चेतावनी भी देते थे. खतरनाक लहरों और तूफानों की जानकारी समय पर मिलने से नाविकों की जान बचती थी.
अब डेटा की कमी के कारण समुद्री व्यापार को भी बडा नुकसान हो सकता है. जहाजों के कैप्टन बिना किसी पूर्व चेतावनी के भयंकर तूफानों में फंस सकते हैं.
डोनाल्ड ट्रंप के इस हैरान करने वाले फैसले पर वैज्ञानिकों ने क्या कहा है?
वैज्ञानिक इस फैसले को लेकर ट्रंप सरकार पर बहुत ज्यादा नाराज हैं. बाइडेन सरकार के समय नेशनल ओशियनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के प्रमुख रहे रिक स्पिनरैड ने कहा, ‘यह फैसला पैसे की मामूली बचत के लिए बहुत बडा नुकसान करने जैसा है.’ यह सिस्टम देश को आर्थिक और सामाजिक रूप से बहुत बडा फायदा पहुंचा रहा था. तूफान की भविष्यवाणी से लेकर बाढ से बचाव तक में इसका बडा योगदान था.
वैज्ञानिकों का कहना है कि टैक्सपेयर्स के पैसों से जो सिस्टम बनकर तैयार हो चुका था उसे नष्ट करना समझदारी नहीं है.
ब्रिटेन की प्लाइमाउथ मरीन लेबोरेटरी की वैज्ञानिक हेलेन फिंडले ने भी इस पर चिंता जताई है. हेलेन फिंडले ने कहा, ‘समंदर लगातार बदल रहा है और उसमें बडे खतरे पैदा हो रहे हैं.’ कुछ नेताओं ने आरोप लगाया है कि ट्रंप सरकार फॉसिल फ्यूल कंपनियों को फायदा पहुंचाना चाहती है.
सीनेटर शेल्डन वाइटहाउस ने सोशल मीडिया पर लिखा कि फॉसिल फ्यूल समंदर को लगातार गर्म कर रहा है. इसलिए ट्रंप के लोग इस निगरानी को ही बंद कर देना चाहते हैं ताकि सच सामने न आ सके. व्हाइट हाउस की तरफ से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.
Fossil fuel is heating our oceans by the zettajoule, so Trump’s corrupt fossil fuel stooges want to turn off the monitors. Oil Capone. https://t.co/juDFjnWDtM




