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Dharohar Jalore Historical Places: अगर आप राजस्थान में इतिहास, धार्मिक आस्था और प्राकृतिक सुंदरता का अनूठा संगम देखना चाहते हैं, तो जालोर आपके लिए बेहतरीन डेस्टिनेशन साबित हो सकता है. यहां स्वर्णगिरि किले से लेकर सुंधा माता मंदिर, 72 जिनालय, भांडवपुर जैन तीर्थ, जहाज मंदिर, भाद्राजून फोर्ट, कोटकास्ता दुर्ग, श्री सिरे मंदिर और चामुंडा माता मंदिर जैसे कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल मौजूद हैं. इन जगहों की पौराणिक मान्यताएं, शानदार वास्तुकला और प्राकृतिक नजारे हर साल हजारों पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं.
जालोर दुर्ग, जिसे स्वर्णगिरि किला भी कहा जाता है, जालोर शहर के दक्षिण में सूकड़ी नदी के किनारे लगभग 1200 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है. करीब पौन किलोमीटर लंबा और आधा किलोमीटर चौड़ा यह किला अपनी मजबूत बनावट और रणनीतिक स्थिति के लिए प्रसिद्ध है. ऊंचाई पर स्थित होने के कारण इसे गिरि दुर्ग और चारों ओर मरुस्थल होने से धन्व दुर्ग की श्रेणी में रखा जाता है, जो इसकी ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ाता है.
सुंधा माताजी का मंदिर जालोर जिले के भीनमाल क्षेत्र के सुंधा पर्वत पर लगभग 850 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक प्राचीन आस्था स्थल है, जिसकी इतिहास करीब 900 वर्षों पुराना माना जाता है. ऊंची पहाड़ी पर विराजमान मां सुंधा की दिव्य प्रतिमा श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है. खास बात यह है कि यहां राजस्थान का पहला रोपवे भी स्थापित है, जिससे भक्तजन आसानी से मंदिर तक पहुंचकर दर्शन कर सकते हैं.
भांडवपुर जैन तीर्थ, जालोर जिले की सायला तहसील के भुंडवा गांव में स्थित एक अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक आस्था स्थल है. भगवान महावीर स्वामी को समर्पित इस मंदिर में स्थापित प्रतिमा लगभग 2300 वर्ष पुरानी मानी जाती है. यह तीर्थ 36 समुदायों की श्रद्धा का केंद्र है. मान्यता है कि पालजी संघ द्वारा ले जाई जा रही महावीर स्वामी की मूर्ति वाली बैलगाड़ी का पहिया यहीं टूट गया, जिसके बाद इसी स्थान पर इस भव्य मंदिर की स्थापना की गई.
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भीनमाल में स्थित 72 जिनालय, जिसे श्री लक्ष्मीवल्लभ पार्श्वनाथ तीर्थ के नाम से जाना जाता है, देश का सबसे बड़ा जैन मंदिर समूह माना जाता है। लगभग 100 बीघा क्षेत्र में फैले इस भव्य संगमरमर मंदिर में 72 जिनालय 24 वर्तमान, 24 भूतपूर्व और 24 भविष्य के तीर्थंकर सर्वतोभद्र श्रीयंत्र रेखा पर स्थापित हैं. यहां के मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ हैं और अद्भुत नक्काशी इसकी विशेष पहचान है, साथ ही विशाल धर्मशाला और भोजनालय जैसी आधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध हैं.
भाद्राजून फोर्ट, जालोर जिले का एक ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व वाला स्थल है, जो जालोर-जोधपुर मार्ग पर लगभग 54 किलोमीटर दूर स्थित है. यह किला अपनी मारवाड़ी वास्तुकला और महाभारत काल से जुड़ी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि इसी स्थान पर अर्जुन और सुभद्रा का विवाह हुआ था, जिससे इस क्षेत्र का नाम भाद्राजून पड़ा. इतिहास और आस्था का यह अनोखा संगम इसे खास बनाता है.
कोटकास्ता दुर्ग जालोर जिले के भीनमाल उपखंड से करीब 20 किलोमीटर और जालोर शहर से लगभग 65 किलोमीटर दूर पहाड़ियों पर स्थित एक ऐतिहासिक किला है. करीब 200-210 वर्ष पुराना यह दुर्ग अपनी रहस्यमयी कहानियों और अनोखी विरासत के लिए जाना जाता है, यहां हॉलीवुड फिल्म द वारियर्स की शूटिंग भी हो चुकी है. महाराजा मान सिंह के समय यह क्षेत्र नाथ संप्रदाय के भीमनाथ योगी को जागीर में दिया गया था, वहीं एक महिला के बलिदान और श्राप की लोककथा इस किले को और भी रहस्यमय बनाती है.
जालोर के मांडवला में स्थित जहाज मंदिर भारत का पहला नाव के आकार का अनोखा जैन मंदिर है, जो अपनी विशेष वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है. जालोर शहर से लगभग 15-18 किमी दूर बना यह मंदिर मकराना संगमरमर और शानदार कांच की कारीगरी से सुसज्जित है, जो इसे किसी भव्य जहाज जैसा रूप देता है. वर्ष 1993 में शिलान्यास और 1999 में पूर्ण हुए इस मंदिर को जैन संत श्री जिन कांति सागर सूरीश्वरजी महाराज के समाधि स्थल के रूप में भी विशेष पहचान प्राप्त है.
जालोर शहर की कन्यागिरी पहाड़ी पर स्थित श्री सिरे मंदिर नाथ संप्रदाय का एक प्रमुख और ऐतिहासिक तीर्थ स्थल है. इसका संबंध सिद्ध संत जालंधरनाथ जी की तपस्या और जोधपुर के महाराजा मानसिंह के संरक्षण से जुड़ा हुआ है. मान्यता है कि जालंधरनाथ जी ने यहां की भंवर गुफा में कठोर तपस्या की और इस स्थान को अपनी साधना से पवित्र बनाया, जिसके कारण यह मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है.
जालोर के आहोर तहसील में स्थित चामुंडा माता मंदिर लगभग 350-400 वर्ष पुराना एक सिद्ध आस्था स्थल है, जहां श्रद्धालुओं की गहरी आस्था जुड़ी हुई है. मान्यता है कि माता की मूर्ति डाकीनाडा तालाब से प्रकट हुई थी और खुदाई के दौरान फावड़े की चोट से उनकी गर्दन थोड़ी झुकी हुई है. लोककथाओं के अनुसार, ठाकुर अनारसिंह को स्वप्न में दर्शन देकर माता ने स्वयं प्रकट होने का संकेत दिया था. नवरात्रि के समय यहां भक्तों की विशेष भीड़ उमड़ती है.




