हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और चीन की तेजी से बढ़ रही समुद्री सैन्य शक्ति के बीच अमेरिका ने अपने पनडुब्बी बेड़े को मजबूत करने के लिए 76.6 अरब डॉलर (करीब 6.4 लाख करोड़ रुपये) के विशाल निवेश का फैसला किया है. इस राशि से अमेरिकी नौसेना 14 नई पनडुब्बियां खरीदेगी. यह कदम हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री वर्चस्व बनाए रखने की अमेरिकी रणनीति का अहम हिस्सा है. अमेरिकी नेवी ने इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के तहत जनरल डायनेमिक्स इलेक्ट्रिक बोट और हंटिंगटन इंगल्स इंडस्ट्रीज को बड़े डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट दिए हैं. इनमें लगभग 42 अरब डॉलर की लागत से 9 वर्जीनिया क्लास (Virginia-class) न्यूक्लियर अटैक पनडुब्बियां (SSN) तथा 29.5 अरब डॉलर की लागत से 5 कोलंबिया क्लास (Columbia-class) बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां (SSBN) बनाई जाएंगी. इसके अतिरिक्त करीब 5 अरब डॉलर जहाज निर्माण उद्योग की क्षमता बढ़ाने, कुशल मानव संसाधन विकसित करने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने पर खर्च किए जाएंगे.
ओहायो क्लास की जगह लेंगी कोलंबिया क्लास पनडुब्बियां
कोलंबिया क्लास पनडुब्बियां अमेरिका की पुरानी ओहायो क्लास परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों का स्थान लेंगी. ओहायो क्लास की 18 पनडुब्बियां वर्ष 1981 से 1997 के बीच अमेरिकी नौसेना में शामिल की गई थीं. नई योजना के तहत कुल 12 कोलंबिया क्लास पनडुब्बियां तैयार की जाएंगी, जो अमेरिका की समुद्र आधारित परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को 2080 के दशक तक बनाए रखेंगी. इन पनडुब्बियों में ट्राइडेंट-II D5 परमाणु बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात होंगी. ये अमेरिका के परमाणु त्रिकोण यानी न्यूक्लियर ट्रायड के समुद्री हिस्से की रीढ़ मानी जाती हैं और किसी भी परमाणु हमले की स्थिति में विश्वसनीय सेकेंड स्ट्राइक क्षमता सुनिश्चित करती हैं.
अमेरिका जितनी लागत में 14 पनडुब्बी खरीदेगा, भारत का तकरीबन उतना ही रक्षा बजट है. (फाइल फोटो/Reuters)
वर्जीनिया क्लास से बढ़ेगी समुद्री मारक क्षमता
दूसरी ओर, वर्जीनिया क्लास अटैक पनडुब्बियां अमेरिकी नेवी की पारंपरिक और रणनीतिक क्षमताओं को मजबूत करेंगी. इनका उपयोग लंबी दूरी तक सटीक हमले, खुफिया जानकारी जुटाने, विशेष अभियान संचालित करने और दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने तथा उन्हें नष्ट करने के लिए किया जाएगा. इनका नवीनतम ब्लॉक-V वेरिएंट वर्जीनिया पेलोड मॉड्यूल से लैस होगा, जिससे इन पनडुब्बियों में अतिरिक्त क्रूज मिसाइलें ले जाने की क्षमता विकसित होगी. इससे अमेरिका की लंबी दूरी की समुद्री आक्रामक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी.
चीन की बढ़ती समुद्री शक्ति
अमेरिका के इस बड़े निवेश के पीछे सबसे बड़ा कारण चीन का तेजी से विस्तार करता पनडुब्बी बेड़ा है. चीन ने पिछले कुछ वर्षों में आधुनिक परमाणु और पारंपरिक दोनों प्रकार की पनडुब्बियों के निर्माण में तेजी लाई है. चीनी नेवी के बेड़े में टाइप-093B परमाणु अटैक पनडुब्बियां और टाइप-094A बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां शामिल हो चुकी हैं. अनुमान है कि दशक के अंत तक चीन के पास 65 से 70 पनडुब्बियों का बेड़ा हो सकता है. नई चीनी पनडुब्बियों में कम शोर करने वाली संरचना, अत्याधुनिक सोनार सिस्टम और लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों जैसी क्षमताएं विकसित की जा रही हैं. यह विस्तार हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देने की चीन की व्यापक समुद्री रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
भारत भी अपने पनडुब्बी बेड़े को बढ़ाने की कोशिश में जुटा है.
पाकिस्तान भी बढ़ा रहा क्षमता
भारत के पड़ोसी पाकिस्तान ने भी अपनी पनडुब्बी शक्ति बढ़ाने की दिशा में कदम तेज कर दिए हैं. वह चीन से टाइप-039 हैंगोर क्लास की 8 नई पनडुब्बियां प्राप्त कर रहा है. पहली पनडुब्बी पीएनएस हैंगोर को पहले ही नौसेना में शामिल किया जा चुका है. इन नई पनडुब्बियों के शामिल होने के बाद पाकिस्तान के पास कुल 13 पनडुब्बियां होंगी, जिससे अरब सागर में उसकी समुद्री क्षमता पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हो जाएगी.
भारतीय नौसेना के सामने चुनौती
भारतीय नौसेना के पास वर्तमान में 16 पारंपरिक डीजल इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां हैं, जो कलवरी, सिंधुघोष और शिशुमार श्रेणियों में विभाजित हैं. सिंधुघोष श्रेणी की चार पनडुब्बियां सेवा से हटाई जा चुकी हैं, जबकि शिशुमार श्रेणी का जीवनकाल बढ़ाने के लिए उनका आधुनिकीकरण किया गया है. फ्रांसीसी स्कॉर्पीन डिजाइन पर आधारित कलवरी श्रेणी की पनडुब्बियों में स्वदेशी एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) प्रणाली लगाने की योजना है. इससे ये पनडुब्बियां लंबे समय तक पानी के भीतर रह सकेंगी और दुश्मन की निगरानी से बचने की उनकी क्षमता बढ़ेगी. इंडियन नेवी की बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट-75I योजना अभी भी लंबित है. वर्ष 1999 में तैयार 30 वर्षीय पनडुब्बी निर्माण योजना के तहत 6 से 9 अत्याधुनिक AIP युक्त पनडुब्बियां शामिल करने का लक्ष्य रखा गया था. लगातार हो रही देरी के कारण भारत का लक्ष्य 2030 तक 24 पारंपरिक पनडुब्बियों का बेड़ा तैयार करने का फिलहाल अधूरा दिखाई दे रहा है.
परमाणु पनडुब्बियों में भारत की स्थिति बेहतर
परमाणु पनडुब्बियों के क्षेत्र में भारत ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रगति की है. भारतीय नौसेना के पास अरिहंत श्रेणी की तीन परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां सक्रिय सेवा में हैं, जबकि चौथी पनडुब्बी समुद्री परीक्षणों के दौर से गुजर रही है. इन पनडुब्बियों में 3,500 किलोमीटर मारक क्षमता वाली के-4 और 5,000 किलोमीटर तक मार करने वाली के-5 बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात की जा सकती हैं, जो भारत को विश्वसनीय सेकेंड स्ट्राइक क्षमता प्रदान करती हैं. इसके अलावा, अधिक बड़ी एस-5 श्रेणी की पनडुब्बियों पर भी काम जारी है, जिनमें भविष्य में 5,000 किलोमीटर से अधिक दूरी तक मार करने वाली के-6 पनडुब्बी प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइलें लगाने की योजना है.




