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Badrinath Dham Traditions: बद्रीनाथ चार धाम यात्रा का मुख्य हिस्सा है. इसे धरती का बैकुंठ भी कहा जाता है. ये मंदिर सिर्फ अपनी धार्मिक महत्व के कारण ही नहीं बल्कि हिमालय की कोद में स्थित होने के कारण भी आकर्षण का मुख्य केंद्र है. यहां हर साल लाखों लोग दर्शन के लिए आते हैं. लेकिन भगवान बद्री यहां सिर्फ 6 महीने ही रहते हैं. इसके पीछे का कारण क्या है, चलिए इस लेख में जानते हैं.
6 महीने कहां रहते हैं भगवान बद्री?
उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु को समर्पित है. इस मंदिर को ‘भू-वैकुंठ’ भी कहा जाता है. मान्यता है कि यहां भगवान विष्णु बद्री विशाल के रूप में विराजमान हैं और उनके दर्शन करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति मिलती है. हिमालय की ऊंची पहाड़ियों, अलकनंदा नदी और मनमोहक प्राकृतिक दृश्यों के बीच स्थित यह धाम चार धाम यात्रा के प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल है.
लेकिन क्या आप जानते हैं कि सर्दियों में जब बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं, तो भगवान बद्री विशाल की पूजा कहां होती है? आखिर छह महीने तक मंदिर क्यों बंद रहता है और भगवान की पूजा से जुड़ी कौन-सी परंपराएं निभाई जाती हैं? आइए जानते हैं बद्रीनाथ धाम का धार्मिक महत्व, इसकी पौराणिक मान्यताएं और सर्दियों में होने वाली विशेष परंपराओं के बारे में.
बद्रीनाथ धाम को क्यों कहते हैं भू-वैकुंठ?
बद्रीनाथ धाम को भू-वैकुंठ कहने के पीछे धार्मिक मान्यता है. हिंदू धर्म में वैकुंठ को भगवान विष्णु का दिव्य निवास माना जाता है. मान्यता है कि बद्रीनाथ धाम में भगवान विष्णु स्वयं बद्री विशाल के रूप में विराजमान हैं. इसी वजह से इस स्थान को धरती पर भगवान विष्णु का धाम यानी भू-वैकुंठ कहा जाता है.
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने बद्रीनाथ क्षेत्र में नर-नारायण के रूप में तपस्या की थी. इतना ही नहीं ये भी मान्यता है कि माता लक्ष्मी ने उन्हें कठिन मौसम से बचाने के लिए बदरी यानी बेर के वृक्ष का रूप धारण किया था. इसलिए इस स्थान को बद्रीनाथ के नाम से जाना जाता है.
6 महीने क्यों बंद होते हैं मंदिर के कपाट?
बद्रीनाथ धाम समुद्र तल से लगभग 3,133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. सर्दियों में यहां भारी बर्फबारी होती है और तापमान काफी नीचे चला जाता है. ऐसे में श्रद्धालुओं की यात्रा और मंदिर तक पहुंचना कठिन हो जाता है. इसी कारण हर साल सर्दियों में बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं. आमतौर पर मंदिर के कपाट अप्रैल या मई में खुलते हैं और अक्टूबर या नवंबर में बंद होते हैं. कपाट खोलने और बंद करने की तिथियां धार्मिक पंचांग और परंपराओं के अनुसार तय की जाती हैं. कपाट बंद होने से पहले मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. इसके बाद शीतकाल के लिए भगवान की पूजा से जुड़ी परंपराएं निभाई जाती हैं.
6 महीने कहां रहते हैं भगवान बद्री?
धार्मिक परंपरा के अनुसार, सर्दियों में बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद होने के बाद भगवान बद्री विशाल की पूजा जोशीमठ में स्थित नरसिंह मंदिर में होती है. जोशीमठ को ज्योतिर्मठ के नाम से भी जाना जाता है. ये स्थान बद्रीनाथ धाम की शीतकालीन पूजा परंपरा से जुड़ा हुआ है. कपाट बंद होने के बाद भगवान की उत्सव मूर्ति को परंपरानुसार पांडुकेश्वर स्थित योगध्यान बदरी मंदिर ले जाया जाता है. वहां और जोशीमठ में शीतकालीन पूजा की अलग-अलग परंपराएं निभाई जाती हैं. इस तरह बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद रहने के बावजूद भगवान की पूजा-अर्चना जारी रहती है.
बद्रीनाथ मंदिर में कौन करते हैं पूजा?
बद्रीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी को रावल कहा जाता है. परंपरागत रूप से रावल केरल के नंबूदरी ब्राह्मण समुदाय से होते हैं. मंदिर में पूजा-अर्चना वैदिक विधि-विधान के अनुसार की जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आदि शंकराचार्य ने बद्रीनाथ में भगवान विष्णु की मूर्ति को पुनः स्थापित किया था. बद्रीनाथ की यात्रा के दौरान श्रद्धालु आसपास के कई धार्मिक और प्राकृतिक स्थलों के दर्शन भी कर सकते हैं. इनमें माणा गांव, व्यास गुफा, भीम पुल और सरस्वती नदी का क्षेत्र प्रमुख हैं.
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शारदा सिंह एक अनुभवी लाइफस्टाइल पत्रकार हैं, जिनके पास डिजिटल मीडिया और कंटेंट लेखन के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का अनुभव है. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से…




