अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 27 अगस्त को एक आदेश दिया. आदेश था कि अमेरिका में ‘लेक ओंटारियो’ का नाम बदलकर ‘लेक अमेरिका’ किया जाए. यह आदेश अमेरिकी सरकारी रिकॉर्ड के लिए था. लेकिन इसके बाद हुआ क्या? दुनिया भर के देशों फ्रीडम ऑफ स्पीच, ट्रांसपेरेंसी और कॉरपोरेट ऑटोनॉमी का ज्ञान बांटने वाली टेक कंपनियों का सरगना Google महज 14 घंटे के भीतर घुटनों पर आ गया. Google Maps में लेक ओंटारियो का नाम पोंछकर ‘लेक अमेरिका’ लिख दिया.
जहां दुनिया भर में ये कंपनियां महीनों तक नियमों पर बहस करती हैं, अदालतों में जाती हैं, प्रेस रिलीज निकाल कर छाती पीटती हैं कि हम एक स्वतंत्र संस्था हैं, वहां अमेरिका में ट्रंप की एक घुड़की पर ये सरकार के आगे एकदम गीदड़ बन गईं. सिर झुकाकर तुरंत फैसला लागू कर दिया. कोई लंबी बहस नहीं हुई, कोई ह्यूमन राइट्स नहीं, कोई जियोग्राफिक इंपार्शियलिटी वाला भाषण नहीं. मालिक ने चाबुक चलाया और डिजिटल वर्ल्ड पर राज करने वाले इन शासकों ने चुपचाप अपनी स्क्रीन बदल दी.
ताकत के आगे आत्मसमर्पण ही तो है…
जब बात अमेरिकी सरकार के आदेश की हो, तो गूगल की नीतियां रातों-रात उस आदेश के हिसाब से खुद को ढाल लेती हैं. बहाना यह दिया जाता है कि हम तो अमेरिकी सरकारी स्रोत, यानी जियोग्राफिक नेम्स इंफॉर्मेशन सिस्टम को फॉलो करते हैं. क्या सच में? अगर सरकार ने कहा कि आज से दिन को रात कहो, तो क्या गूगल मैप्स स्क्रीन को काली कर देगा? यहां कंपनी की कोई स्वतंत्रता नहीं बचती. यह पूरी तरह से ताकत के आगे आत्मसमर्पण है.
मुझे यह देखकर भी चिढ़ होती है कि हम भारतीय इन कंपनियों को वैश्विक और निष्पक्ष मानकर अपने सिर पर बैठाए रखते हैं. हमें लगता है कि गूगल का नक्शा पूरी दुनिया के लिए एक अटल सत्य है. लेकिन इस घटना ने उस सत्य की धज्जियां उड़ा दी हैं. अमेरिका में आप मैप खोलेंगे तो लेक अमेरिका दिखेगा, सीमा पार करके कनाडा चले जाइए, वही पानी, वही जगह आपको लेक ओंटारियो दिखेगी. बाकी दुनिया में दोनों नाम दिखेंगे. यानी आप जिस देश में बैठे हैं, ये कंपनियां आपको उसी देश की सहूलियत और ताकत के हिसाब से सच परोसेंगी. डिजिटल दुनिया का कोई एक सच नहीं है, सच वह है जो ताकतवर सरकारें तय करती हैं.
इस तमाशे में भारत के लिए क्या सबक है?
यह घटना भारत के लिए आंखें खोलने वाला है. जब भारत अपनी संप्रभुता, सुरक्षा या कानूनों के तहत इन विदेशी कंपनियों से किसी फैसले को लागू करवाने के लिए कहता है, तो ये सीधे मुंह बात तक नहीं करतीं. भारत सरकार सालों-साल कहती रह जाती है, लेकिन ये नियम लागू नहीं करते. इनके पास भारत के लिए सौ बहाने होते हैं- हमारी प्राइवेसी पॉलिसी ऐसी है, हमारा ग्लोबल स्टैंडर्ड ऐसा है, हम फ्री स्पीच के पैरोकार हैं. भारत में आकर ये कानून के पेंच लड़ाते हैं, अदालतों का दरवाजा खटखटाते हैं और तकनीकी अड़चनें गिनाते हैं. लेकिन जैसे ही भारत सरकार की ओर से इनकी गर्दन पकड़ी जाती है, जब रेगुलेटर डंडा चलाता है या इनकी सेवाएं बंद करने का खौफ पैदा होता है, तब जाकर इनकी अकड़ थोड़ी ढीली पड़ती है. सवाल ये कि कानून अमेरिका का हो तो 14 घंटे के अंदर जी-हुजूरी, और कानून भारत का हो तो इतनी बहस क्यों?
भारत को यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि सिर्फ एक बड़ा बाजार होने से काम नहीं चलेगा. जब तक आप डंडा लेकर खड़े होने वाले एक रेगुलेटर नहीं बनेंगे, तब तक ये टेक कंपनियां आपको चरागाह ही समझेंगी. भारत को किसी भी डिजिटल फैसले, मैप सुधार या डेटा पॉलिसी को लागू करवाने के लिए अनुरोध करना बंद करना होगा. आदेश दो, समयसीमा तय करो और अगर पालन न हो, तो ऐसा आर्थिक और कानूनी फंदा कसो कि इनकी सांसें रुक जाएं. क्योंकि ये कंपनियां किसी नैतिकता या लोकतांत्रिक उसूल से नहीं चलतीं, ये सिर्फ नुकसान के डर और डंडे की भाषा समझती हैं. अमेरिका ने डंडा दिखाया, गूगल ने 14 घंटे में नाम बदल दिया. भारत को भी वही डंडा अपने हाथ में लेना होगा.
असली खतरे समझिए
सोचिए अगर किसी जगह के नाम को लेकर इतनी आसानी से समझौता हो सकता है, तो भविष्य में सीमाओं, विवादित क्षेत्रों और सामरिक महत्व की जगहों को लेकर ये कंपनियां क्या करेंगी? नक्शा कोई साधारण ड्रॉइंग नहीं है. इस पर सेनाओं के मूवमेंट, देशों की सीमाएं, नागरिकों का जीवन और राष्ट्र की संप्रभुता टिकी होती है. आज अमेरिका ने अपने हिस्से का नाम बदला है, कल कोई और देश ताकत के नशे में किसी दूसरे देश के हिस्से को अपने मैप में दिखाने का आदेश दे देगा, तो क्या गूगल उसे भी मान लेगा?
हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहां असल जमीन पर चाहे जिसकी भी सत्ता हो, हमारी सोच और हमारे नजरिए पर कब्जा डिजिटल स्क्रीन का है. लेक अमेरिका का मुद्दा सिर्फ एक झील का नाम बदलने की घटना नहीं है. यह ताकत, सत्ता, कॉरपोरेट लालच और डिजिटल गुलामी का एक क्रूर उदाहरण है.
अमेरिका ने अपनी लाठी से अपनी भैंस हांक कर पूरी दुनिया को दिखा दी है. दुनिया जितनी जल्दी इसके खतरे भांप जाए, उतना ही अच्छा…




