अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध के कारण नौसेना के सबसे बड़े हथियार पर भारी दबाव आ गया है. स्थिति यह बन गई है कि ईरान संकट से निपटने के लिए अमेरिका को पश्चिमी प्रशांत महासागर से अपना नौसैनिक बेड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर्स हटाना पड़ा है. अब इसे मिडिल ईस्ट में तैनात किया जा रहा है. इससे प्रशांत महासागर में अमेरिक की मौजूदगी काफी कमजोर हो गई है.
अमेरिका का यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन एयरक्राफ्ट कैरियर अब प्रशांत क्षेत्र से निकलकर मिडिल ईस्ट जा रहा है. वह वहां लंबे समय से तैनात यूएसएस अब्राहम लिंकन की जगह लेगा. लिंकन को ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियानों के कारण तय समय से काफी ज्यादा समय तक समुद्र में रहना पड़ा है.
240 दिनों से ज्यादा समय से समुद्र में है अमेरिकी कैरियर
अब्राहम लिंकन लगातार 240 दिनों से ज्यादा समय समुद्र में बिता चुका है. लंबे समय तक समुद्र में रहने से जहाज के सैनिकों पर मानसिक और शारीरिक दबाव बढ़ रहा है. अमेरिकी सांसद भी जहाज पर सैनिकों की स्थिति की जांच की मांग कर रहे हैं. जानकारों का कहना है कि सैनिकों को पर्याप्त आराम न मिलने से उनके काम करने की क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है.
चीन इस स्थिति का फायदा उठा सकता है. हडसन इंस्टीट्यूट में रक्षा विश्लेषक विशेषज्ञ ब्रायन क्लार्क ने न्यूज एजेंसी एपी की रिपोर्ट में कहा है चीन ताइवान पर अभी हमला नहीं करेगा. लेकिन जापान, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों को यह संदेश देने की कोशिश कर सकता है कि प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका पहले जितना मजबूत नहीं रहा. उन्होंने कहा कि चीन चाहता है कि क्षेत्र के देश यह मानने लगें कि अमेरिका उनकी सुरक्षा की गारंटी देने में सक्षम नहीं है. साथ ही ये बताना चाहेगा चीन ही इस क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत बन चुका है
चीन पहले से बढ़ा रहा है सैन्य दबाव
अमेरिकी कैरियर की गैरमौजूदगी ऐसे समय में हो रही है, जब चीन प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ा रहा है. चीन ने हाल ही में इंडोनेशिया के साथ नौसैनिक अभ्यास किया है. इसके अलावा उसने फिलीपींस के दावे वाले स्कारबोरो शोआल के पास सैन्य अभ्यास किया. चीन और फिलीपींस के बीच इस इलाके को लेकर लंबे समय से विवाद है.
जापान के साथ भी चीन का तनाव बढ़ रहा है. पिछले महीने एक चीनी गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर ने जापान के दक्षिणी द्वीप ओकिनोटोरी के पास लाइव-फायर अभ्यास किया था. इन घटनाओं से जापान और फिलीपींस जैसे अमेरिकी सहयोगी देशों की चिंता बढ़ सकती है.
अमेरिका ने सहयोगियों को दिया भरोसा
अमेरिकी सेना भी अपने सहयोगी देशों को भरोसा दिलाने की कोशिश कर रही है कि प्रशांत क्षेत्र में उसकी ताकत कम नहीं हुई है. अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशंस कमांड के प्रमुख एडमिरल फ्रैंक ब्रैडली फिलीपींस पहुंचे और वहां के अधिकारियों से मुलाकात की. उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना दुनिया के किसी भी हिस्से में अपनी सैन्य ताकत पहुंचाने में सक्षम है.
जॉर्ज वॉशिंगटन के मिडिल ईस्ट जाने के बाद कुछ समय के लिए प्रशांत महासागर में अमेरिकी नौसेना का कोई बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर नहीं रहेगा.
ब्रायन क्लार्क का कहना है कि मिडिल ईस्ट में स्थिति संभलने के बाद अमेरिका जरूरत के मुताबिक अपनी सैन्य ताकत को फिर से प्रशांत क्षेत्र में भेज सकता है. यह स्थिति ज्यादा लंबे समय तक नहीं रह सकती, क्योंकि अमेरिका आने वाले महीनों में दूसरे कैरियर को प्रशांत क्षेत्र में भेज सकता है. लेकिन फिलहाल यह घटनाक्रम चीन के लिए रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है.
अमेरिका के 11 एयरक्राफ्ट कैरियर
अमेरिकी नौसेना के पास कुल 11 एयरक्राफ्ट कैरियर हैं. आमतौर पर इनमें से दो या तीन एक समय में तैनात रहते हैं. लेकिन ईरान के साथ युद्ध लंबा खिंचने के कारण नौसेना पर दबाव बढ़ रहा है. अगर यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट को भी मध्य पूर्व भेजा जाता है, तो अमेरिका एक साथ चार कैरियर तैनात कर सकता है.
इससे एक और समस्या पैदा होगी. इन विशाल युद्धपोतों को रखरखाव की जरूरत होती है. अमेरिका में केवल दो शिपयार्ड ऐसे हैं जहां इन एयरक्राफ्ट कैरियर की बड़ी मरम्मत होती है. इस वजह से आने वाले सालों में कैरियर की मरम्मत का दबाव बढ़ सकता है और अमेरिकी नौसेना की तैनाती क्षमता प्रभावित हो सकती है.
भविष्य में एयरक्राफ्ट कैरियर कम कारगर होंगे?
कुछ जानकारों अब यह सवाल भी उठा रहे हैं कि आधुनिक युद्ध में इतने बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर कितने कारगर रह गए हैं. ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलों के दौर में चीन जैसे ताकतवर देश के खिलाफ इतने बड़े युद्धपोत आसान निशाना बन सकते हैं. जानकारों का ये भी का मानना है कि छोटे युद्धपोत, पनडुब्बियां और दूसरे आधुनिक हथियार कई अभियानों में एयरक्राफ्ट कैरियर की भूमिका निभा सकते हैं.




