तेहरान: ईरान इस वक्त अमेरिका का दुश्मन नंबर-1 बना हुआ है और उसने ट्रंप व जेडी वेंस जैसे टॉप लीडर्स नेताओं की हिटलिस्ट जारी कर रखी है. ईरान जब तक सिर्फ धमकियां देता रहा, अमेरिका का एक पुराना दुश्मन सीधे ट्रंप के घर में घुसपैठ कर गया. अमेरिकी विदेश विभाग की एक रिपोर्ट ने वाशिंगटन में हड़कंप मचा दिया है. इस रिपोर्ट में क्यूबा पर अब तक का सबसे बड़ा आरोप लगाते हुए दावा किया गया है कि हवाना की खुफिया एजेंसियों ने दशकों से अमेरिकी सरकार के टॉप पदों, सीक्रेट विभागों और सरकार चलाने वाले पावरफुल लीडर्स के बीच अपने जासूसों को गहराई तक फिट कर रखा है.
ट्रंप प्रशासन की मानें तो ये अमेरिका के इतिहास में किसी भी विदेशी ताकत द्वारा चलाई गई सबसे लंबी, गहरी और घातक जासूसी साजिशों में से एक है. ये चौंकाने वाला खुलासा ऐसे मोड़ पर हुआ है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ अपनी ‘मैक्सिमम प्रेशर’ यानी चौतरफा दबाव की रणनीति को धार देने में जुटे हैं.
अमेरिका के विदेश विभाग ने भेजा अलर्ट
अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की इस रिपोर्ट का दावा है कि क्यूबाई जासूसी तंत्र ने न सिर्फ अमेरिकी सरकार के सर्वोच्च पदों पर घुसपैठ की, बल्कि अमेरिकी धरती पर कई पीढ़ियों के कार्यकर्ताओं को तैयार किया, उनके वैचारिक नेटवर्क बनाए और अमेरिका के भीतर वामपंथी राजनीति को बढ़ावा दिया.
अमेरिका का आरोप है कि क्यूबा की जासूसी केवल सीक्रेट फाइलें चुराने या जानकारी जुटाने तक सीमित नहीं थी. इसका असली मकसद अमेरिकी राजनीति को भीतर से प्रभावित करना और अपने हिसाब से मोड़ना था. हालांकि, रिपोर्ट में जितने सनसनीखेज दावे किए गए हैं, उनके पीछे सार्वजनिक तौर पर बहुत कम नए सबूत पेश किए गए हैं. ज्यादातर बातें और मामले वही हैं जो पिछले कई सालों से सार्वजनिक रूप से दर्ज और चर्चित रहे हैं.
US Vs Cuba का पुराना जासूसी खेल
अगर अमेरिका और क्यूबा के कूटनीतिक इतिहास को देखें तो जासूसी इन दोनों के रिश्तों का सबसे अहम हिस्सा रही है. कोल्ड नॉर के दौर से ही दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ बड़े पैमाने पर जासूसी करते आए हैं. अमेरिका की सबसे सुरक्षित और सीक्रेट मानी जाने वाली एजेंसियों में सेंध लगाने की क्यूबा की क्षमता पहले भी साबित हो चुकी है.
चाहे चर्चित ‘क्यूबन फाइव’ का मामला हो या फिर अमेरिकी डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) की टॉप एनालिस्ट एना बेलेन मोंटेस का केस, इन सबने ये साफ कर दिया था कि छोटा सा क्यूबा अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था के भीतर तक पहुंचने का हुनर रखता है. दूसरी तरफ, 1959 की क्रांति के बाद से ही अमेरिका ने भी क्यूबा में तख्तापलट करने और वहां की कम्युनिस्ट सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए खुफिया ऑपरेशन चलाए हैं. इसलिए, ये नई रिपोर्ट पुरानी सुरक्षा चिंताओं को फिर से जिंदा जरूर करती है लेकिन जासूसी की इस पुरानी जंग में कोई बहुत नया मोड़ नहीं जोड़ती.
क्यूबा को लेकर ट्रंप की पुरानी रणनीति
ट्रंप ने सत्ता में आते ही ओबामा दौर में लिए गए क्यूबा से संबंध बेहतर बनाने के फैसलों को रद्द कर दिया. उन्होंने क्यूबा पर फिर से कड़े व्यापारिक और आर्थिक प्रतिबंध थोप दिए थे. इसके साथ ही क्यूबा को एक बार फिर ‘आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले देशों’ की लिस्ट में वापस डाल दिया गया. इस कड़े रुख का मकसद हवाना की कम्युनिस्ट सरकार की वित्तीय रीढ़ तोड़ना और उस पर हर तरफ से घेराबंदी करना है.
क्यूबा पर जासूसी के ये नए आरोप ट्रंप प्रशासन की उसी पुरानी रणनीति का हिस्सा लगते हैं, जिसके तहत अमेरिका के आसपास की कम्युनिस्ट सरकारों को देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताकर पेश किया जाता है. राष्ट्रपति ट्रंप तो काफी समय से खुलकर कहते आ रहे हैं कि लैटिन अमेरिका में जितनी भी अमेरिका-विरोधी साजिशें या हलचलें हो रही हैं, उन सब का असली अड्डा क्यूबा और वेनेजुएला ही हैं.
इसी साल जून में तो ट्रंप ने साफ कह दिया था कि अमेरिका बहुत जल्द क्यूबा पर शिकंजा कसकर सब कुछ अपने हाथ में ले लेगा. स्टेट डिपार्टमेंट की ये नई रिपोर्ट ट्रंप प्रशासन के उन्हीं तेवरों पर मुहर लगाती है. इसके जरिए वाशिंगटन ने सीधा संदेश दे दिया है कि क्यूबा का ये जासूसी नेटवर्क अमरीका की सुरक्षा और उसकी संप्रभुता के लिए भी एक बहुत बड़ा खतरा बना हुआ है.




