नैनी झील नहीं, नैनीताल का असली खजाना है DSB कैंपस का हिमालय संग्रहालय! यहां रखी हैं इतिहास की धरोहरें


नैनीताल: उत्तराखंड के नैनीताल स्थित डीएसबी परिसर (डीएसबी कैंपस) में मौजूद हिमालय संग्रहालय केवल पुरानी वस्तुओं का संग्रह नहीं, बल्कि हिमालय, कुमाऊं और गढ़वाल की समृद्ध सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक विरासत को संजोए हुए है. अगर आप नैनीताल घूमने आते हैं और सिर्फ नैनी झील, मॉल रोड या स्नो व्यू तक ही अपनी ट्रिप को सीमित रखते हैं, तो आप शहर की सबसे अनमोल धरोहरों में से एक को देखने से चूक सकते हैं. यह संग्रहालय शोधार्थियों, विद्यार्थियों, इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों के लिए ज्ञान का खजाना है.

संग्रहालय में कुमाऊं के प्राचीन इतिहास से जुड़ी दुर्लभ पांडुलिपियां, ऐतिहासिक दस्तावेज, पारंपरिक वस्तुएं, पुरातात्विक अवशेष, प्राचीन मूर्तियां और लोक संस्कृति से जुड़ी सामग्री सुरक्षित रखी गई हैं. यहां हिमालयी जैव विविधता, वनस्पतियों, जीव-जंतुओं, भूगोल और उत्तराखंड की लोक परंपराओं से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी भी उपलब्ध है. यही कारण है कि यह संग्रहालय केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि अध्ययन और शोध का भी प्रमुख केंद्र बन चुका है.

1987 में हुई थी संग्रहालय की शुरुआत
प्रसिद्ध इतिहासकार और नैनीताल निवासी प्रोफेसर अजय रावत बताते हैं कि हिमालय संग्रहालय की शुरुआत का श्रेय उनके गुरु डॉ. मदन चंद्र भट्ट को जाता है. वे हमेशा अपने विद्यार्थियों से कहते थे कि यदि घरों में कोई पुरानी ऐतिहासिक वस्तु, दस्तावेज या धरोहर हो तो उसे संग्रहालय तक लेकर आएं, ताकि उसे सुरक्षित रखा जा सके. इसी सोच ने हिमालय संग्रहालय की मजबूत नींव रखी. बाद में साल 1987 में प्रोफेसर अजय रावत ने इसे और व्यापक स्वरूप दिया. इस दौरान डॉ. शेखर पाठक और हीरा सिंह भाकुनी ने भी दुर्लभ ऐतिहासिक सामग्री जुटाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया.

प्रोफेसर रावत बताते हैं कि संग्रहालय में 11वीं और 12वीं शताब्दी की दुर्लभ मूर्तियां आज भी सुरक्षित हैं. इसके साथ ही कत्यूर, चंद और परमार जैसे राजवंशों से जुड़ी कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरें यहां संरक्षित की गई हैं. संग्रहालय को तीन अलग-अलग जोन में विकसित किया गया है, जहां शिलालेख, प्राचीन वास्तुकला, ज्योतिष, स्वतंत्रता संग्राम और लोक संस्कृति से जुड़ी सामग्री को व्यवस्थित रूप से प्रदर्शित किया गया है.

चंद राजाओं की तलवार भी है यहां
उन्होंने बताया कि कुमाऊं के सबसे समृद्ध कत्यूर वंश से जुड़े शिलालेखों का विशेष संग्रह यहां मौजूद है. कुछ दुर्लभ शिलालेखों की प्रतिकृतियां साल 1988 में बद्रीनाथ से प्राप्त तस्वीरों के आधार पर तैयार कर संग्रहालय में सुरक्षित रखी गईं. उत्तराखंड की समृद्ध ज्योतिष परंपरा को दर्शाने वाली 12 फीट लंबी जन्म कुंडली भी यहां प्रमुख आकर्षणों में शामिल है.

संग्रहालय में रानी कर्णावती की प्रतिमा, परमार वंश की मूर्तियां, विशाल शैलखंड, पिथौरागढ़ की प्रसिद्ध हिलजात्रा में उपयोग किए जाने वाले पारंपरिक मुखौटे, देवीधुरा के ऐतिहासिक ढाल और चंद राजाओं की तलवारें भी संरक्षित हैं. इन दुर्लभ धरोहरों को उत्तराखंड के विभिन्न गांवों और मंदिरों से लोगों की सहमति के बाद संग्रहालय तक लाया गया, ताकि इन्हें सुरक्षित रखा जा सके और आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास को जान सकें.

पंडित गोविंद बल्लभ पंत की स्मृतियां भी है मौजूद
संग्रहालय का एक महत्वपूर्ण भाग भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत को भी समर्पित है. यहां उनके जन्म से लेकर जीवन के अंतिम समय तक की दुर्लभ तस्वीरों का संग्रह मौजूद है. प्रोफेसर अजय रावत बताते हैं कि इन तस्वीरों को भवाली में रहने वाले उनके परिजनों और दिल्ली से विशेष प्रयासों के बाद एकत्र किया गया. आज यह संग्रहालय न केवल पंत जी के जीवन को करीब से जानने का अवसर देता है, बल्कि उत्तराखंड के इतिहास और विरासत को भी जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है.

फ्री में घूम सकते हैं संग्रहालय
अगर आप नैनीताल की असली पहचान, कुमाऊं के गौरवशाली इतिहास और हिमालय की सांस्कृतिक विरासत को करीब से समझना चाहते हैं, तो डीएसबी परिसर का हिमालय संग्रहालय आपकी यात्रा का सबसे यादगार पड़ाव बन सकता है. यहां रखा हर शिलालेख, हर मूर्ति और हर पांडुलिपि उत्तराखंड के गौरवशाली अतीत की एक अनकही कहानी सुनाती है. खास बात यह है कि आप इस संग्रहालय में निशुल्क प्रवेश कर सकते हैं, किसी तरह का कोई भी टिकट यहां नहीं लगता, बस आपको आना होगा डीएसबी कॉलेज में, जहां यह इतिहास की अमूल्य धरोहर स्थित है.



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