Marco Rubio Exclusive Interview: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए बनाए गए ‘क्वाड’ समूह बनाया गया था. इसमें अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं. दिल्ली पहुंचे अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सीएनएन-न्यूज18 के साथ एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में क्वाड को लेकर अमेरिका का रुख साफ किया. रुबियो ने क्वाड लीडर्स समिट भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा और रक्षा उत्पादन जैसे अहम मुद्दों पर विस्तार से बात की है.
मार्को रुबियो से जब पूछा गया कि क्या इस साल हम क्वाड लीडर्स समिट की उम्मीद कर सकते हैं? तो उन्होंने पूरी स्पष्टता के साथ कहा, ‘हम चाहते हैं कि क्वाड लीडर्स की बैठक इसी साल हो. हम इसके लिए अवसर तलाश रहे हैं.’ रुबियो ने एक बहुत बड़ी बात कही कि अमेरिका इस बैठक को एक ‘स्टैंडअलोन इवेंट’ (Standalone Event) यानी एक पूरी तरह से स्वतंत्र और अलग कार्यक्रम के रूप में आयोजित करना चाहता है.
चुनावी साल का असर होगा
हालांकि, उन्होंने कूटनीतिक व्यावहारिकताओं का जिक्र करते हुए यह भी माना कि अमेरिका और भारत जैसे देशों में चुनावी साल होने के कारण यात्राएं थोड़ी मुश्किल हो जाती हैं. इसलिए, यदि किसी बड़े वैश्विक कार्यक्रम के साइड इवेंट के तौर पर भी सभी नेता एक जगह जुटते हैं, तो भी यह बैठक की जा सकती है. लेकिन, अमेरिका की पहली प्राथमिकता इसे एक स्वतंत्र महाबैठक के रूप में आयोजित करने की ही है. यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अमेरिकी प्रशासन क्वाड को महज एक रस्म नहीं, बल्कि एक गंभीर रणनीतिक मंच मानता है.
सिर्फ मीटिंग नहीं, रिजल्ट पर फोकस
एक्सक्लूसिव इंटरव्यू के दौरान रुबियो ने क्वाड के भविष्य की दिशा तय की. उन्होंने कहा कि क्वाड सिर्फ उन देशों की बैठक भर नहीं रहना चाहिए जो एक-दूसरे को पसंद करते हैं. अब इसे एक ऐसे ‘मैकेनिज्म’ (तंत्र) में बदलना होगा जो ‘रियल वर्क प्रोडक्ट’ (वास्तविक परिणाम) दे सके. रुबियो के अनुसार, क्वाड देशों ने अब जमीनी स्तर पर काम करना और रिजल्ट देने शुरू कर दिए हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में क्वाड केवल बयानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तकनीक, सुरक्षा और व्यापार के मोर्चे पर ठोस कदम उठाएगा.
इंडो-पैसिफिक में इमरजेंसी स्थिति से निपटने की तैयारी
भारत और अमेरिका के बीच रक्षा संबंधों पर बात करते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि दोनों देशों का सहयोग अब सिर्फ पारंपरिक सैन्य संबंधों से बहुत आगे निकल चुका है. रुबियो ने बताया कि दोनों देशों की सेनाओं को भविष्य की किसी भी आकस्मिक स्थिति के लिए तैयार रहना होगा. अक्सर लोग इसका मतलब ‘युद्ध’ से निकालते हैं, लेकिन रुबियो ने स्पष्ट किया कि इसका मतलब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में आने वाले किसी बड़े मानवीय संकट या प्राकृतिक आपदा से भी है. अमेरिका चाहता है कि संकट के समय भारत और अमेरिका की सेनाएं एक साथ मिलकर संयुक्त रूप से और तेजी से प्रतिक्रिया दें.
समुद्री व्यापार की सुरक्षा और नौसेनाओं का संयुक्त अभ्यास
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और अर्थव्यवस्थाओं को सुरक्षित रखने के लिए समुद्री रास्तों का खुला रहना बेहद जरूरी है. रुबियो ने स्पष्ट किया कि शिपिंग रूट्स और स्ट्रेट्स की सुरक्षा भारत और अमेरिका, दोनों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण है. इसी को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों की नौसेनाओं और सशस्त्र बलों का एक साथ काम करना, संयुक्त युद्धाभ्यास करना और एक-दूसरे की कार्यप्रणाली को समझना समय की सबसे बड़ी मांग है. इससे भविष्य में किसी भी संकट के समय दोनों देशों की नौसेनाएं मिलकर दुश्मन या आपदा का सामना कर सकेंगी.
भारत बनेगा डिफेंस हब
इंटरव्यू के अंतिम हिस्से में रुबियो ने रक्षा क्षेत्र में ‘जॉइंट प्रोडक्शन’ (संयुक्त उत्पादन) को सबसे आदर्श स्थिति बताया. उन्होंने भारत की क्षमताओं का लोहा मानते हुए कहा कि भारत के पास रक्षा निर्माण की असीमित क्षमता और ‘हाइली स्किल्ड वर्कफोर्स’ (अत्यधिक कुशल कार्यबल) मौजूद है. रुबियो ने खुलासा किया कि अमेरिकी रक्षा कंपनियां भारत में हथियारों का उत्पादन करने के लिए बहुत ज्यादा इच्छुक हैं.
रुबियो ने ‘क्वाड लीडर्स समिट’ को लेकर क्या बड़ा बयान दिया है?
सीएनएन-न्यूज18 को दिए इंटरव्यू में रुबियो ने कहा कि अमेरिका इसी साल ‘क्वाड लीडर्स समिट’ का आयोजन चाहता है. अमेरिका की प्राथमिकता है कि यह बैठक एक स्वतंत्र कार्यक्रम के तौर पर हो, ताकि ठोस फैसले लिए जा सकें.
‘क्वाड’ समूह में अब किस तरह का बदलाव आ रहा है?
रुबियो ने कहा कि ‘क्वाड’ अब सिर्फ सहयोगी देशों की सामान्य ‘मीटिंग’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे तंत्र में बदल रहा है जो रियल वर्क प्रोडक्ट दे रहा है.
अमेरिका भारत से किस तरह का सहयोग चाहता है?
अमेरिका चाहता है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भविष्य के किसी भी सैन्य आपातकाल या बड़े मानवीय संकट के समय भारत और अमेरिका की सेनाएं और नौसेनाएं एक साथ मिलकर संयुक्त रूप से काम करें.





