यूपी से आए रिजल्ट ने देश में भाजपा का समीकरण बिगाड़ दिया। भाजपा अपनी बलबूते सरकार नहीं बना पाएगी। उसे सहयोगी प्रशंसकों के साथ लेना ही पड़ेगा। आखिर ऐसा क्या हुआ कि 2 साल पहले विधानसभा में बंपर बहुमत वाली भाजपा का यह हाल हो गया? सपा-कांग्रेस की जीत
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सवाल-1 : यूपी में भाजपा की हालत इतनी कम होने की क्या वजह रही?
उत्तर- इसके लिए 3 फैक्ट्स ने काम किया…
पहला तथ्य- मोदी के चेहरे पर चुनाव लागु: भाजपा पिछले 10 साल से सिर्फ एक चेहरे पर चुनाव लड़ रही है। चाहे राष्ट्रीय चुनाव हो या फिर विधानसभा चुनाव। जनता इससे अभिभूत है। यूपी के प्रभावी विमर्श को भी मोदी के चेहरे के सामने नहीं उतारा गया, जिसका नुकसान उठाना पड़ा।
दूसरा कारक- यूपी में सपा-कांग्रेस का गठबंधन: यूपी में सपा और कांग्रेस के गठबंधन की वजह से भी भारत को बढ़त मिली। सपा-कांग्रेस ने समन्वय बैठक करके खुद को एक-दूसरे से जोड़ा, साथ ही चुनाव लड़ने की कोशिश की। कांग्रेस के आरोपों को सपाईयों ने जमीन तक पहुंचाया। कांग्रेस चुनाव होने की वजह से आम जनता ने भी इस गठबंधन को तरजीह दी।
तीसरा तथ्य- हानिकारक अभियान का नुकसान हुआ: पीएम मोदी समेत भाजपा के बड़े नेताओं ने पूरे चुनाव में सिर्फ नकारात्मक प्रचार की। लेकिन, जनता 10 साल बाद अब सरकार से मिस्बाहलिया चाहती थी। कोई भी नई योजना सत्ता से जुड़े खतरों के पास नहीं थी। केवल चिप्स की झलक को दोहरा रहे थे। इसके अलावा भाजपा ने 40 से अधिक सीटों पर पुराने नेताओं को उतारा है। उनके कारण आम जनता में गुस्सा था। इनरश का अंतर्राष्ट्रीय विरोध भी हुआ, जिसका असर सामने आया।
प्रश्न-2 : विधानसभा चुनाव की बंपर जीत के 2 साल बाद ऐसा क्या हुआ कि बुलडोजर बाबा की छवि और सख्त कानून व्यवस्था ने काम नहीं किया?
उत्तर- यूपी की बेहतर कानून व्यवस्था से कांग्रेस चुनाव का कोई मतलब नहीं है। यह चुनाव एमपी और प्रधानमंत्री चुनाव के लिए है। रही बात योगी की बुलडोजर बाबा की छवि की, तो आम जनता भी इस बात को समझ चुकी है। वह चलना है, आप भले ही कुछ चुनिंदा लोगों पर बुलडोजर चलावा दें या एनकाउंटर करवा दें, लेकिन यूपी की आम जनता जिस अपराध से रोजाना दो-चार होती है उस पर भरोसा नहीं करना पड़ता। अभी भी लूट, मर्द, छिनैती जैसी घटनाएं तो हो ही रही हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट में भी लगभग हर कैटेगरी में यूपी टॉप-5 में है। यही वजह है कि यूपी की कानून व्यवस्था का असर रिजल्ट पर नहीं पड़ा।
साथ ही चुनाव में जो नैरेटिव चला कि 400 से ज्यादा सिगरेट आती है तो योगी को पद से हटा दिया जाएगा। इसे भी ऑपरेटिंग सिस्टम से वंचित किया गया। जिसका असर हुआ, जो योगी समर्थक थे, वे चुनाव में भाजपा से दूरी बना लिये।
सवाल-3 : अखिलेश और राहुल गांधी ने ऐसा क्या किया कि इतनी मौतें जीत गईं?
उत्तर- इसके भी तीन कारण बताए जा रहे हैं।
युवाओं पर फोकस: यूपी में 20.41 लाख मतदाता नए हैं। ऐसे में राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने युवाओं को अपने विचारों में प्राथमिकता दी। इंडी गठबंधन में परंपरा के चयन में भी युवा कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी गई। हर रैली में अखिलेश यादव-राहुल गांधी ने बेरोजगारी, नौकरी, अग्निवीर और पेपर लीक का मुद्दा खत्म तक रखा। जिससे ज्यादातर युवा जुड़ सकें।
यादवों के नेता का थप्पा हटाया गया:अखिलेश यादव ने पूरे यूपी में सिर्फ अपने परिवार के 5 यादवों को टिकट देकर अपने ऊपर से यादव नेता का थप्पा भी हटाने की कोशिश की।
मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप नहीं लगा: मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोपों से बचने के लिए अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने पूरे यूपी में सिर्फ 6 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे। जातीय समीकरण के अनुसार, रंगों के चयन को भी ध्यान में रखा गया। कई चुनावों पर जाति के चयन में यह ध्यान रखा गया कि उनकी जाति के वोट बैंक पर आसपास की चुनावों पर भी प्रभाव पड़ा।
सकारात्मक प्रतिक्रियाओं से दूरी बनाएं: राहुल गांधी-अखिलेश यादव ने पूरे चुनाव में सकारात्मक कैंपेन से दूरी बनाए रखी। भाजपा की ओर से लगाए जा रहे आरोपों को अनसुना कर दिया। अपने ही देखे पर टिके रहे।
सवाल-4 : क्या मुस्लिम वोट एकतरफा गिरा, इस कारण भाजपा को यह नुकसान हुआ?
उत्तर- मुस्लिम वोट एकतरफा इसलिए गिरा, क्योंकि भाजपा चाहती है कि सबका साथ-सबका विकास हो, लेकिन मुस्लिम विरोधी की छवि तो उसकी बनी ही हुई है। मंच से भी भाजपा नेताओं ने मुसलमानों को लेकर कई ऐसे बयान दिए, जिन्होंने उन्हें एकजुट किया। साथ ही इस बार कांग्रेस और सपा गठबंधन में थी, इसलिए मुसलमानों ने एकतरफा वोट दिया। 2019 के चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन को मुसलमानों का एकतरफा वोट नहीं मिला था।
पूर्वांचल के कुछ इलाकों में मुख्तार की मौत का असर भी हुआ, जिस वजह से मुस्लिम एकजुट हो गए। आजम खान के पूरे परिवार पर कार्रवाई भी इसी नाराजगी का हिस्सा रही। गुस्से का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चाहिए के 80 में से 23 सीटों पर मुस्लिम प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं के बाद भी मुसलमानों का एकतरफा वोट इंडी गठबंधन को मिल गया।
प्रश्न-5 : क्या राममंदिर-काशी कॉरिडोर के मुद्दे सहित ध्रुवीकरण का आधार भाजपा नहीं बना रही है?
उत्तर- राम मंदिर और काशी मार्ग भी भाजपा कार्यकर्ताओं को आकर्षित नहीं कर सका। 47 सीटों पर भाजपा ने शेयर को रीस्टार्ट किया, इससे नुकसान हुआ। अयोध्या में लल्लू सिंह हार गए, वाराणसी में मोदी की जीत का अंतर कम हुआ। इसके अलावा मुस्लिम अपने धर्म के नाम पर भारतीयों से निकलेंगे और इंडी गठबंधन को एकतरफा वोट देंगे। वहीं दूसरी ओर, वोटिंग का ध्रुवीकरण भाजपा के समर्थन में नहीं हुआ। वहीं, अखिलेश यादव की सोशल इंजीनियरिंग पर काम किया गया। अब कहा जा सकता है कि यूपी में राम मंदिर और काशी के फैक्टर ने काम नहीं किया।
प्रश्न-6 : क्या प्रगतिशील वोट इंडी गठबंधन में शिफ्ट हो गया? क्या संविधान पर गलत बयानबाजी भाजपा पर भारी पड़ रही है?
उत्तर- संविधान को लेकर अयोध्या से सांसद लल्लू सिंह ने बयान दिया था कि सरकार तो 275 सांसदों से बनेगी, लेकिन संविधान बदलने के लिए ज्यादा सांसदों की जरूरत होगी। कृपया संविधान बदल सकता है।
इस बयान को अखिलेश और राहुल गांधी ने इस तरह सबके सामने रखा कि अगर भाजपा 400 पार जाती है, तो वह संविधान बदल सकती है। हालांकि, बाद में मोदी ने नुकसान नियंत्रण करने के लिए कहा- अगर बाबा साहेब अंबेडकर स्वयं उतरें, तो भी संविधान नहीं बदला जा सकता। लेकिन इस रिपोर्ट से नुकसान नियंत्रित नहीं हो पाया। यही वजह है कि जो भ्रष्टाचार का मामला प्रकाश में आया है, उससे संदेश मिला है कि भाजपा इस बार सत्ता में आई है तो वह आरक्षण खत्म कर सकती है। यही वजह रही कि दलित और ओबीसी भाजपा में बदलाव नहीं होने जा रहा है।
प्रश्न- 7 : क्या मुफ्त राशन, मुफ्त आवास योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना काम नहीं आई?
उत्तर- कोरोना काल में कई सारे लोग बड़े स्तर पर चमत्कारिक ढंग से मरे। इसके नुकसान नियंत्रण के लिए मुफ्त राशन की सुविधा दी गई। हर साल यह योजना बढ़ती रही। प्रधानमंत्री आवास योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना भी काम नहीं आई। हवा योजना में दूसरी गैस पाइपलाइन खुद भरनी थी, आवास योजना में भी स्थानीय स्तर पर गैस पाइपलाइन सेटिंग अच्छी तरह से आवास मिल रही थी। जब तक जोफ्री थे, उन्हें काम करना चाहिए था। उधर, राहुल गांधी ने अपने घोषणापत्र में 10 किलो मुफ्त राशन देने का ऐलान किया था। जिसका असर भी देखा गया।
प्रश्न- 8 : यूपी में अबकी बार जातीय समीकरण ने कितना काम किया? ठाकुरों के दुख ने भाजपा को क्या नुकसान पहुंचाया?
उत्तर- हर बार की तरह इस बार भी यूपी में जातीय समीकरणों ने ही काम किया। इसके लिए इंडी गठबंधन ने पूरी तैयारी की। भाजपा ने मन-मुताबिक टिकट दिया। अखिलेश ने पीडीए का नारा दिया और खरीदारी के चयन में भी यही दिखा। अखिलेश ने 5 यादव, 27 ओबीसी, 4 ब्राह्मण, 2 ठाकुर, 2 वैश्य, 1 खत्री, 4 मुस्लिम और 17 दलितों को टिकट दिया। इस तरह यह समीकरण काम कर गया। जबकि भाजपा ने पिछले 10 सालों में ठाकुर रैंक में 50% की कटौती कर दी।
पूर्वांचल में ही लगभग 30 लाख ठाकुर वोटर हैं। ऐसे में ठाकुरों की निराशा का असर पश्चिम से लेकर पूर्वांचल तक दिखाई देता है। जौनपुर में धनंजय सिंह पर प्रेशर पॉलिटिक्स कर दिखने का टिकट वापस आ गया है। उनके भाजपा में जाने से भी ठाकुर वोट भाजपा में नहीं गया। प्रतापगढ़ में राजा भैया को नजरअंदाज कर भाजपा को नुकसान पहुंचाया गया। जिससे प्रतापगढ़, कौशांबी सीट पर भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा।
सवाल- 9 : जयंत चौधरी की आरएलडी से गठबंधन भी भाजपा के काम क्यों नहीं आया?
उत्तर- उत्साहित, ऐन चुनाव से पहले जयंत चौधरी ने पलटी मारते हुए भाजपा से हाथ मिलाया। यह गलत संदेश गया। वहीं किसान नेता टिकैट परिवार यूं तो जयंत का हिमायती है, लेकिन उसने अपने दंगों को संदेश दे दिया कि जहां मर्जी हो वहां वोट करें। हालांकि, बागपत और बिजनौर सीट पर आरएलडी का समर्थन भी किसान नेताओं ने किया है। लेकिन, स्थानीय राजनीति के चलते आरएलडी का समर्थन भाजपा को नहीं मिला।
सवाल-10 : अमेठी और रायबरेली सीट कांग्रेस जीत चुकी है, क्या अपने गढ़ को बचाने के लिए कांग्रेस की खास रणनीति थी?
उत्तर- नामांकन के वक्त कांग्रेस ने अंतिम समय तक अमेठी और रायबरेली का टिकट घोषित नहीं किया। इस कारण भाजपा नाराज थी। अंतिम समय में राहुल गांधी ने रायबरेली से नामांकन भरा और गांधी परिवार के करीबी केएल शर्मा ने अमेठी से चुनाव लड़ा। कांग्रेस ने इससे एक तीर से दो निशाने लगाए। एक तो स्मृति ईरानी से यह पहचान छीन ली कि वह राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं। दूसरा सोनिया के बाद राहुल का रायबरेली से लड़ने से जनता से उनका इमोशनल कनेक्ट हो गया। अमेठी में स्मृति ने केल शर्मा को उदास कर दिया, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।
प्रश्न-11 : मोदी के मंत्री भी हार गए, क्या उनके खिलाफ एंटी इंकलाबेंसी थी?
उत्तर- यूपी में इस बार पीएम मोदी को छोड़कर 11 केंद्रीय मंत्री चुनाव मैदान में थे। इसमें लखनऊ से रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, चंदौली से महेंद्र नाथ पांडे, आगरा से एसपी सिंह बघेल, मिर्जापुर से अनुप्रिया पटेल, अमेठी से स्मृति ईरानी, फतेहपुर से साध्वी निरंजन ज्योति, खीरी से अजय मिश्र टेनी, जालौन से भानु प्रताप वर्मा, मोहनलालगंज से कौशल किशोर, मुजफ्फरपुर से संजीव, जालौन से पंकज चौधरी बालियां शामिल हैं।

