अखिलेश के सामने भी भविष्य का सवाल
इस बहस में अखिलेश यादव की चुनौती भी कम नहीं है। बीजेपी के पुराने शासन वाले प्रचार का मुकाबला केवल अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाकर नहीं किया जा सकता। उन्हें अपनी सरकार की कमियों को स्वीकार करते हुए भरोसा देना होगा कि अगली बार कानून-व्यवस्था के मामले में राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक दबाव की गुंजाइश नहीं होगी। पीडीए की राजनीति को भी केवल सामाजिक समीकरण तक सीमित रखने के बजाय पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व और सम्मान का ठोस कार्यक्रम सामने रखना होगा।
राजनीतिक समीक्षक राजीव सिद्धार्थ के मुताबिक, चुनाव में दोनों सरकारों के कार्यकाल और भविष्य के वादों का मूल्यांकन होना चाहिए। किसी सरकार को केवल इसलिए जवाबदेही से छूट नहीं मिल सकती कि उससे पहले की सरकार खराब थी। आखिर बड़ा सवाल यही है कि करीब दस साल तक सत्ता में रहने वाली पार्टी को अपने पूर्ववर्ती शासन का डर दिखाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या यह अपनी ‘उपलब्धियों’ पर भरोसे की राजनीति है या मतदाताओं को वर्तमान के सवालों से हटाकर अतीत में उलझाए रखने की कोशिश?
2027 का चुनाव अतीत के कथित गुंडा राज और वर्तमान के दावों के बीच तुलना तक सीमित नहीं रहना चाहिए। मतदाता को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सामाजिक सद्भाव और कानून के राज पर दोनों दलों से जवाब मांगना चाहिए। वोट देने के अधिकार पर खतरा तो आज सबसे बड़ा सवाल बन चुका है। अखिलेश को अपने पांच साल का हिसाब देना होगा तो योगी सरकार को अपने लगभग दस साल का।
लोकतंत्र में सरकारें केवल यह बताकर जवाबदेही से नहीं बच सकतीं कि उनसे पहले वाले खराब थे। आखिर सरकारें अतीत के डर से नहीं, भविष्य के भरोसे से चुनी जाती हैं।




