ट्रम्प ने अगर ईरान में रेजिम बदले बिना जंग अधूरी छोड़ी, तो दुनिया में क्या होगा?


जब कोई महाशक्ति इतने विस्तृत सैन्य अभियान में उतरती है, तो सवाल उठता है, आखिर उसने क्या पाया? ईरान के खिलाफ अमेरिका की यह लंबी जंग अब उसी सवाल के घेरे में आ खड़ी हुई है. पूरी दुनिया को ऊर्जा संकट में धकेलने से क्या फायदा हुआ? क्या यह युद्ध सिर्फ ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई को निशाना बनाने तक सीमित था? यही प्रश्न आज वैश्विक चर्चा का केंद्र बन चुके हैं.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 28 फरवरी 2026 से लगातार यह दावा किया कि दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाएं उनके पास हैं. लेकिन अब वही ट्रम्प अपने सहयोगियों से युद्ध में उतरने के लिए समर्थन मांगते नजर आ रहे हैं. कुछ समय पहले तक वे यूरोपीय संघ से जुड़े ग्रीनलैंड पर नियंत्रण को लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए थे. नाटो सहयोगियों की खुली आलोचना की और चेतावनी दी. आज उन्हीं ट्रम्प को स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को खुलवाने के लिए उन्हीं सहयोगियों की मदद चाहिए.

सहयोगियों की प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से ठंडी रही. जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने साफ कहा, “यह हमारी जंग नहीं है, हमने इसे शुरू नहीं किया।” यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने भी संकेत दिया कि वे ब्रिटेन को पश्चिम एशिया के “व्यापक युद्ध” में घसीटने की अनुमति नहीं देंगे. हालांकि स्टार्मर ने यह भी कहा कि यूरोपीय सहयोगियों के साथ मिलकर होर्मुज को फिर से खोलने के लिए एक “व्यवहार्य योजना” पर काम चल रहा है.

अमेरिका के इरादे बड़े थे, लेकिन परिणाम निराशाजनक. अगर लक्ष्य ईरान में रेजीम चेंज था, तो वह मकसद अधूरा नजर आता है. अली खामेनेई के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता बना दिया गया है. अगर परमाणु कार्यक्रम के ढांचे को पूरी तरह नष्ट करना था, तो 13 से 24 जून 2025 के बीच चले 12 दिनों के संघर्ष में क्या हासिल हुआ? 22 जून 2025 के “मिडनाइट हैमर” ऑपरेशन का कौन सा लक्ष्य अधूरा रह गया?

तेल पर नियंत्रण, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर प्रभुत्व, इजराइल की सुरक्षा के लिए ईरान की मिसाइल क्षमता को खत्म करना — इनमें से कोई भी लक्ष्य पूरा होता नहीं दिख रहा. 16-17 मार्च 2026 की रात को ईरान ने “सेज्जिल” जैसी बैलिस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल किया, जिसे “डांसिंग मिसाइल” कहा जा रहा है. इतने बड़े सैन्य टकराव के बावजूद अमेरिका अपने घोषित या वास्तविक लक्ष्यों को हासिल कर पाया या नहीं? या यह संघर्ष अब एक लंबी, अनिश्चित और थकाऊ दिशा में बढ़ रहा है?

ईरानी रेजीम के तीन मजबूत स्तंभ
“रेजीम चेंज” पूरे युद्ध में हावी रहा है. वर्तमान ईरानी रेजिम की ताकत तीन प्रमुख स्तंभों पर टिकी हुई है. पहला उसकी वैचारिक और राजनीतिक संरचना, यानी “शिया इस्लामिक रेजिम”. दूसरा इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC). तीसरा — उसका हथियारबंद प्रॉक्सी नेटवर्क. ये तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं, एक कमजोर पड़ता है तो दूसरा उसे संभाल लेता है.

ट्रम्प का दावा है कि उन्होंने ईरान की नौसेना को भारी नुकसान पहुंचाया, लेकिन स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज फिर भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो पाया. असल समस्या पारंपरिक सैन्य ताकत से नहीं, बल्कि प्रॉक्सी नेटवर्क को कमजोर किए बिना हल नहीं हो सकती. ईरान हिजबुल्लाह (लेबनान), इराक-सीरिया के शिया मिलिशिया, हूथी (यमन) और गाजा के संगठनों के जरिए क्षेत्रीय संतुलन को चुनौती देता है.

केवल हवाई हमले काफी नहीं
अमेरिका और इजराइल मुख्य रूप से हवाई हमलों पर निर्भर हैं. न्यूक्लियर साइट्स, मिसाइल बेस और कमांड सेंटर निशाने पर हैं. लेकिन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने सही कहा — “आसमान से रेजिम नहीं बदली जा सकती .” हवाई हमले नुकसान पहुंचा सकते हैं, पर किसी देश पर वास्तविक नियंत्रण के लिए जमीनी सैन्य मौजूदगी (ग्राउंड फोर्स) अनिवार्य है. ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और ‘ऑपरेशन लायन रोअर’ की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि इनमें पैदल सेना का अभाव है. IRGC हवाई हमलों से कमजोर जरूर होती है, लेकिन पूरी तरह नष्ट नहीं होती. बिना जमीनी कार्रवाई के वह फिर से संगठित हो जाती है.

अधूरा युद्ध छोड़ने का भयावह परिणाम
अगर अमेरिका बीच में युद्ध छोड़कर निकल जाता है, तो इसका असर केवल सैन्य स्तर तक सीमित नहीं रहेगा. यह एक बड़े भू-राजनीतिक झटके में बदल जाएगा. ईरानी रेजिम खुद को “सर्वाइवर” और “विजेता” के रूप में पेश करेगी. इससे आंतरिक विरोध कमजोर होगा और शासन की वैधता बढ़ेगी.

प्रॉक्सी नेटवर्क और अधिक आक्रामक हो जाएगा. हिजबुल्लाह, हूथी और शिया मिलिशिया क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करेंगे. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर अनिश्चितता स्थायी हो जाएगी. तेल की आपूर्ति बाधित होगी, कीमतें आसमान छूएंगी और वैश्विक महंगाई बढ़ेगी.

इजराइल की सुरक्षा और जटिल हो जाएगी. उसे अकेले ही ईरान, लेबनान, गाजा और सीरिया के कई मोर्चों पर दबाव झेलना पड़ेगा. अमेरिका की वैश्विक साख पर गहरा आघात लगेगा. नाटो सहयोगियों का साथ न मिलना इसी का प्रमाण है. यूरोप से लेकर एशिया-प्रशांत तक उसके साझेदारों का भरोसा डिगेगा.

यह स्थिति एक “पावर वैक्यूम” पैदा करेगी जिसे रूस और चीन तुरंत भरने की कोशिश करेंगे. मध्य-पूर्व में उनका प्रभाव बढ़ेगा और वैश्विक शक्ति संतुलन अमेरिका के खिलाफ झुक जाएगा.

सबसे बड़ा खतरा यह है कि संघर्ष खत्म नहीं होगा, बल्कि “लो-इंटेंसिटी, हाई-इम्पैक्ट” युद्ध में बदल जाएगा. छोटे-छोटे हमले, प्रॉक्सी वॉर, ड्रोन स्ट्राइक और समुद्री टकराव लगातार जारी रहेंगे. अस्थिरता लंबे समय तक बनी रहेगी. अमेरिका अगर युद्ध को अधूरा छोड़ता है, तो वह न तो पूरी जीत हासिल कर पाएगा, न पूरी हार स्वीकार करेगा. लेकिन एक ऐसी अनिश्चितता पैदा करेगा जहां शांति नहीं, बल्कि लगातार बढ़ता जोखिम ही बचा रहेगा. इतिहास गवाह है “अधूरी जंगें कभी शांति नहीं लातीं, वे केवल नई जंगों की नींव रखती हैं”

यह युद्ध अब सिर्फ ईरान-अमेरिका का नहीं रह गया है. यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और महाशक्तियों के भविष्य का सवाल बन चुका है. सवाल अब यही है, क्या अमेरिका इस जंग को पूरा करने का साहस रखता है, या इतिहास में एक और अधूरी महाजंग के रूप में दर्ज हो जायेगी?



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