अमेरिका-ईरान की डील के बीच रोड़ा बना ये ‘न्यूक्लियर डस्ट’ क्या है? ट्रंप की आंखों में क्यों चुभ रहा


अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चले आ रहे संघर्ष को समाप्त करने के लिए हाई लेवल बातचीत का दौर जारी है. लेकिन इस बार इन बातचीत के केंद्र में एक नया शब्द उभरा है- ‘न्यूक्लियर डस्ट’, जिसका हिंदी में तर्जुमा- परमाणु धूल होगा. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से इस्तेमाल किया गया यह शब्द ईरान के संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) के भंडार को दर्शाता है. विशेष रूप से उस एनरिच्ड सामग्री को, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेहरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता का मुख्य कारण रही है. हालांकि ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि ईरान यह ‘न्यूक्लियर डस्ट’ वापस करने के लिए तैयार है, लेकिन जमीनी हकीकत में यह मुद्दा अब भी समझौते की राह में सबसे बड़ी बाधा ही बना हुआ है. ये न्यूक्लियर डस्ट आखिर होता क्या है, आइए समझते हैं.

आखिर क्या है ‘न्यूक्लियर डस्ट’?
सबसे पहले तो यह समझना होगा कि ‘न्यूक्लियर डस्ट’ कोई तकनीकी शब्द नहीं है, बल्कि यह ईरान के यूरेनियम भंडार को संबोधित करने के लिए ट्रंप का अपना तरीका है. इसमें वह सामग्री भी शामिल है जो अमेरिकी हवाई हमलों के दौरान नष्ट हुई साइट्स के मलबे में दबी हो सकती है. ट्रंप ने कहा, ‘यूरेनियम को एनरिच नहीं किया जाएगा. हम ईरान के साथ मिलकर गहराई में दबी हुई उस तमाम न्यूक्लियर डस्ट को खोदकर बाहर निकालने और हटाने के लिए काम करेंगे.’

तकनीकी रूप से इसका मतलब उस ‘फिसाइल मटेरियल’ से है, जिसे नागरिक उपयोग की सीमा से कहीं अधिक समृद्ध किया गया है. जून 2025 में इजरायल और अमेरिका की तरफ से हुए हमलों से पहले, ईरान के पास 400 किलोग्राम एनरिच यूरेनियम 60 प्रतिशत तक और 200 किलोग्राम एनरिच यूरेनियम 20 प्रतिशत तक होने का अनुमान था. इसे 90 फीसदी तक रिफाइन्ड कर आसानी से ‘वेपन्स ग्रेड’ यानी हथियार बनाने के योग्य बनाया जा सकता है.

अमेरिका के लिए यह भंडार क्यों महत्वपूर्ण है?
वॉशिंगटन के लिए ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम सुरक्षा की दृष्टि से सबसे बड़ा खतरा है. अमेरिका का ऐसा मानना है कि भले ही ईरान के पास अभी परमाणु हथियार ना हों, लेकिन उसके पास मौजूद भंडार उसे कम समय में ही हथियार विकसित कर लेने की क्षमता जरूर देता है.

व्हाइट हाउस की प्रवक्ता ओलिविया वेल्स ने स्पष्ट किया कि प्रशासन ‘ईरान को कभी भी परमाणु हथियार नहीं रखने देगा.’ वहीं उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस्लामाबाद में हुई बातचीत के बाद कहा, ‘ईरान का यह कहना एक बात है कि वे अब हथियार नहीं बनाएंगे, लेकिन इसे सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत मैकेनिज्म स्थापित कर पाना दूसरी बात है.’

संवर्धन पर ईरान का पक्ष क्या है?
ईरान के लिए यूरेनियम संवर्धन का मुद्दा किसी तरह की बातचीत या बदलाव की संभावना से परे है. तेहरान का तर्क है कि उसका कार्यक्रम एनर्जी प्रोडक्शन जैसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है. ईरान के एक सीनियर अधिकारी के अनुसार, ऐसा कोई विकल्प नहीं है, जिसमें ईरान यूरेनियम संवर्धन को पूरी तरह से बंद करने पर सहमत हो. अमेरिका की तरफ से ‘पूर्ण रोक’ की मांग और ईरान की ‘संवर्धन जारी रखने’ की जिद ही इस गतिरोध की मुख्य वजह है.

कहां छिपा है यह भंडार?
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) महानिदेशक राफेल ग्रोसी के अनुसार, ईरान की परमाणु सामग्री मुख्य रूप से इस्फहान परमाणु परिसर की एक अंडरग्राउंड सुरंग और नतांज के एक भंडार में स्थित है. ऐसा माना जा रहा है कि इस भंडार का एक बड़ा हिस्सा उस पहाड़ी ठिकाने के मलबे के नीचे दबा है, जिसे हवाई हमलों के दौरान निशाना बनाया गया था.

किन मुद्दों पर है असहमति
बातचीत में नजर आ रही तेजी के संकेतों के बावजूद दोनों पक्षों के बीच गहरी खाई मौजूद है. सबसे पहली बात समयसीमा को लेकर है. अमेरिका यूरेनियम एनरिचमेंट पर 20 साल के लंबे समय के लिए रोक की मांग कर रहा है, जबकि ईरान 3 से 5 साल की छोटी अवधि का प्रस्ताव दे रहा है. दूसरा मुद्दा भंडार के निपटान को लेकर है. अमेरिका चाहता है कि यह सामग्री ईरान की धरती से बाहर ले जाई जाए.

डोनाल्ड ट्रंप ने सुझाव दिया है कि इसे अमेरिका लाया जा सकता है. उन्होंने कहा, ‘हम बड़े पैमाने पर उत्खनन करने वालों के साथ ईरान जाएंगे और उस सामग्री को जल्द ही वापस अमेरिका लाएंगे.’ रूस ने भी इस भंडार को अपने संरक्षण में लेने और उसे नागरिक ईंधन में बदलने का प्रस्ताव दिया था, जिसे अमेरिका ने ठुकरा दिया.

क्या ऊर्जा के लिए ईरान को संवर्धन की जरूरत है?
ईरान का दावा है कि उसे 2041 तक 20 गीगावाट परमाणु बिजली की आवश्यकता है. हालांकि ऊर्जा एक्सपर्ट्स का गणित कुछ और ही कहता है. ईरान के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस और तेल भंडार है, जिससे बिजली बनाना परमाणु ऊर्जा की तुलना में बेहद सस्ता है. वर्तमान में ईरान की बिजली आपूर्ति में परमाणु ऊर्जा का योगदान केवल एक प्रतिशत का ही है.

‘न्यूक्लियर डस्ट’ का मुद्दा केवल विज्ञान का ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा की लड़ाई बन गया है. दोनों पक्ष जब तक इस भंडार के भविष्य पर एकमत नहीं होते, तब तक एक व्यापक शांति समझौते की उम्मीद धुंधली ही रहेगी. अब सभी की निगाहें सोमवार 20 अप्रैल को इस्लामाबाद में होने वाली अगले दौर की बातचीत पर टिकी हुई है.



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