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आगरा में जंगलों के बीच मौजूद एक पुरानी इमारत आज भी लोगों की जिज्ञासा बढ़ाती है. श्याम कुटी के नाम से पहचानी जाने वाली इस इमारत को लेकर अजीब आवाजें सुनाई देने और आकृतियां दिखने के किस्से प्रचलित हैं. यहां की दीवारों पर हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में धार्मिक पंक्तियां भी लिखी हुई हैं.
आगरा के कैलाश मार्ग पर जंगलों के बीच स्थित श्याम कुटी अपनी रहस्यमयी कहानियों को लेकर चर्चा में रहती है. देवकी बाबा के मुताबिक, इस इमारत का निर्माण अंग्रेजों के दौर में धौलपुर के एक राजा के यहां तैनात मंत्री श्याम ने कराया था. बाद में यह इमारत लंबे समय तक वीरान रही और अब इसकी हालत भी जर्जर हो चुकी है.
स्थानीय लोगों के बीच श्याम कुटी को लेकर कई डरावने किस्से प्रचलित हैं. कहा जाता है कि करीब 50 साल पहले यहां अजीब आवाजें सुनाई देने और सफेद कपड़ों में आकृतियां दिखाई देने के दावे किए गए थे. देवकी बाबा ने भी अपने शुरुआती दिनों में ऐसी आवाजें सुनने और आकृतियां दिखाई देने का अहसास होने की बात बताई.
इमारत के बीचों-बीच कई भाषाओं में धार्मिक मंत्र और पवित्र पंक्तियां लिखी हुई हैं. देवकी बाबा के अनुसार, हिंदी में हिंदू धर्म से जुड़े मंत्र, अंग्रेजी में ईसाई धर्म की प्रार्थनाएं और उर्दू में कुरान की आयतें लिखी गई हैं. बताया जाता है कि इन्हें नकारात्मक शक्तियों को दूर करने और कथित भटकती आत्माओं की मुक्ति के उद्देश्य से लिखा गया था.
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श्याम कुटी के लंबे समय तक सुनसान रहने, आसपास जंगल होने और इससे जुड़ी कहानियों के कारण लोगों में आज भी इसे लेकर डर बना हुआ है. कुछ लोग शाम ढलने के बाद यहां जाने से बचते हैं. हालांकि, यहां कथित भूत-प्रेत की घटनाओं की कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन स्थानीय किस्से इस पुरानी इमारत को आज भी रहस्यमयी बनाए हुए हैं.
आगरा की श्याम कुटी से जुड़ी एक और कहानी यहां रहने वाले महात्मा से संबंधित है. देवकी बाबा के मुताबिक, एक महात्मा करीब 15 वर्ष की उम्र में यहां रहने आए थे. उन्होंने अपना पूरा जीवन इसी स्थान पर बिताया और करीब 70 वर्ष की उम्र में यहीं उनका निधन हो गया. बाबा बताते हैं कि वह महात्मा भी यहां अजीब आवाजें सुनाई देने और आकृतियां दिखाई देने की बातें करते थे.
श्याम कुटी के वीरान होने के पीछे भी एक कहानी बताई जाती है. देवकी बाबा के अनुसार, इमारत का निर्माण कराने वाले मंत्री श्याम की कोई संतान नहीं थी. इसी वजह से कुछ समय बाद यह भवन वीरान हो गया और लंबे समय तक बंद पड़ा रहा. बाद में यहां धार्मिक अनुष्ठान किए जाने और अलग-अलग भाषाओं में धार्मिक पंक्तियां लिखे जाने की बात कही जाती है. हालांकि, इन मान्यताओं और कथित घटनाओं की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है.




