नई दिल्ली. वैश्विक तनावों के बीच आज (9 मई 2025) से ठीक पांच दिन बाद अमेरिकी सदर डोनाल्ड ट्रंप चीनी सरजमीं पर होंगे. वैसे उनका ये शासकीय दौरा बीते मार्च महीने में तय था, लेकिन तेहरान के साथ जंगी तनातनी के चलते इसे टाल दिया गया था. जब ड्रैगन और ईगल आमने सामने हो तो ये दुनिया के लिए काफी अहम मायने रखता है. मौजूदा हालातों में शी जिनपिंग और ट्रंप की मुलाकात अपने आप में कई कूटनीतिक राज समेटे हुए है. काबिल-ए-गौर है कि ईरान के खिलाफ कथित जीत के बाद अमेरिकी सदर ने चीन जाने का मन बनाया. तेहरान के खिलाफ मोर्चाबंदी अमेरिकी उम्मीद से ज्यादा लंबी खिंच गयी. कयास लगाए जा रहे है कि अंकल सैम और पांडा एक दूसरे से मुखातिब होंगे तो बातचीत होर्मुज की नाकेबंदी से शुरू होकर ताइवान तक जरूर जायेगी. इसके अलावा तिज़ारती तालुक्कात और कई भू-राजनीतिक मसलों पर भी साझा रायशुमारी होगी.
रेयर अर्थ मिनरल्स रहेगा अहम मुद्दा
अमेरिकी सदर के इस दौरे की कड़ियां उनकी टैरिफ की धमकियों से जुड़ी नज़र आ रही है. गौरतलब है कि खनिज खासतौर से दुर्लभ भूगर्भीय खनिजों के प्रसंस्करण में चीनियों का खासा महारत हासिल है. इन खनिजों का इस्तेमाल कई आधुनिक तकनीकों में विशेषतौर पर रक्षा उत्पादों के निर्माण में किया जाता है. बीते साल के दरम्यान जब ओवल ऑफिस ने ज्यादा टैरिफ थोपने की धमकी दी तो चीनी हुक्मरानों ने इन खनिज़ों का निर्यात रोककर अंकल सैम को करारा ज़वाब दिया था. ज़ाहिर है वैश्विक वर्चस्वादी खेल अब एक तरफा नहीं रहा. आर्थिक और तकनीकी मोर्चे पर ट्रंप का रूख़ साफ है कि वो मेटा, गूगल, बोइंग, लॉकहीड मार्टिन, आरटीएक्स, नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन और जनरल डायनेमिक्स जैसी कंपनियों के साथ मजबूती से खड़े है. तकनीक खुद में संवेदनशील मुद्दा है, इसी बात को केंद्र में रखते हुए व्हाइट हाउस के फरमान पर पेंटागन ने कई ऐसी अमेरिकी कंपनियों को ब्लैक लिस्ट कर दिया जिनके कारोबारी रिश्ते प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर पीएलए के साथ थे. इनमें टिकटॉक, हुआवेई, अलीबाबा, टेनसेंट, बाइडू और बीवायडी जैसी नामचीन कंपनियां शामिल है. इनमें से कुछ चीनी कंपनियों से बाद में अमेरिकी प्रतिबंध हटा लिया गया. कुछ पर अभी भी आंशिक रूप से प्रतिबंध लगा हुआ है. अगर चीनी पक्ष की ओर से देखा जाए तो चीनी मूल के उद्यमी श्याओ होंग की अगुवाई में विकसित दुनिया का पहला जनरल पर्पस एआई एजेंट मानुस के अमेरिकी अधिग्रहण को रोक दिया गया. मेटा इसे अधिग्रहीत करने वाली थी लेकिन चीनी नीति-नियंताओं ने मौजूदा हालातों में इन संभावनाओं पर पूरा विराम लगा दिया. इस प्रकरण से साफ है कि तकनीकी खेल में अब वाशिंगटन का एक तऱफा दबदबा जल्द ही दफ़न होने के मुहाने पर है.
होर्मुज स्ट्रेट खुलवाने की अपील कर सकता है ड्रैगन
ट्रंप के इस दौरे के दौरान अमेरिकी कंपनियां भी अपने लिए चीन में संभावनाएं तो खोजेंगी साथ ही चीन अपनी वाज़िब चिंताओं से अमेरिकी सदर को अवगत करवायेगा. जिसके तहत बीजिंग होर्मुज स्ट्रेट वाला मुद्दा ट्रंप के सामने रखेगा. बीती रात आईआरजीसी और अमेरिकी मरीन्स के बीच हुई गोलाबारी के बावजूद पश्चिम में संघर्ष विराम लागू है. लेकिन जंग का खतरा अभी टला नहीं है. ये चीन के लिए काफी मायने रखता है. होर्मुज के समुद्री रास्ते से कच्चे तेल का इम्पोर्ट होता है, जो कि चीनी जरूरतों के बड़े हिस्से को पूरा करता है. इसके अलावा बीजिंग तेहरान और क्रेमलिन से भी कच्चा तेल सीधे खरीदता है. ऐसे में अगर मध्य एशिया के हालात नहीं सुधरते है तो चीन की निर्भरता मॉस्को पर जरूरत से ज्यादा बढ़ जायेगी. इस बिंदु पर बीजिंग कुछ ठोस आश्वासन वाशिंगटन से चाहेगा. होर्मुज में चल रही दोहरी नाकेबंदी के बीच नई दिल्ली, इस्लामाबाद और बीजिंग के कई जहाज इस रास्ते से होकर निकले क्योंकि तेहरान इन तीनों को दोस्ताना मुल्क मानता है. हालांकि जब से अमेरिकी सैन्य बलों ने ओमान की खाड़ी में कड़ी हथियारबंद नाकेबंदी की है, तब से कोई भी चीनी तिज़ारती जहाज़ इस रास्ते से होकर नहीं गुजरा.
कूटनीतिक संतुलन बनाने में शी जिनपिंग आगे
बीजिंग और तेहरान की रिश्ता काफी पेचीदा है, इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए. अगर इसे समझना हो तो इस पर बारीक से नज़र रखनी होगी. तेहरान अपनी जरूरतों का लगभग एक तिहाई हिस्सा बीजिंग से आयात करता है. जबकि ईरान से चीन को होने वाला ईरानी निर्यात महज़ 1 फीसदी ही है. तेहरान कई योजनाओं और मंचों से चीन से जुड़ा हुआ है मिसाल के तौर पर बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव, शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स. शी ये अच्छे से जानते है कि ईरान के अलावा दूसरे खाड़ी मुल्कों समेत अमेरिकी से अपनी निष्ठा और कूटनीतिक तालुक्कात किस तरह से संतुलित रखने है. गौरतलब है कि जब भी बात कारोबार, आर्थिक गतिविधियों और राजनयिक संबंधों की आती है तो इस मायने में चीन अमेरिका के मुकाबले कहीं ज्यादा व्यावहारिक है. यही वो केंद्रबिंदु है, जिसकी बुनियाद पर हम आकलन कर सकते है कि ट्रंप का बीजिंग दौरा होगा तो दोनों महाशक्तियों के बीच विमर्श का नैरेटिव क्या होगा?.
संयुक्त राष्ट्र का खास कानून से बंधा चीन
ऊर्जा संरक्षण के नजरिए से बीजिंग के लिए होर्मुज अहम है, इसके चलते उसके कारोबार बड़ा हिस्सा प्रभावित होने के कगार पर है. चीन ने संयुक्त राष्ट्र के विशेष अधिनियम समुद्री पथ कानून को हरी झंडी दे रखी है, जबकि वाशिंगटन और तेहरान ने ऐसी कोई मंजूरी नहीं दी. ये मसला होर्मुज समस्या से कहीं ज्यादा पेचीदा है. पूर्वी एशिया और चीन तक पहुंचने वाली 70 फीसदी ऊर्जा ढुलाई और समुद्री कारोबार को अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरना पड़ता है. ऐसे में ये समुद्री रास्ता कई पूर्वी एशियाई मुल्कों समेत ड्रैगन के लिए काफी ज्यादा अहम है.
दबदबा और वर्चस्व कायम करने की जुगत में बीजिंग
हाल ही में शी जिनपिंग ने खुद को विश्वसनीय वैश्विक शांति अगुवा घोषित किया. इस कथित आत्मुग्धता के चलते उन्होंने तेहरान जंग के दौरान दखल देने की कोशिश की, साथ ही कई बहुपक्षीय करारनामों और अमेरिका के साथ टैरिफ विवाद में भी उन्होंने काफी कड़े तेवर अख्तियार किए. यानि कि शी ऐसा कोई भी मौका नहीं छोड़ते जब वो अमेरिका के सामने खुद को मजबूती से खड़ा दिखा सके. इसी फेहरिस्त में शी ने कई खाड़ी मुल्कों और यूरोपीय देशों को आश्वासन दिया था कि मध्य पूर्व चल रही तनातनी का कोई ना कोई ठोस कूटनीतिक हल ढूढ़ने की कोशिश करेंगे। हाल ही में ईरान विदेशमंत्री अब्बास अराघची चीन पहुंचे, जहां उन्होंने अपने समकक्ष वांग यी को ज़मीनी हालातों से रूबरू करवाया. उस मुलाकात की खास बात ये रही कि बीजिंग में चीन से बातचीत करते हुए अब्बास अराघची ने अपने सऊदी समकक्ष प्रिंस फैसल बिन फरहान से भी बातचीत की. कई जानकार ये मानते है कि अब्बास अराघची की प्रिंस फैसल बिन फरहान से टेलीफोन पर हुई बातचीत चीन के इशारे पर हुई थी. चीनी एजेंडा साफ है कूटनीतिक बढ़त हासिल करने, दबदबा बनाने और वर्चस्व कायम करने का कोई भी मौका खाली ना जाए. ऐसे चीन खुद को ऐसे पेश कर रहा है कि अगर वो शांति कायम करने में नाकाम रहा तो कम से कम जंगी खेमे से वो खुद को दूर दिखा सके. इस रणनीति पर काम करके वो अमेरिका से आगे दिखने की फिराक में है.
विश्वसनीय मध्यस्थ बनने की कोशिश में चीनी हुक्मरान
वैश्विक पटल पर खुद को विश्वसनीय मध्यस्थ दिखाने में चीन पूरी ताकत झोंक रहा है. हालांकि ये भी सच्चाई है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अमेरिकी-इजरायली-ईरानी जंग का थमना जरूरी है. इसके कारण उर्वरकों की आवक, कच्चे तेल की ढुलाई, एलएनजी- पेट्रोकेमिकल्स की सप्लाई चैन और एल्युमिनियम की आपूर्ति पर बुरा असर पड़ा. इससे महंगाई बढ़ने के साथ ही ऊर्जा प्रवाह और खाद्य सुरक्षा में भी भारी रूकावट आयी है.
कई मुद्दों का नहीं निकलेगा हल
इन सबसे हटकर ताइवान मुद्दा आता है. ये सहज़ है कि ट्रंप और शी ईरान समेत कई मुद्दों पर साझा आपसी समझ और सहमति बन लेंगे. दोनों नेता उन सभी मसलों पर काम करने की कवायद भी शुरू कर सकते है, जो दोनों के बीच लगभग एक जैसी है मसलन कारोबार, भू-राजनीतिक मुद्दे, तकनीकी हस्तांतरण और हरित विकास. बावजूद इन सबके ताइवान दोनों के दरम्यान गर्म मुद्दा बना रहेगा. आने वाले कल में भी ये वो ज्वलंत मुद्दा बन रहेगा जो कि दोनों के लिए गले में फंसी हड्डी के मानिंद होगा. दुनिया समेत अमेरिका को चीन से दुर्लभ भूगर्मीय खनिज और माइक्रोचिप प्रोसेसर में एडवांस्ड टेक्नोलॉजी की दरकार है. जबकि चीन की जरूरत वो द्वीपीय देश है, जिसे वो अपनी अखंड़ता और अक्षुण्णता का जरूरी हिस्सा मानता है. ऐसे में साफ है कि दोनों दिग्गज़ राजनेताओं के बीच कई तरह की मुद्दे उठेंगे, चर्चायें होगीं, विर्मश होगा लेकिन ट्रंप के इस चीन दौरे से पुख्ता तौर पर कई मुद्दों का हल स्वाभाविक तौर पर नहीं निकलेगा.





