नई दिल्ली: अमेरिका की डेथ वैली दुनिया की सबसे गर्म और सूखी जगह मानी जाती है. यहां गर्मियों में हालात बेहद खराब हो जाते हैं. नॉर्मल दिनों में यहां का टेम्परेचर 49 डिग्री सेल्सियस तक रहता है. कई बार यह 56.7 डिग्री के रिकॉर्ड लेवल तक भी पहुंच चुका है. इतनी भयानक गर्मी में किसी भी जीव या पौधे का जिंदा रहना लगभग नामुमकिन है. लेकिन प्रकृति हमेशा हमें अपने चमत्कारों से हैरान कर देती है. डेथ वैली में एक ऐसा खास प्लांट पाया जाता है जो इस आग उगलती गर्मी को भी मात दे देता है. इस प्लांट का नाम टाइडेस्ट्रोमिया ऑबलॉन्गीफोलिया है. इसे एरिजोना हनीस्वीट भी कहा जाता है. हाल ही में हुई एक नई रिसर्च में इस प्लांट को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है. यह पौधा 60 डिग्री सेल्सियस जैसी जानलेवा गर्मी में भी खुद को चिल रख सकता है.
डेथ वैली की आग उगलती गर्मी में यह पौधा अपना बचाव कैसे करता है?
डेथ वैली कैलिफोर्निया और नेवादा के कुछ हिस्सों में फैला एक बड़ा रेगिस्तान है. यहां का मौसम इतना कठोर होता है कि बड़े हिस्से में कोई भी पौधा नहीं उग पाता है. जब हम गर्मी सहने वाले जीवों के बारे में सोचते हैं तो सबसे पहले माइक्रोब्स का ख्याल आता है. माइक्रोब्स गर्म पानी के झरनों या समुद्र की गहराइयों में आसानी से पनपते हैं. लेकिन किसी भी बड़े और जटिल पौधे के लिए एक्सट्रीम गर्मी बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल होता है.
जटिल पौधों और जानवरों के शरीर में कई सारे पार्ट्स काम करते हैं. इन सभी पार्ट्स को इतनी ज्यादा गर्मी में एक साथ चलाना बहुत मुश्किल काम है. एरिजोना हनीस्वीट एक कांटेदार और फूल वाला पौधा है. यह इस भयानक गर्मी के माहौल में भी बहुत अच्छी तरह से ढल चुका है. यह प्लांट अपने आस-पास की गर्म हवा के मुकाबले अपनी पत्तियों को काफी ठंडा रख सकता है. यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है. यह खूबी इसे 60 डिग्री के टेम्परेचर में भी जिंदा रखती है. यह तापमान किसी भी जटिल जीवन के लिए एक ऊपरी लिमिट माना जाता है.
वैज्ञानिकों ने इस खास प्लांट के रहस्य को समझने के लिए क्या एक्सपेरिमेंट किया?
इस पौधे की गजब की क्षमता को समझने के लिए रिसर्चर्स ने एक एक्सपेरिमेंट किया. उन्होंने डेथ वैली और अन्य जगहों से इस जंगली पौधे के बीज इकट्ठा किए.
- वैज्ञानिकों ने कुल 223 पौधों से ये बीज निकाले थे. इसके बाद उन्होंने 1200 से ज्यादा छोटे पौधों को एक बहुत ही मुश्किल हीट टेस्ट से गुजारा.
- इन पौधों को धीरे-धीरे गर्मी सहने की आदत डाली गई. इसके बाद इन सभी पौधों को हर दिन छह से आठ घंटे तक 60 डिग्री सेल्सियस की गर्मी में रखा गया. यह सिलसिला एक हफ्ते से ज्यादा समय तक चला.
- इस भयंकर टेस्ट में हर पौधा जिंदा नहीं बच सका. पौधों के जेनेटिक्स के आधार पर उनके बचने का चांस 2 प्रतिशत से लेकर 34 प्रतिशत तक रहा. इस डेटा से यह पता चलता है कि कुछ पौधे गर्मी सहने में दूसरों से ज्यादा मजबूत होते हैं.
- रिसर्चर्स ने इन्फ्रारेड कैमरों का इस्तेमाल करके इन पौधों की निगरानी की. उन्होंने देखा कि सबसे गर्म दिनों में कुछ पत्तियों का टेम्परेचर हवा से 10 डिग्री तक कम था.
- सबसे हैरान करने वाले मामलों में पत्तियों का तापमान हवा से 13 डिग्री तक कम दर्ज किया गया.
लगातार 60 डिग्री टेम्परेचर सहने के बाद भी यह प्लांट कूल कैसे बना रहता है?
इस एक्सपेरिमेंट के दौरान पौधे लगातार आठ दिनों तक 60 डिग्री की गर्मी में रहे. इसके बाद भी जिंदा बचे पौधों ने अपनी पत्तियों का तापमान 54 डिग्री से 59 डिग्री के बीच बनाए रखा. यह टेम्परेचर भी बहुत ज्यादा होता है लेकिन यह जटिल जीवन के लिए खतरनाक लिमिट से थोड़ा नीचे है. प्लांट खुद को कितना ठंडा रख पाता है इसी बात से उसकी जिंदगी और मौत तय होती है.
इस रिसर्च में यह साफ हो गया कि यह पौधा सिर्फ गर्मी बर्दाश्त नहीं कर रहा था. यह पौधा एक्टिव रूप से खुद को ठंडा करके गर्मी से बच रहा था.
पुरानी रिसर्च से पता चलता है कि यह क्षमता माइटोकॉन्ड्रिया और क्लोरोप्लास्ट के आपस में जुड़ने से मिलती है. इस प्रोसेस के कारण क्लोरोप्लास्ट अपना आकार बदल लेते हैं. वैज्ञानिकों ने इस पावरफुल कूलिंग सिस्टम के पीछे की बायोलॉजिकल मशीनरी को खोजने के लिए गहराई से जांच की. उन्होंने पूरे जीनोम का एनालिसिस किया. इसमें डीएनए के तीन ऐसे रीजन मिले जो गर्मी में जिंदा रहने से जुड़े थे. इससे पता चलता है कि इस क्षमता का आधार जेनेटिक है. ठंडी और गर्म पत्तियों के बीच भी साफ अंतर देखने को मिला.
कैलिफोर्निया की डेथ वैली में उगने वाले T. oblongifolia की तस्वीर, जो इस पौधे पर पहले की गई एक स्टडी के दौरान ली गई थी. (Photo : Karine Prado)
इंसानों के पसीने की तरह इस प्लांट की पत्तियां कूलिंग का काम कैसे करती हैं?
- रिसर्च में पता चला कि ठंडी पत्तियों वाले पौधों ने एक खास सिस्टम एक्टिवेट कर दिया था. इस सिस्टम का काम पत्तियों के छोटे छिद्रों को खुला रखना था. पत्तियों के इन छिद्रों को स्टोमेटा कहा जाता है.
- ये छोटे छिद्र पानी को पत्ती की सतह से भाप बनकर उड़ने में मदद करते हैं. यह प्रोसेस बिल्कुल वैसे ही काम करता है जैसे इंसानों की त्वचा से पसीना सूखने पर ठंडक मिलती है.
- यह कूलिंग मैकेनिज्म सच में पौधे को बचा रहा था या नहीं इसके लिए वैज्ञानिकों ने एक और टेस्ट किया. उन्होंने जानबूझकर इन छिद्रों यानी स्टोमेटा को बंद कर दिया.
- मिशिगन के प्लांट रेजिलिएंस इंस्टीट्यूट की पोस्टडॉक्टरल फेलो जोआना फीहन इस स्टडी की मुख्य राइटर हैं. जोआना फीहन ने कहा, ‘हमने पाया कि स्टोमेटा को बंद करने से पौधे की कूलिंग प्रोसेस में रुकावट आती है.’
- जोआना ने आगे बताया कि पानी का भाप बनना स्टोमेटा के जरिए ही होता है. इसलिए वैज्ञानिकों को पूरा यकीन है कि यह उनके कूलिंग मैकेनिज्म का एक बहुत बड़ा हिस्सा है. यह सच में प्रकृति का एक नायाब इंजीनियरिंग सिस्टम है.
रेगिस्तान के सूखे माहौल में इस प्लांट को कूलिंग के लिए पानी कहां से मिलता है?
वैज्ञानिक अब इस कूलिंग मैकेनिज्म को समझना शुरू कर चुके हैं. लेकिन एक बड़ा रहस्य अभी भी बाकी है. पौधे को इतना ज्यादा पानी भाप बनाने के लिए कहां से मिलता है यह अभी तक साफ नहीं है. रेगिस्तान के ज्यादातर पौधे पानी बचाने पर फोकस करते हैं. वे पानी को भाप बनकर उड़ने से रोकते हैं. लेकिन हनीस्वीट का मामला बाकी रेगिस्तानी पौधों से काफी अलग है. यह पौधा सूखे को बर्दाश्त करने या पानी जमा करने में बहुत अच्छा नहीं है. इसके बजाय यह डेथ वैली की जमीन के काफी नीचे मौजूद ग्राउंडवाटर पर निर्भर रहता है.
जोआना फीहन ने इस रहस्य को सुलझाने के लिए एक थ्योरी दी है. उन्होंने कहा, ‘हमें लगता है कि टाइडेस्ट्रोमिया में एक ऐसा रूट सिस्टम है जो पानी सोखने में बहुत माहिर है.’ उनके मुताबिक इस पौधे में पानी को ऊपर खींचने वाला एक खास हाइड्रोलिक्स सिस्टम भी होता है. इसके अलावा इसकी कोशिकाओं के अंदर नमक, शुगर और प्रोटीन का एक ऐसा मिक्सचर होता है जो पानी उड़ने के बाद भी पौधे को हाइड्रेटेड रखता है.
इस अनोखे प्लांट की नई रिसर्च से भविष्य में इंसानों को क्या फायदा होने वाला है?
वैज्ञानिकों ने गर्मी सहने की क्षमता से जुड़े केवल तीन जेनेटिक रीजन की पहचान की है. इसके लिए जिम्मेदार खास जीन का पता लगाने के लिए अभी और काम करना होगा. लेकिन यह रिसर्च केवल एक जानकारी नहीं है बल्कि इंसानों के लिए उम्मीद की एक किरण है.
दुनिया भर में गर्मी के सारे रिकॉर्ड टूट रहे हैं. बढ़ते टेम्परेचर के कारण हमारी फसलों पर बहुत बड़ा खतरा मंडरा रहा है. टाइडेस्ट्रोमिया ने उस टेम्परेचर में भी जिंदा रहने का तरीका खोज लिया है जो बाकी पौधों और जानवरों के लिए जानलेवा है.
जोआना फीहन ने कहा, ‘अगर हम इस पौधे के जिंदा रहने का मैकेनिज्म सीख लेते हैं तो हम फसलों को हीटवेव से बचाने के नए तरीके खोज सकते हैं.’ यह रिसर्च भविष्य में खेती के तरीकों को पूरी तरह से बदल सकती है.




