इस फैसले को केवल निजी कंपनियों को मिसाइल बनाने की अनुमति के तौर पर देखना सही नहीं होगा. इसका बड़ा रणनीतिक महत्व भारत की Missile Replenishment और Surge Production Capacity से जुड़ा है.
आधुनिक युद्ध अब कुछ दिनों की लड़ाई तक सीमित नहीं रह गए हैं. यूक्रेन युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया के संघर्षों तक यह सामने आया है कि लंबे युद्ध में अत्याधुनिक हथियारों के शुरुआती स्टॉक के साथ-साथ उनकी लगातार भरपाई और तेजी से उत्पादन करने की क्षमता निर्णायक बन सकती है.
ऐसे में भारत के सामने भी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि उसके पास कितनी मिसाइलें हैं, बल्कि यह है कि अगर किसी बड़े संघर्ष में मिसाइलों की खपत तेजी से बढ़ जाए तो देश कितनी तेजी से उनका उत्पादन दोबारा बढ़ा सकता है.
युद्ध के दौरान असली ताकत सिर्फ Missile Stock नहीं, Production Capacity भी
किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष में मिसाइलों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ सकता है. लंबी दूरी की स्ट्राइक, एयर डिफेंस, एंटी-शिप और अन्य सामरिक जरूरतों में मिसाइलों की लगातार आवश्यकता होती है. युद्ध शुरू होने से पहले जमा किया गया War Reserve सीमित होता है. इसलिए लंबे संघर्ष में एक समय के बाद सैन्य क्षमता इस बात पर निर्भर करने लगती है कि देश अपने इस्तेमाल किए गए हथियारों को कितनी तेजी से replace कर सकता है.
यही वह जगह है जहां DRDO की तकनीक को निजी उद्योग तक पहुंचाने का फैसला रणनीतिक महत्व रखता है. अगर कई भारतीय कंपनियां अलग-अलग मिसाइल प्रणालियों के उत्पादन में सक्षम होती हैं, तो देश के पास भविष्य में एक बड़ा Defence Industrial Base तैयार हो सकता है. इससे जरूरत पड़ने पर उत्पादन क्षमता को तेजी से बढ़ाने यानी Surge Production की संभावना मजबूत होगी.
US-Iran और Russia-Ukraine War से सबक: मिसाइलों की कमी का खतरा
1. अमेरिका–ईरान युद्ध: अमेरिकी Missile Interceptors पर भारी दबाव
2026 के अमेरिका–ईरान युद्ध में अमेरिकी सेना ने इजराइल की missile defence में बड़ी मात्रा में THAAD, SM-3 और SM-6 interceptors इस्तेमाल किए. Pentagon assessment के अनुसार अमेरिका ने 200 से ज्यादा THAAD interceptors और 100 से ज्यादा SM-3/SM-6 missiles इस्तेमाल किए, यानी THAAD का करीब आधा inventory.
Strategic lesson: ईरान के बड़े missile salvos का जवाब देने में सिर्फ interceptor की संख्या नहीं, बल्कि production और rapid replenishment capacity भी महत्वपूर्ण हो गई. यही कारण है कि अमेरिकी defence industry में missile production बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है.
2. रूस–यूक्रेन युद्ध: Patriot Interceptors की कमी
रूस–यूक्रेन युद्ध इसका और स्पष्ट उदाहरण है. रूस लगातार बड़े missile और drone attacks करता रहा है, जबकि यूक्रेन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक Patriot interceptor missiles की सीमित उपलब्धता रही है.
इसी बीच रूस ने missile production बढ़ाया है. यूक्रेनी military intelligence के अनुसार अगस्त 2026 में रूस की कुछ प्रमुख missile systems की monthly production निर्धारित लक्ष्य से 10–20% ज्यादा चल रही थी.
एक निर्माता से कई उत्पादन केंद्रों तक
अब तक रक्षा क्षेत्र में सरकारी संस्थानों और चुनिंदा उत्पादन एजेंसियों की बड़ी भूमिका रही है. निजी क्षेत्र भी रक्षा निर्माण में तेजी से आगे आया है, लेकिन मिसाइल प्रणालियों के पूर्ण उत्पादन में उसकी भूमिका को और विस्तार देने का यह फैसला महत्वपूर्ण है.
इसका रणनीतिक लाभ यह है कि मिसाइल उत्पादन का आधार ज्यादा व्यापक हो सकता है. युद्धकाल में अगर किसी एक उत्पादन केंद्र पर अत्यधिक दबाव आता है, तकनीकी समस्या होती है या सप्लाई चेन बाधित होती है, तो व्यापक औद्योगिक नेटवर्क Resilience बढ़ा सकता है.
यानी भारत की रणनीति धीरे-धीरे “कितना हथियार मौजूद है” से “कितनी तेजी से हथियार दोबारा बनाए जा सकते हैं” की तरफ बढ़ती दिखाई देती है.
DRDO की Technology, Private Sector की Manufacturing Capacity
Technology Transfer मॉडल में DRDO द्वारा विकसित प्रणालियों की तकनीक योग्य भारतीय कंपनियों को उपलब्ध कराई जाएगी. इसके बाद कंपनियां तय मानकों और नियामकीय प्रक्रियाओं के तहत उनका उत्पादन कर सकेंगी.
- DRDO का फोकस: Research, Development और Next-Generation Technologies पर
- Private Industry का फोकस: Manufacturing, Scale और Supply Chain पर
यही मॉडल भारत को एक ऐसी व्यवस्था बनाने में मदद कर सकता है जिसमें नई तकनीक विकसित होने के बाद उसे बड़े पैमाने पर उत्पादन में ले जाने में कम समय लगे.
DRDO का बोझ होगा कम
अब तक DRDO पर नई रक्षा तकनीकों के अनुसंधान और विकास के साथ-साथ बड़े पैमाने पर उत्पादन की जरूरतों का भी दबाव रहता था. निजी क्षेत्र को उत्पादन में बड़ी भूमिका मिलने के बाद DRDO अपने संसाधनों और विशेषज्ञता को अगली पीढ़ी की तकनीकों के रिसर्च और डेवलपमेंट पर अधिक केंद्रित कर सकेगा.
इससे DRDO को नई प्रणालियां तेजी से विकसित करने पर ध्यान देने का मौका मिलेगा, जबकि बड़े पैमाने पर उत्पादन का बोझ निजी कंपनियां संभालेंगी.
Development-cum-Production Partner मॉडल से बढ़ सकती है Industrial Depth
Development-cum-Production Partner यानी DcPP मॉडल इस पूरी रणनीति को और महत्वपूर्ण बनाता है. इसमें निजी कंपनियां केवल तैयार मिसाइल की निर्माता नहीं होंगी, बल्कि विकास, प्रोटोटाइप और उत्पादन के विभिन्न चरणों में DRDO के साथ काम कर सकती हैं.
इससे निजी उद्योग के भीतर केवल manufacturing capacity ही नहीं, बल्कि design understanding, systems integration और advanced defence manufacturing ecosystem भी विकसित हो सकता है. लंबे युद्ध में यही industrial depth बेहद महत्वपूर्ण होती है.
Missile Supply Chain भी युद्ध की एक Frontline है
आधुनिक मिसाइल केवल एक single product नहीं है. इसके पीछे propulsion, electronics, guidance, sensors, seekers, composites और कई अन्य critical components की जटिल supply chain होती है. अगर युद्ध के दौरान इनमें से किसी एक component की सप्लाई बाधित होती है, तो पूरी production line प्रभावित हो सकती है.
इसलिए निजी कंपनियों के साथ MSMEs और specialized suppliers का नेटवर्क विकसित होना भारत की Defence Supply Chain Resilience को मजबूत कर सकता है. भविष्य के युद्ध में यह क्षमता उतनी ही महत्वपूर्ण हो सकती है जितनी किसी missile system की range या accuracy.
भविष्य के युद्ध में निर्णायक होगा ‘Replenishment’
रणनीतिक दृष्टि से किसी भी बड़े संघर्ष में तीन स्तर महत्वपूर्ण होते हैं:
- हथियारों का मौजूदा भंडार
- उन्हें इस्तेमाल करने की operational capability
- इस्तेमाल हो चुके हथियारों की तेजी से replenishment करने की क्षमता
तीसरा पहलू अक्सर चर्चा से बाहर रह जाता है, लेकिन लंबे युद्ध में यही निर्णायक बन सकता है. भारत द्वारा मिसाइल तकनीक को निजी उद्योग तक पहुंचाने का फैसला इसी तीसरे पहलू को मजबूत करने की दिशा में देखा जा सकता है.
इसका अर्थ यह नहीं कि भविष्य में भारत को कभी मिसाइलों की कमी नहीं होगी. लेकिन जितना बड़ा और diversified production base होगा, उतनी ही बेहतर स्थिति में देश लंबे संघर्ष के दौरान अपनी missile inventory को replenish और production को surge कर सकेगा.
यही है असली Strategic Shift
इस फैसले का सबसे बड़ा रणनीतिक संदेश यही है कि भारत अब रक्षा आत्मनिर्भरता को केवल Import Substitution के नजरिए से नहीं देख रहा, बल्कि उसे Wartime Industrial Capacity और Long-Duration Conflict Preparedness से भी जोड़ रहा है.
भविष्य का भीषण युद्ध केवल सीमा पर सैनिकों की ताकत से नहीं लड़ा जाएगा. वह डेटा, सैटेलाइट, ड्रोन, मिसाइल, एयर डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और सबसे बढ़कर लगातार हथियारों की सप्लाई से लड़ा जाएगा.
ऐसे में भारत के लिए असली रणनीतिक बढ़त सिर्फ यह नहीं होगी कि उसके पास कितनी मिसाइलें हैं. असली बढ़त यह होगी कि युद्ध के दौरान भारत कितनी तेजी से अपनी मिसाइल क्षमता को फिर से भर सकता है. और DRDO की मिसाइल तकनीक को निजी उद्योग तक पहुंचाने का फैसला इसी “Stockpile से Surge Capacity” की ओर बढ़ता एक महत्वपूर्ण कदम है.
कौन-कौन सी निजी कंपनियां सक्षम हैं?
भारत की कई बड़ी निजी रक्षा कंपनियां पहले से ही रक्षा उत्पादन और संबंधित तकनीकों के क्षेत्र में काम कर रही हैं. इस नई टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पहल से ऐसी कंपनियों को लाभ मिल सकता है.
टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड: टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) भारत की प्रमुख एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों में शामिल है. कंपनी मिसाइल इंटीग्रेशन, आर्मर्ड व्हीकल और सैन्य प्रणालियों के क्षेत्र में काम करती है. यह पहले से कई रक्षा प्रणालियों, जैसे लक्ष्य ड्रोन, के उत्पादन में भी शामिल रही है. भारतीय रक्षा इकोसिस्टम में इसकी मजबूत मौजूदगी है.
लार्सन एंड टुब्रो: लार्सन एंड टुब्रो (L&T) ने रक्षा बुनियादी ढांचे और गाइडेड वेपन सिस्टम्स में बड़ा निवेश किया है. कंपनी ने ड्रोन, रडार और मिसाइल लॉन्चर सिस्टम सहित कई रक्षा क्षेत्रों में काम किया है. ज़ोरावर टैंक एक सबसे बड़ा उदाहरण है. भारी उद्योगों में इसकी विशेषज्ञता भी इसे रक्षा उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण बनाती है.
Solar Defence & Aerospace और ICOMM Tele: Solar Defence & Aerospace (SDAL) और ICOMM Tele जैसी कंपनियां भी मिसाइल तकनीक से जुड़े क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं. SDAL रक्षा सामग्री के निर्माण के साथ मिसाइल प्रोपेलेंट और रॉकेट सिस्टम बनाने में जुटी है. वहीं ICOMM Tele इलेक्ट्रॉनिक्स और मिसाइल सब-सिस्टम्स के क्षेत्र में काम करती है. कंपनी हाई-एंड मिसाइल गाइडेंस और कमांड सिस्टम्स तैयार करती है.




