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बैंडिट क्वीन के नाम से मशहूर फूलन देवी का जन्म उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में हुआ था. चंबल के बीहड़ों से उनका गहरा नाता रहा और बेहमई कांड से वे चर्चा में आईं. बाद में राजनीति में आकर वे मिर्जापुर से स
चंबल के बीहड़, यमुना किनारे बसे गांव और उत्तर प्रदेश की ग्रामीण जिंदगी, ये वे जगहें हैं जो फूलन देवी की कहानी को समझने में अहम भूमिका निभाती हैं. कभी ‘बैंडिट क्वीन’ के नाम से मशहूर रहीं फूलन देवी का जीवन गरीबी, सामाजिक भेदभाव, कम उम्र में शादी, हिंसा और अपराध से जुड़ी घटनाओं से भरा रहा. बाद में उन्होंने राजनीति में कदम रखा और सांसद भी बनीं. अगर आप उनके जीवन का इतिहास जानना चाहते हैं, तो इन जगहों के बारे में जरूर जानें…
उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में स्थित घूरा का पुरवा गांव को फूलन देवी का जन्मस्थान माना जाता है. उनका जन्म 10 अगस्त 1963 को एक गरीब परिवार में हुआ था. उनका बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता, जहां परिवार की जमीन को लेकर विवाद भी हुआ. कम उम्र में उनकी शादी कर दी गई थी. उनके शुरुआती जीवन में हुए अनुभवों और सामाजिक परिस्थितियों ने आगे चलकर उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी. फूलन देवी के बचपन और पारिवारिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए यह गांव उनकी कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
चंबल का इलाका अपनी गहरी घाटियों, ऊबड़-खाबड़ जमीन और बीहड़ों के लिए जाना जाता है. एक समय में यह क्षेत्र कई डाकू गिरोहों की गतिविधियों के कारण चर्चा में रहता था. फूलन देवी भी इसी इलाके में डाकुओं के गिरोह से जुड़ीं. उनके जीवन की कहानी में चंबल के बीहड़ों का खास स्थान है, क्योंकि यहीं से उनकी पहचान एक डाकू के रूप में बनी. हालांकि, इस क्षेत्र का इतिहास केवल डाकुओं तक सीमित नहीं है. यहां की भौगोलिक परिस्थितियों, ग्रामीण जीवन और सामाजिक समस्याओं ने भी इसके अतीत को प्रभावित किया.
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फूलन देवी की जिंदगी में बेहमई गांव का नाम एक बेहद दर्दनाक और विवादित घटना से जुड़ा है. 14 फरवरी 1981 को यहां हुई सामूहिक हत्याओं में 20 लोगों की मौत हुई थी. इस घटना ने पूरे देश का ध्यान फूलन देवी और चंबल के डाकुओं की दुनिया की ओर खींचा. फूलन के साथ पहले हुई हिंसा और उनके प्रतिशोध को इस घटना की पृष्ठभूमि में बताया जाता है, लेकिन इस नरसंहार में मारे गए लोगों और उनके परिवारों का दुख भी इस इतिहास का अहम हिस्सा है. यहां जाने की योजना बनाएं, तो इसे किसी रोमांचक पर्यटन स्थल की तरह नहीं, बल्कि एक संवेदनशील ऐतिहासिक घटना से जुड़े गांव के रूप में देखें.
फूलन देवी के जीवन का एक बड़ा बदलाव राजनीति में आने के बाद हुआ. साल 1996 में वह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुनी गईं. साल 1999 में भी उन्होंने इसी सीट से जीत हासिल की. इस तरह चंबल के बीहड़ों से जुड़ी उनकी पहचान संसद तक पहुंची. मिर्जापुर उनके राजनीतिक सफर को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि दिल्ली का संसद भवन उनके जीवन के उस दौर का प्रतीक है, जब उन्होंने लोकतांत्रिक राजनीति में अपनी जगह बनाई.
फूलन देवी के जीवन में बचपन से ही कई मुश्किलें आईं. कम उम्र में शादी, पारिवारिक विवाद और उनके साथ हुई हिंसा ने उनकी जिंदगी को प्रभावित किया. बाद में वह डाकुओं के गिरोह से जुड़ गईं. 1981 में बेहमई की घटना के बाद उनका नाम देशभर में चर्चा में आया. साल 1983 में उन्होंने आत्मसमर्पण किया और लंबे समय तक जेल में रहीं. इसके बाद राजनीति में प्रवेश कर उन्होंने सांसद के रूप में भी काम किया. 25 जुलाई 2001 को दिल्ली में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई. (Photo- reuter)




